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बनारस में सड़क पर उतरे पत्रकार, अखबारों में खबर नहीं छपी

वाराणसी। इसे किस तरह की पत्रकारिता कहेंगे आप कि मुंबई में महिला पत्रकार के साथ हुए गैंगरेप के विरोध में बनारस में युवा पत्रकारों के प्रदर्शन को स्थानीय अखबारों ने छापना तक जरूरी नहीं समझा। ये अलग बात है कि मौके पर प्रमुख अखबारों के संवाददाता पहुंचे तो जरूर, विज्ञप्ति भी लिया लेकिन इतने संवेदनशील मसले पर उठे आवाज को अखबार से गायब कर दिया। सिर्फ दैनिक राष्ट्रीय सहारा ने इस युवा पत्रकारों के विरोध मार्च को अपने अखबार में  ''पत्रकारों ने की न्याय दिलाने की मांग'' शीर्षक से प्रमुखता से छापा।

वाराणसी। इसे किस तरह की पत्रकारिता कहेंगे आप कि मुंबई में महिला पत्रकार के साथ हुए गैंगरेप के विरोध में बनारस में युवा पत्रकारों के प्रदर्शन को स्थानीय अखबारों ने छापना तक जरूरी नहीं समझा। ये अलग बात है कि मौके पर प्रमुख अखबारों के संवाददाता पहुंचे तो जरूर, विज्ञप्ति भी लिया लेकिन इतने संवेदनशील मसले पर उठे आवाज को अखबार से गायब कर दिया। सिर्फ दैनिक राष्ट्रीय सहारा ने इस युवा पत्रकारों के विरोध मार्च को अपने अखबार में  ''पत्रकारों ने की न्याय दिलाने की मांग'' शीर्षक से प्रमुखता से छापा।

मुंबई में महिला फोटोग्राफर के साथ हुए गैंगरेप के विरोध में वाराणसी के युवा पत्रकारों ने वाराणसी जर्नलिस्ट फ्रन्ट मंच बनाकर शनिवार को सिगरा स्थित भारत माता मंदिर से लहुराबीर स्थित शहीद चंन्द्रशेखर पार्क तक ''खामोश क्यों'' मार्च निकाल कर विरोध दर्ज करवाया। मार्च की सूचना एक दिन पहले ही सभी प्रमुख अखबरों को दी गई थी। हैरत की बात तो ये है कि शहर में मौजूद तमाम पत्रकार संगठनों में से किसी भी संगठन ने मार्च में शामिल होना जरूरी नहीं समझा। बावजूद इसके युवा पत्रकारों ने भारतमाता मंदिर से शहीद चन्द्रशेखर पार्क तक मार्च निकाल कर अपना विरोध दर्ज किया।

मार्च में शामिल पत्रकार अपने हाथों में ''घटनाए हो रही है सरकार सो रही है, पत्रकारों पर हमला क्यों?, पत्रकारों की सुरक्षा की गारंटी करो'' आदि तख्तियां और ''सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए'' जैसे गीत गाते हुए चल रहे थे। मार्च विद्यापीठ, मलदहिया, होते हुए लहुराबीर स्थित आजाद पार्क पहुंचकर सभा में तब्दील हो गया। सभा में पत्रकारों ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर होने वाली घटनाओं से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरें में नजर आ रही है। मुबंई और इटावा की घटना कानून-व्यवस्था और सरकार के सामजिक सुरक्षा के दावों पर प्रश्न चिन्ह लगा रही है।

वक्ताओं ने कहा कि सरकार के चमकते विकास के दावों का सच अब सामने आने लगा है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सैनिक माने जाने वाले पत्रकार तक इस व्यवस्था में सुरक्षित नहीं रह गए है तो आम आदमी की क्या बिसात। वक्ताओं ने सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की भी मांग की। सभा में वक्ताओं ने आम आदमी से आहवान करते हुए उनसे गुजारिष की कि वो इस तरह की घटनाओं का विरोध प्रधान मंत्री को पत्र भेजकर करें। कार्यक्रम का नेतृत्व पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी, संचालन मनीष सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन राजेश मिश्रा ने किया।

जुलूस और सभा में मुख्य रूप से अजय रोशन, अजय थापा, डा. रूद्रानंद तिवारी, मनीष सिंह, आर.के.श्रीवास्तव, अतीक खान, राजेश मिश्रा, अरविन्द मिश्रा, शैलेश चौरसिया, संतोष चौरसिया, उत्पल मुखर्जी, मुकेश मिश्रा, डा. मुअज्जम खान, किशन राजा, आरिफ, जावेद खान, अरशद खान, उमेश सिंह, प्रदीप राय, फारूकी, अभय श्रीवास्तव, रवि गौड़ आदि पत्रकार शामिल थे।

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