बाराबंकी। घाघरा जिले में हमेशा विनाश लीला ही खेलती आयी है। बाढ़ पीड़ितों से ज्यादा इसका दर्द कौन जा सकता है। नेताओं व अधिकारियों के मेले इसके तट पर हर वर्ष लगते हैं लेकिन जब सवाल हो घाघरा में डूबे हुए नौ गरीबों की मौत का अथवा उनकी लाशों का तो केवल मगरमच्छ के दर्शन मात्र से ही प्रशासन की संवेदनशीलता मर जाये यह चौकाता जरूर है। ऐसे में प्रश्न है कि क्या कोई प्रभावी या अमीर अथवा राजा-महराजा या फिर कोई नेता पानी में डूबा होता तो क्या प्रशासन मगरमच्छ के डर से छिटक कर दूर खड़ा हो जाता?
बीती 23 व 24 की रात श्रावस्ती, नानपारा, बहराइच के गरीब मजदूरों की जिन्दगी पर ऐसा भारी पड़ी कि इन गरीबों को पेट की रोटी तो न मिली लेकिन घाघरा ने उन्हें जीते जी मौत की नींद जरूर सुला दिया। बचाव कार्य देर से शुरू हुए, अधिकारियों ने दौरा तत्काल किया, क्रेने आयी चली गयी। लेकिन जब आज मगरमच्छों का रूतबा घाघरा में दिखाई दिया तो प्रशासन का रूतबा घाघरा के पानी में पानी-पानी होता नजर आया। पुल के ऊपर खड़े हुए लापता लोगों के परिजन बस रोते रहे। कहते रहे जिन्दगी तो ईश्वर ने ले ली अब अपनों की लाश ही मिल जाये जिससे कम से कम उनका अन्तिम संस्कार तो किया जा सके। लेकिन गरीब की मौत हुई तो गरीबों की लाशे पानी में हैं मगरमच्छ भी पानी में ही हैं। काश वो पेड़ पर रहते तो बचाव टीम दुम दबाकर न भागती। पेट की आग पानी में मौत के रूप में दफन हो गयी। अमेरिका, प्रधान, कन्हई, वृक्षलाल, रामवैश्य के परिजन बार-बार यही कह रहे थे हमारे घर का क्या होगा? कौन खिलायेगा कमाकर हमें रोटी? हमारे बच्चों का क्या होगा? हमारे अपनों की लाश नदी में किस हालत में है इसका भी पता नहीं। वाह री गरीबी। काश हम बड़े होते तो हमारे घर के लोग कम किराये के चक्कर में मौत की सवारी न करते।

मगरमच्छ यहां खलनायक बना नजर आया तो जिला प्रशासन की सोंच यहां भीरू बनी नजर आयी। कहते हैं गरीबी की स्थिति दास्तां बोलती है अमीरी का मुंह इन्तकाम बोलता है। सवाल है कि अगर कहीं घाघरा में कोई राजा-महाराजा या अमीर आदमी अथवा भगवान न करे कोई नेता पानीदोज हुआ होता तो क्या यह मगरमच्छ बचाव कार्यों का कुछ बिगाड़ पाते? क्या बड़ी क्रेन आने में देर लगती? शायद नहीं। क्योंकि यहां तो पूरा सिस्टम ही जुगाड़ पर चल रहा है। मानवीय संवेदनाओं का कोई मूल्य नहीं है। घाघरा में डूबे तो डूबे हैं दो दर्जन गरीब, मजदूर ऐसे लोग जो पेट पालने के लिए रोज मेहनत करते हैं और फिर पेट की आग को शांत करते हैं। आंसू बहाकर घाघरा के पानी को मिन्नत कर यह कहते परिजन हे घाघरा मैया मुझे मेरे अपने मरे ही लौटा दो। लेकिन घाघरा तो घाघरा है वह जानती है कि नेताओं के वादे, अधिकारियों के आश्वासन मेरे घाट पर पानी पीते नजर आते हैं। गरीबों की आहें मेरा भोजन हैं और फोटू छपाऊ नौकरशाहों की तकदीर। इससे गरीबों की तकदीर कहां बदलने वाली है।
22 से 24 लोगों की जलसमाधि हो गयी। जिलाधिकारी ने एक नहीं कई बार दौरा किया। वरिष्ठ नेता मंत्री व अन्य लोग भी मौके पर पहुंचे लेकिन वाह रहे मगरमच्छ आज तूने अपनी बिरादरी के साथ यहां पहुंचकर प्रशासन को डर रूपी मगरमच्छी आंसू बहाने पर विवश कर दिया-तेरी जय हो। मरे हैं तो गरीब। काश कोई बड़का आदमी मरा होता, दुम हिलाता नजर आता जिला प्रशासन। उसकी मौत की कीमत को समझता जिला प्रशासन। घंटो बड़े अधिकारी यहां बैठकर बड़ी-बड़ी बाते करते। उद्देश्य भी होते जीवन मृत्यु पर। लेकिन यहां कौन रोये और किसकी हालत पर। क्योंकि गरीबों की किसमत में हमेशा मौत अभावों को लेकर आती है। फिर अपनों की जान को जोखिम में क्या डालना। वह भी तब जब मरे मजदूरपेशा गरीबों की लाशों पर मगरमच्छों ने अपना पहरा जमा लिया हो। ऐसे में सियासी व प्रशासनिक हल्कों के कथित मगरमच्छी आंसू बहाने वाले लोगों के बारे में क्या कहना? हर बात छोटी ही पड़ जायेगी। एक बात के सिवा कि गरीब हमेशा गरीब होता है। उसकी मौत पर गरीब ही आंसू बहाते हैं वह नहीं जो वातानुकूलित व्यवस्था में अमीरी का जीवन जीते हैं। गरीबी के साथ मगरमच्छों को शर्मशार प्रणाम…! उफ! भगवान यहां इतनी बड़ी संख्या में अमीरों को मौत न देना अन्यथा जिला प्रशासन के लिए बड़ी परेशानी हो जायेगी?
बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.