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सुख-दुख...

छह महीने पार्ट टाइम करता रहा और एक अधिकारी से पंगा ले कर सचमुच सस्पेंड हो गया

: मेरा पहला इंटरव्यू और अंतिम भी : लगभग 40 साल के नौकरी जीवन में लंबी और छोटी अवधि की कुल मिला कर आठ नौकरियां कीं मगर इंटरव्यू केवल एक ही नौकरी के लिए दिया बस यही पहला और अंतिम इंटरव्यू साबित हुआ। हालात ऐसे बने कि बी. ए. की पढाई बीच में ही छोड़ कर नौकरी करना मजबूरी बन गया। शादी इंटर के बाद ही कर दी गई थी। अमरोहा में एक मौसा जी रहते थे उन्हें जैसे ही हालात का पता चला तो उन्होने अमरोहा बुला लिया। उनके जानकार एक सेठ को ऐसे आदमी की आवश्यकता थी जो हिंदी उर्दू और अंग्रेजी में उन का हिसाब किताब रख सके। अमरोहा जाते ही काम मिल गया।

: मेरा पहला इंटरव्यू और अंतिम भी : लगभग 40 साल के नौकरी जीवन में लंबी और छोटी अवधि की कुल मिला कर आठ नौकरियां कीं मगर इंटरव्यू केवल एक ही नौकरी के लिए दिया बस यही पहला और अंतिम इंटरव्यू साबित हुआ। हालात ऐसे बने कि बी. ए. की पढाई बीच में ही छोड़ कर नौकरी करना मजबूरी बन गया। शादी इंटर के बाद ही कर दी गई थी। अमरोहा में एक मौसा जी रहते थे उन्हें जैसे ही हालात का पता चला तो उन्होने अमरोहा बुला लिया। उनके जानकार एक सेठ को ऐसे आदमी की आवश्यकता थी जो हिंदी उर्दू और अंग्रेजी में उन का हिसाब किताब रख सके। अमरोहा जाते ही काम मिल गया।

इस नौकरी में एक और काम यह था कि सेठ के एक भाई की हिंदू प्रेमिका दूसरे शहर में थी वह उर्दू नहीं जानती थी और सेठ जी हिंदी नहीं जानते थे। प्रेमिका के हिंदी में आए प्रेम पत्र का उर्दू में अनुवाद कर सेठ जी को सुनाना होता और सेठ जी के उर्दू में लिखे प्रेम पत्र की हिंदी कर उसे प्रेमिका को भेजना होता। इस नौकरी में गणित का काम अधिक था और मेरा गणित कमजोर रहा है इसलिए यहां मन नहीं लग रहा था। इसी बीच अखबार में एक विज्ञापन देखा कांठ के एक इंटर कालेज को टाइपिस्ट की आवश्यकता थी। आवेदक को एक निश्चित तारीख पर मुरादाबाद के कांठ हाउस पर इंटरव्यू के लिए बुलाया था।

अनजान जगह कोई जान पहचान नही फिर भी यह देखने के लिए कि इंटरव्यू कैसा होता है निश्चित तारीख पर कांठ हाउस पहुंच गया। यह किसी बड़े जमीदार की शानदार कोठी थी। बुलावा आने पर अंदर गया तो देखा वहां चार पांच पगड़ीधारी लोग बैठे थे बीच में एक हुक्का भी रखा था। उन्होंने मुझे बैठने को कहा और बैठते ही पहला सवाल किया-किस जिले के हो। मैंने बताया कि बुलंदशहर से। तब दादरी जिला बुलंदशहर में था। उनमें से एक बोला- बुलंदशहर में एक शिकारपुर भी तो है वह किस चीज के लिए मशहूर है। मैं समझ गया कि अब ये लोग शिकार पुर के नाम पर मेरी खिल्ली उड़ाएंगे इन्हें माकूल जवाब दिया जाए, मैंने कहा- श्रीमान आप जैसे कुछ बुद्धिमान लोगो के कारण ही शिकारपुर जाना जाता है।

क्या मतलब? उनकी त्यौरियों पर बल पड़ गए। मैंने डरते डरते कहा- श्रीमान बात ये है कि शिकारपुर के बाहर एक बोर्ड लगा था। पहले उर्दू का जमाना था बोर्ड पर लिखा था- शिकार पुर की जूतियां मशहूर हैं। आप तो जानते होंगे कि उर्दू में ज पर एक नुक्ता होता है और च पर तीन नुक्ते होते हैं। किसी मनचले ने दो नुक्ते और लगा दिए और जूतिया का चूतिया हो गया। बस तब से अब तक शिकारपुर का नाम आते ही चूतिया सामने आ जाता है। शिकार पुर के साथ मनचले की हरकत की सजा आज तक शिकार पुर को मिल रही है।

