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चुनावी टीस और मरहमी फंडा

कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब-तब वंचित वर्गों के दर्द को लेकर एकदम खांटी दार्शनिक वाला चोला ओढ़ लेते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि इस संवेदनशील नेता को शायद अब तक पता ही नहीं था कि दलित और वंचित वर्गों की हालत आज भी ज्यादा अच्छी नहीं है। भले विकास और बढ़ती समृद्धि के तमाम दावे किए जाते रहे हों। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के एक आयोजन में दलितों की स्थिति पर काफी चिंता जताई। इस बात पर खास जोर दिया कि जब तक पूरे देश में यह वंचित समाज कांग्रेस के साथ मजबूती से नहीं खड़ा होगा, तब तक पार्टी की जड़ें राजनीतिक रूप से पहले की तरह पुख्ता नहीं हो सकतीं। 
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब-तब वंचित वर्गों के दर्द को लेकर एकदम खांटी दार्शनिक वाला चोला ओढ़ लेते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि इस संवेदनशील नेता को शायद अब तक पता ही नहीं था कि दलित और वंचित वर्गों की हालत आज भी ज्यादा अच्छी नहीं है। भले विकास और बढ़ती समृद्धि के तमाम दावे किए जाते रहे हों। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के एक आयोजन में दलितों की स्थिति पर काफी चिंता जताई। इस बात पर खास जोर दिया कि जब तक पूरे देश में यह वंचित समाज कांग्रेस के साथ मजबूती से नहीं खड़ा होगा, तब तक पार्टी की जड़ें राजनीतिक रूप से पहले की तरह पुख्ता नहीं हो सकतीं। 
उन्होंने खास तौर पर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में पार्टी के हाल का जिक्र किया। कहा कि यदि यहां पर पांच दलित नेताओं का नाम गिनाने के लिए कहा जाए, तो सिर्फ मायावती का नाम ही एक से पांच नंबर तक आएगा। उनका सवाल यही था कि कांग्रेस के लोगों को इस बारे में जरूर विचार मंथन करना चाहिए कि ऐसी स्थिति कैसे पैदा हुई? यह अलग बात है कि राहुल दो साल पहले उत्तर प्रदेश के कई जिलों में दलितों के यहां रैन-बसेरा करके गरीबी की बदहाली का साक्षात्कार कर आए थे। अब लंबे विराम के बाद उन्हें फिर दलित समाज की पीड़ा की याद आई है। ऐसे में, इस संवेदनशीलता के निहितार्थ पर सवाल भी उठेंगे। इसकी जवाबदेही के लिए भी उन्हें तैयार रहना होगा। 
 
कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार 2004 से सत्ता में बनी हुई है। कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने पिछले दिनों यह उम्मीद जाहिर की है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद यूपीए सरकार की तीसरी पारी जरूर शुरू होगी। इसका उन्हें 100 प्रतिशत भरोसा है। सोमवार को लंबी जद्दोजहद के बाद सरकार ने बहुचर्चित खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी विधेयक लोकसभा में पास करा लिया है। इस तरह से सरकार ने इस मोर्चे पर एक बड़ी राजनीतिक बाधा पार कर ली है। कांग्रेस के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून के अमल में आने से एक बड़ा राजनीतिक बदलाव तय है। यूपीए सरकार की पहली पारी में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) लागू हुई थी। इसके चलते 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली थी। 
 
खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून के तहत दावा किया जा रहा है कि देश की 67 प्रतिशत आबादी को सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिलना सुनिश्चित हो जाएगा। इसका फायदा देश की करीब 82 करोड़ जनसंख्या को मिलेगा। गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी वाले परिवारों को अनाज एक से लेकर तीन रुपए प्रति किलो की दर से मिलेगा। यह कार्य योजना कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी की खास राजनीतिक पहल से ही आगे बढ़ी है। दावा तो यही किया जा रहा है कि अगले चुनाव में यही योजना सरकार की गाड़ी पार लगा देगी। सोमवार को देर रात लोकसभा में इस विधेयक पर मुहर लगी थी। लेकिन, अगले दिन स्टॉक बाजार खुलते ही गिरावट का धमाका हुआ। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हुई। सेंसेक्स में भी भारी उतार दर्ज हुआ। बुधवार को तो डॉलर के मुकाबले रुपए ने 68 की दर पार कर ली। आशंका तो यहां तक है कि यह गिरावट की दर 75 तक पहुंच सकती है। जाहिर है कि ऐसे में, महंगाई का एक जोरदार झटका लगना तय है। 
 
