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सुख-दुख...

कविता सुन कुंवर साहेब नाराज हुए और मुझे शिक्षक पद से बर्खास्त कर दिया

: मेरा पहला कवि सम्मेलन, अंतिम भी : मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में दो बातों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक वंशानुगत और दूसरा वातावरण। मगर एक बात और होती है जिसे गॉड गिफ्ट कह सकते हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मेरे परिवार में दूर तक कोई कवि नही था और वातावरण एक दम गंवई और कस्बाई। यहां भी कोई कवि नहीं था, यहां तक कि अपना कोई अध्यापक भी कवि नहीं था और मैं टूटी फूटी तुकबंदी ही सही कविता करने लगा। इस कविता ने मुझे काफी कष्ट भी दिए मगर यह जारी रही। तुकबंदी तो पता नहीं कब से कर रहा था मगर 1962 के चीन युद्ध के समय एक वीर रस की कविता लिखी जो नवभारत टाइम्स में छपी वीर रस की यही एक मात्र कविता थी, बाकी तो सब हास्य और व्यंग्य में ही लिखता रहा।

: मेरा पहला कवि सम्मेलन, अंतिम भी : मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में दो बातों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक वंशानुगत और दूसरा वातावरण। मगर एक बात और होती है जिसे गॉड गिफ्ट कह सकते हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मेरे परिवार में दूर तक कोई कवि नही था और वातावरण एक दम गंवई और कस्बाई। यहां भी कोई कवि नहीं था, यहां तक कि अपना कोई अध्यापक भी कवि नहीं था और मैं टूटी फूटी तुकबंदी ही सही कविता करने लगा। इस कविता ने मुझे काफी कष्ट भी दिए मगर यह जारी रही। तुकबंदी तो पता नहीं कब से कर रहा था मगर 1962 के चीन युद्ध के समय एक वीर रस की कविता लिखी जो नवभारत टाइम्स में छपी वीर रस की यही एक मात्र कविता थी, बाकी तो सब हास्य और व्यंग्य में ही लिखता रहा।

कविता से पहला कष्ट इंटर के बाद मिला। डिग्री कालेज के प्राचार्य, प्रबंधक या सर्वेसर्वा को सब बाबा कहते थे। बाबा की आयु लगभग 65 साल थी। पुत्र प्रप्ति के लिए उन्होंने 16 साल की एक कन्या से तीसरा विवाह रचाया। वह कन्या हाई स्कूल पास थी। 11वीं में उसे अपने ही कालेज में दाखिल कर लिया। अब बाबा के घर में थी तो सब छात्र उसे उसके पीछे दादी कहते थे। उस कन्या की पीड़ा का बखान करते हुए मैंने दो तुकबंदियां की। पहली में दादी कह रही है- ''मैं गरीब की बेटी दादी बन गई सोलह साल में, अब तो इस बाबा के ही संग रहना है हर हाल में।'' दूसरी में वह अपनी सखी से कहती है- ''ना मेरी उसकी जोट सखी, मैं एक चवन्नी छोटी सी वह पूरे दस का नोट सखी।'' कविताएं तो लंबी थीं मगर अब इतनी ही याद रहीं। कविताएं बाबा तक गईं और फिर बाबा ने मेरे साथ जो किया उससे सारा कैरियर चौपट हो गया जिसे फिर से पटरी पर लाने में छह सात साल लग गए।

कविता से दूसरा कष्ट मिला कांठ में। कालेज के प्रबंधक एक कुंवर साहब थे। उन्होंने कालेज में एक कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन कराया जिसमें हिंदी और उर्दू के उस समय के नामी कवियों और शायरों ने भाग लिया। इस आयोजन में मैंने भी एक कविता पढी। 1962 का भारत चीन युद्ध हो चुका था। राशन की समस्या विकट थी। मेरी कविता में इसी पर व्यंग्य किया था। विषय सामयिक था सो खूब तालियां बज रही थीं। पता नहीं क्या हुआ इन तालियों के बीच कुंवर साहेब मंच से उठ कर अंदर कमरे में जा बैठे। मैं कविता समाप्त कर एक ओर बैठ गया और उधर कई कवि और शायर बारी बारी कुंवर साहब के पास जाने लगे। थोड़ी देर बाद एक शायर मेरे पास आ कर बोले मास्टर जी आपकी कविता से कुंवर साहब बहुत नाराज हैं। आप उनसे जा कर माफी मांग लें। इसके बाद कई अन्य कवियों ओर शायरों ने यही बात दोहराई और कहा आप हमारे साथ चलिए वरना आपकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। मैंने माफी मांगने से साफ इंकार कर दिया और कार्यक्रम बीच में ही छोड़ कर अपने कमरे पर आ गया।

अगले दिन अवकाश था। तीसरे दिन कालेज आया तो पहले पीरियड में ही चपरासी नौकरी से बर्खास्त करने का परवाना थमा गया। मैं तैयार था क्योंकि इसकी भनक पहले ही मिल गई थी। कमरे पर आ कर भावी कार्यक्रम के बारे में सोचता रहा। शाम को उठ कर बाहर आया और उधार का हिसाब चुकता किया ढाबे पर खाने गया तो ढाबे वाले ने सहानुभूति प्रकट की। कालेज का कोई अध्यापक नहीं आया। आखिर कवुंर साहब का आतंक जो था। रात में कुछ छात्र अवश्य आए। उन्हें मेरे जाने का दुख हो रहा थ।