मेरी बात सुन कर वह खुश दिखे और मेरा डर भी जाता रहा। इंटरव्यू यहीं समाप्त हो गया मैं बाहर आया और अपना बैग उठा कर चल दिया। अभी कोठी के गेट तक ही आया था कि एक अर्दली दौड़ता हुआ आया और कहा कि मुझे बुला रहे हैं। मन में एक बार फिर डर समा गया सोचा मना कर दूं मगर फिर वापस आ कर उनके सामने पेश हो गया। एक सज्जन ने कहा- महरउद्दीन हमें टाइपिस्ट मिल गया है एक अध्यापक चाहिए क्या आप मिडिल कक्षाओं को पढा सकेंगे। मेरे हां कहने पर कहा- ठीक है हम आपको नौकरी पर रखते हैं कल या परसों से आ जाओ। मेरी हैरत का ठिकाना नहीं था। कहां तो डर मारे बेचैन था और यहां नौकरी मिल गई। इस उहापोह में उनका धन्यवाद भी नहीं कर सका औ बिना देरी किए अगले दिन ही कांठ पहुंच गया।

चार पांच महीने ही यह नौकरी चल पाई और मुझे निष्कासित कर दिया। इसकी कहानी भी काफी रोचक है जो अगले एपीसोड में बताउंगा। कांठ की नौकरी में रह कर आगे की दिशा यह मिली कि अध्यापक की नौकरी ही आगे करनी है। सो जामिया में शिक्षक प्रशिक्षण के लिए टेस्ट दिया और चुन लिया गया। तब प्रशिक्षण के बाद नगर निगम में सीधे नियुक्ति मिल जाती थी बिना किसी इंटरव्यू के। प्रशिक्षण के बाद दो महीने दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान में नौकरी की। ये लोग फर्जी मार्कशीट आदि का धंधा भी करते थे। मुझे इसका पता चल गया तो ये लोग मेरी जान के दुश्मन बन गए तो यहां से भी गुपचुप पलायन करना पड़ा। नगर निगम में नौकरी मिल गई तो जिंदगी को एक राह मिल गई।

बचपन में तुकबंदी करते करते पहले कुछ कविताओं की पैरॉडी लिखी और बाद में कविता लिखने लगा। स्थानीय साप्ताहिकों के अतिरिक्त भारत चीन युद्ध पर एक कविता नवभारत टाइम्स में छपी और जामिया में प्रशिक्षण के दौरान पहली कहानी 23 जनवरी 1966 के साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी। इसके अतिरिक्त यूनीवर्सल फीचर सर्विस के माध्यम से अनेक पत्र पत्रिकाओं में लेख छपने लगे। इससे कुछ अतिरिक्त आय भी होने लगी। यहां यह बता दूं कि दादरी में उस समय कोई लेखक, पत्रकार या कवि नहीं था जिससे गाइडेंस ली जा सके। इस प्रकार लेखन के क्षेत्र में मेरा कोई गुरु नहीं है। नौकरी में काफी समय मिलता था सो ग्रामीण विषयों पर जमकर लिखने लगा और छपने भी लगा। सेवाग्राम साप्ताहिक में नियमित लिखने लगा। मेरे विषय सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे इस लिए आसानी से छप जाते थे। एक और बात यह कि अभी तक सेवाग्राम के अलावा किसी अखबार के कार्यालय भी नही गया था।

दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं सरिता और मुक्ता में मेरे लेख व कहानियां छपते रहते थे। इस दौरान दिल्ली प्रेस ने ग्रामीण जनजीवन से सम्बंधित पत्रिका भू भारती का प्रकाशन आरंभ किया तो सेवाग्राम और अन्य पत्र पत्रिकाओं में मेरे लेख देख कर परेश नाथ जी का बुलावा मिला। दिल्ली प्रेस गया तो परेश नाथ जी ने पूछा कि क्या मैं कुछ समय दे सकता हूं। मैने बताया कि फिलहाल दो घंटे रोजाना दे सकता हूं सरकारी नौकरी है। सस्पेंड होने का प्रयास करता हूं अगर सफल हो गया तो फुल टाइम दे दूंगा। परेश जी मेरी बात पर हंसे और मैं दो घंटे के लिए रोजाना दिल्ली प्रेस जाने लगा। दोपहर बाद का स्कूल था इस लिए कोई परेशानी नहीं हुई।

छह महीने पार्ट टाइम करता रहा और छह महीने बाद एक अधिकारी से पंगा ले कर सचमुच सस्पेंड हो गया। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार दिल्ली प्रेस में पूरा समय देने लगा। वहां मेरा काम भू भारती के लिए आए लेखों पर टिप्पणी देना और परेश जी से डिसकस कर अन्य विषयों पर लिखना था। दिल्ली प्रेस में कई लेखकों एवं पत्रकारों से जान पहचान हुई और इस बिरादरी को निकट से दखने का अवसर भी मिला। बिना इंटरव्यू के मिली यह नौकरी साल भर चली। बाद में परेश जी ने आग्रह किया कि मैं प्रेस में नौकरी कर लूं मगर मैंने मना कर दिया।