पहले से ही बढ़ती महंगाई से लोग त्रस्त हैं। महंगाई का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी सरकार के लिए संवेदनशील विषय बना हुआ है। पिछले सालों में वित्तमंत्री कई बार लोगों को भरोसा दिला चुके हैं कि जल्द ही महंगाई पर नियंत्रण का दौर शुरू हो जाएगा। लेकिन, महंगाई के मोर्चे पर सरकार के वायदे उलटबासी ही साबित हुए हैं। क्योंकि, महंगाई का दौर लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तो प्रधानमंत्री भी इस मुद्दे पर बेचारगी जैसी जता कर यही कह देते हैं कि वैश्विक कारणों से पूरी दुनिया में आर्थिक संकट रहा है। इससे भारत भी प्रभावित हो रहा है। 
 
अब मुश्किल यह हो रही है कि कई वजहों से सरकार की विश्वसनीयता तेजी से घटी है। दरअसल, पिछले सालों में 2जी, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, कोयला घोटाला व आदर्श सोसायटी घोटाले जैसे तमाम कारनामे लगातार चर्चा में रहे हैं। इन घोटालों में यूपीए सरकार के कई दिग्गजों की भी भूमिका रही है। अरबों रुपए के इन घोटालों को लेकर पिछले सालों में संसद का लगभग हर सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता रहा है। इन स्थितियों में सरकार की राजनीतिक साख को लगातार झटका लगा है। यूपीए सरकार की पहली पारी में देश की विकास दर ने नई बुलंदियों को छू लिया था। लेकिन, पिछले एक साल से देश की सकल विकास दर भी काफी नीचे आई है। इसके चलते आर्थिक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री की आर्थिक नीतियों को लेकर भी तरह-तरह के संशय खड़े हो गए हैं। 
 
अहम सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ही वोट बैंक की राजनीति पर उतारू है, बाकी सब लोग दूध के धुले हैं? यूपीए के मुकाबले एनडीए केंद्रीय सत्ता में आने का प्रबल दावेदार है। यह गठबंधन भाजपा के नेतृत्व में चलता है। भाजपा के दिग्गज नेताओं ने कहना शुरू कर दिया है कि मनमोहन सिंह, अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। इस सरकार के नेतृत्व में अब देश की सीमाएं भी पूरी तौर पर सुरक्षित नहीं रही हैं। क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन लगातार सीमाओं पर घुसपैठ करने की जुर्रत कर रहे हैं। हम लोग इन्हें माकूल जवाब नहीं दे पाए हैं। इस तरह की टिप्पणियां सड़क से संसद तक लगातार की जा रही हैं। पिछले सालों में भाजपा नेतृत्व ने अयोध्या के राम मंदिर विवाद को लेकर काफी राजनीतिक तमाशा खड़ा किया था। इस मुद्दे पर संघ परिवार के घटकों ने सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश की थी। इसी के चलते भाजपा को केंद्र की सत्ता भी मिली थी। 
 
गठबंधन राजनीति की मजबूरियों के चलते भाजपा नेतृत्व को राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दों को ठंडे बस्ते में रखना पड़ा था। लेकिन, अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन पाने के लिए भाजपा का एक बड़ा धड़ा फिर से राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दों को अपनी राजनीतिक बैसाखी बनाना चाहता है। ऐसे में, विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ परिवारी घटकों ने एक बार फिर अयोध्या का टंटा तेज करने की कोशिश की है। पिछले दिनों 84 कोसी परिक्रमा के नाम पर काफी तमाशा किया गया। यह अलग बात है कि इस बार इस मुद्दे पर संघ परिवारी घटक लोगों के अंदर ज्यादा ‘राम-लहर’ नहीं पैदा कर पा रहे हैं। लेकिन, जवाबी मुकाबले में सपा जैसे दल भी अतिरिक्त दबंगई दिखा रहे हैं, ताकि मुस्लिम समाज में यह संदेश जाए कि कौन ताकतें उन्हें कट्टर हिंदुत्वादियों से बचा सकती हैं? इसको लेकर सपा, बसपा व कांग्रेस जैसे दलों के बीच ज्यादा सेक्यूलर चेहरा दिखाने की होड़ मच गई है। खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी योजना की पहल करके कांग्रेस के रणनीतिकार यही संदेश देने में लगे हैं कि उन्हें ही गरीब की रोजी-रोटी को लेकर ज्यादा चिंता है। भले, डॉलर के मुकाबले रुपए का भुर्ता बने। लेकिन, गरीबों की सस्ती थाली में वह कटौती नहीं करेगी। दूसरी तरफ, भाजपा का चुनावी चेहरा बनने जा रहे नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक अलाप तेज कर दिए हैं। उन्होंने बात-बात पर कांग्रेस के नेतृत्व को कोसना शुरू किया है। कुछ इस अंदाज में बोल रहे हैं मानों उन्हें सत्ता मिल गई, तो वे रातों-रात ‘रामराज’ ले आएंगे।
 
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।
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