अगले दिन चलने से पहले सोचा कि आखिरी बार कुंवर साहब से भी मिल लिया जाए। गया तो उनका दरबार सजा था। इंटरव्यू वाली मंडली भी बैठी थी। मैंने जाकर नमस्ते की और कहा- जा रहा हूं कुंवर साहेब। कुंवर साहेब कुछ नहीं बोले। एक अन्य ने कहा- मास्टर जी एक बार फिर सोच लो कुंवर साहब आपको माफ कर सकते हैं। मैंने कहा- खूब सोच लिया, अच्छा है यहां से छुटकारा मिल गया वरना तो यहीं उलझ कर रह जाता। मेरी बात पर कुंवर साहब ने मुझे घूरा और अपन साथ वाले से कहा- ही लूजेज सम स्क्रूज आफ हिज माइंड। मैंने धन्यवाद कहा और नमस्ते कर वापस चला आया और इसी के साथ यह प्रतिज्ञा भी कर ली कि भविष्य में किसी कवि सम्मेलन में भाग नहीं लूंगा। इस पहले और अंतिम कवि सम्मेलन में एक भी कवि ऐसा नहीं था जो मेरे पक्ष में बोल सके इसलिए कइयों के प्रति मन खट्टा हो गया। बाद में पता चला कि कुंवर साहब के कुछ लोगों के पास राशन के डिपो थे। कुंवर साहब का वह कथन आज भी दिमाग के किसी कोने में चिपका है और ऐसे अवसरों पर प्रायः याद आ जाता है। कभी कभी सोचता हूं कि क्या वास्तव में ही मेरे दिमाग के कुछ पुर्जे ढीले हैं।

इतना सब होने के बाद भी कविता लिखना जारी रहा। स्थानीय पत्रों में तथा सेवाग्राम में छपना जारी रहा। कविता के बारे में मुझे कुंडली लिखने में महारत हासिल है। हाथ के हाथ छंद तैयार कर देता हूं। इसका लाभ मिला नवभारत टाइम्स में। 1984 के चुनाव की चर्चा चल रही थी। कुछ लोग रब्बी जी के पास आए चुनाव के बारे में नेताओं की बात कर रहे थे। उनके जाने के बाद मैंने चार पांच कुंडलियां लिखीं और मजे लेने के लिए रब्बी जी को दे दी। रब्बी जी ने उन्हें सरसरी तौर पर देखा और अपने पास रख लीं। अगल्रे दिन अखबार देखा तो आश्चर्य की सीमा न रही। एक कुंडली उत्तर प्रदेश के पेज पर छपी थी। शीर्षक था- कबीर चौरा, और नीचे लेखक का नाम लिखा था संत मेहर दास। मैं चुनाव दौरे पर निकल आया था। सो इस बारे में रब्बी जी से कोई बात न कर सका।

इस दौरे में तीसरे दिन देखा कि ''कबीर चौरा'' संपादकीय पृष्ठ पर छपा था। वापस आने पर पता चला कि संपादक श्री राजेंद्र माथुर ने ''कबीर चौरा'' देखा और रब्बी जी से कहा कि इतनी अच्छी कविता को उत्तर प्रदेश तक ही क्यों सीमित किया जाए, सब पाठकों को इस का आनंद उठाना चाहिए। माथुर जी ने मुम्बई पटना जयपुर और लखनउ के संपादकों को भी ''कबीर चौरा'' छापने का संदेश भिजवा दिया। इस प्रकार ''कबीर चौरा'' नवभारत टाइम्स का अखिल भारतीय स्तंभ बन गया। माथुर जी को बाद में पता चला कि यह छंद मैं लिखता हूं। यह एक गुण था माथुर जी का कि उन्होंने सामग्री देखी, नाम नहीं देखा और कोई संपादक होता तो पहले पूरी पड़ताल करता और बाद में अहसान जताते हुए छापना आरंभ करता। तीनेक साल संत मेहरदास के नाम से छपने के बाद ''कबीर चौरा'' मेरे असली नाम से छपने लगा और दस साल तक लगातार छपता रहा। इसके छपने को लेकर क्या क्या नहीं हुआ, यह एक अलग विषय है। नभाटा की देखा देखी अमर उजाला ने भी कुंडली छापनी आरंभ की मगर एकाध महीने ही चल सकी। जागरण ने भी प्रयास किया मगर वह एक सप्ताह में ही दम तोड़ गया। कबीर चौरा की धूम इतनी थी कि हाजी मस्तान ने अपने बारे में पढा तो खुश हो कर 25 रुपये का चैक इनाम में भेज दिया।

चौ. चरण सिंह के एक भक्त ने खुश हो कर 250 रुपये का चैक भेज दिया। आज भी कई लोग किसी समारोह में मिल जाते हैं जो अपनी पसंद का याद किया छंद सुना देते हैं तो लगता है मैंने कुछ लिखा था। कवि सम्मेलनों के निमंत्रण मिलते रहते थे मगर मैं किसी में नहीं गया। कबीर चौरा के बाद तो देश भर से बुलावा आने लगा मगर मैंने जो तय कर लिया था उस पर ही अटल रहा। अंतिम निमंत्रण आजादी की पचासवीं सालगिरह पर भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश के संयुक्त रूप से आयोजित कवि सम्मेलन का मिला। मैंने उसे भी विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया। आखिर मेरे दिमाग के कुछ पुर्जे ढीले जो हैं।

डॉ. महर उद्दीन खां

सैफी हास्पिटल
रेलवे रोड
दादरी
गौतमबुद्ध नगर- 203207 

मो. 9312076949

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