अब मैं एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय था। धुआंधार लेखन, नौकरी परिवार की देख भाल और छूटी हुई शिक्षा को आगे जारी करना। इसके लिए नए सिरे से बी. ए. किया, बी. एड. किया, एम. ए. और फिर पी-एच. डी.। इस बीच बिना किसी ठोस प्रयास के डिग्री कालेज में भी लीव वेकेंसी पर नियुक्ति मिल गई। उन दिनों लेखन का हाल यह था कि नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और हिंदुस्तान में नियमित रूप से लेख छपने लगे। कई फीचर सर्विस के माध्यम से दिल्ली के बाहर के अखबारों में खूब छपने लगा। 1984 की बात है एक दिन नवभारत टाइम्स गया तो रब्बी जी ने बताया कि संपादक श्री राजेंद्र माथुर मिलना चाहते हैं। मैं गया तो मेरे नाम की पर्ची पाते ही मुझे तुरंत बुला लिया गया।

माथुर जी ने मेरे लेखन को सराहते हुए पूछा-अखबार में नौकरी कर सकते हो। मैंने कहा अगर पैसा ठीक मिले तो कर सकता हूं। इसके बाद माथुर साहब ने और इधर उधर की बात की और साथ में यह भी पूछ लिया कि अब कितना कमा लेते हो। लगभग दो सप्ताह बाद माथुर जी का संदेश मिला कि मैं उनसे मिलूं। मिलने पर माथुर जी ने बताया कि लखनउ से नवभारत टाइम्स आरंभ हो रहा है, आपको वहां नियुक्त करने का विचार है। साथ ही बताया कि आपका वेतन वहां के मैनेजर के बराबर यानि दो हजार रुपए होगा। उस समय डिग्री कालेज के प्रवक्ता का वेतन डेढ हजार होता था। मैंने अपने घर के हालात बताए और कहा कि लखनऊ जाना संभव नही हो पाएगा अगर दिल्ली में रखने की बात हो तो मैं तैयार हूं। माथुर जी ने कोई आश्वासन नही दिया बस इतना कहा कि लिखते रहो।

लगभग दो महीने बाद माथुर जी ने फिर बुलाया और बताया कि नवभारत टाइम्स दिल्ली का विस्तार करने की योजना है, आपको मेरठ में नियुक्ति दी जा सकती है। मैंने इसके लिए हां भर दी। वेतन के बारे में पूछने पर मैंने यह माथुर जी पर ही छोड़ दिया कि वह जो भी दिलाएंगे मुझे स्वीकार होगा। एक सप्ताह बाद बुलावा आया मिला तो माथुर जी ने बधाई देते हुए कहा कि जाओ अपना नियुक्ति पत्र ले लो। नीचे जा कर नियुक्ति पत्र लिया तो आश्चर्य हुआ। वेतन व भत्ते कुल मिला कर साढे तीन हजार बन रहे थे जो प्रवक्ता के वेतन का ढाई गुना था। नियुक्ति पत्र लेकर माथुर जी से मिला तो उन्होंने बताया कि अभी आप अखबार के लिए नए हो इसलिए फिलहाल दिल्ली में रह कर अखबार के बारे में जानो और सीखो। उन्होंने रब्बी जी को बुलाया और कहा कि इन्हें अपने साथ रखो, उ. प्र. के समाचार के लिए जहां चाहो भेजना और बाकी समय में अखबार के बारे में बताना। इस प्रकार यह नौकरी भी बिना किसी इंटरव्यू के हाथ लग गई।

लगभग 15 साल की सेवा के बाद नवभारत टाइम्स से निकाल दिया गया, वह एक अलग कहानी है। इसके बाद सहारा के तत्कालीन संपादक ने सहारा में नौकरी का आफर दिया, मगर मैंने इंकार कर दिया। अब मैंने तय कर लिया था कि अखबार में अगर नौकरी करनी है तो संपादक के रूप में ही करनी है। यह निर्णय बस यूं ही था मुझे पता था कि यह संभव नहीं होगा। वर्तमान में कोई अखबार किसी मुसलमान को संपादक नहीं बनाने वाला। मुसलमान ही नहीं,  दलित और पिछड़़ों को भी यह अवसर नहीं मिलने वाला, सो पूरा ध्यान लेखन पर लगा दिया। मगर एक दिन देखा कि शाह टाइम्स के मैनेजर गांव आए और बताया कि मालिक लोग आपको संपादक बनाना चाहते हैं। वेतन आदि के बारे में तय करने के बाद कहा कि अपनी सुविधा के अनुसार दो चार दिन में आ कर ज्वाइन कर लें। इस प्रकार बिना किसी इंटरव्यू के यह नौकरी भी मिल गई।

शाह टाइम्स में मुजफ्फर नगर दिल्ली देहरादून और मुरादाबाद केंद्रों पर पांच छह साल मजे में बीत गए। अब सेहत इजाजत नहीं दे रही थी सो घर आ गया। पिछले साल भास्कर पुणे से आफर मिला था मगर सेहत के चलते उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। इस बीच एक महीना सहारा समय के लिए पटकथा लेखन किया तथा दो महीने मध्य प्रदेश और बिहार में साधना न्यूज के लिए भी काम किया। बाकी होली के अवसर पर एकाध चैनल से बुलावा आ जाता है। जिंदगी मजे में कट रही है।

डॉ. महर उद्दीन खां

सैफी हास्पिटल रेलवे रोड

दादरी, गौतमबुद्ध नगर-203207    

मोबाइल: 9312076949


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