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राजस्थान में शराब के कारोबार को बढ़ावा देती सरकार

राजस्थान में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। पिछले चुनाव के समय आबकारी नीति एक मुद्दा थी। तब कांग्रेस विपक्ष में थी और भाजपा सत्ता में। हमलावर कांग्रेस और मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाए थे कि भाजपा शराब संस्कृति को बढ़ावा दे रही है। तब ’एट पीएम, नो सीएम’, जैसे जुमले कांग्रेस के मंच से कहे जाते थे। हालांकि भाजपा ने आरोप को बेबुनियाद बताया था। लेकिन, कांग्रेस ने जो घेराबंदी की, उससे चुनाव में भाजपा के खिलाफ शराब को लेकर एक माहौल बना। तब शराब के दुष्परिणामों के भुगतभोगियों और उनके परिजनों में यह उम्मीद जगी थी कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर शराब की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। बल्कि, बीते साढ़े चार साल के आंकड़े और घटनाएं इसके उलट है।
राजस्थान में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। पिछले चुनाव के समय आबकारी नीति एक मुद्दा थी। तब कांग्रेस विपक्ष में थी और भाजपा सत्ता में। हमलावर कांग्रेस और मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाए थे कि भाजपा शराब संस्कृति को बढ़ावा दे रही है। तब ’एट पीएम, नो सीएम’, जैसे जुमले कांग्रेस के मंच से कहे जाते थे। हालांकि भाजपा ने आरोप को बेबुनियाद बताया था। लेकिन, कांग्रेस ने जो घेराबंदी की, उससे चुनाव में भाजपा के खिलाफ शराब को लेकर एक माहौल बना। तब शराब के दुष्परिणामों के भुगतभोगियों और उनके परिजनों में यह उम्मीद जगी थी कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर शराब की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। बल्कि, बीते साढ़े चार साल के आंकड़े और घटनाएं इसके उलट है।
सरकार बनने के बाद शराब के प्रति कांग्रेस का रवैया कैसा रहा है ? इसका आभास इन तथ्यों से सहजता से लगाया जा सकता है। गहलोत राज में आबकारी से होने वाली आमदनी दोगुनी से ज्यादा हो गई है। सत्ताच्युत भाजपा सरकार के अन्तिम वर्ष 2007-8 में आबकारी से 1805 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी। वित्तीय वर्ष 2012-13 में यह 3775 करोड़ रुपए रही। सरकार ने अगले साल का लक्ष्य 4500 करोड़ रूपए रखा है। इन आंकड़ों से एक बालक भी यह समझ सकता है कि सरकार के प्रयास शराब को हतोत्साहित करने के रहे या इसे प्रोत्साहन देने के। भाजपा पर सुरा सेवन को बढ़ावा देने का राग अलापने वाले गहलोत को अपने गिरेबा में झांकना चाहिए कि उन्होंने शराब संस्कृति को रोकने के लिए क्या प्रयास किए ?
 
शराब बिक्री को प्रोत्साहन:
 
सरकार का एकमात्र सार्थक प्रयास शराब की दुकानों के संचालन के समय में कमी करना है। पहले सुबह नौ बजे से रात ग्यारह बजे तक दुकानें खुलती थी। अब सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक। हालांकि होटल बार और रेस्तरां बार के समय पूर्ववत ही है। रेस्तरां बार जहां रात 11 बजे तक खुले है, वहीं होटल बारों में 24 घंटों शराब परोसी जा रही है। गहलोत सरकार ने कार्यकाल के पहले साल में विदेशी शराब और बीयर की 800 दुकानों के लाइसेंस रद्द किए थे। तब से अब तक विदेशी शराब या बीयर के 1000 और देशी शराब की बिक्री के 6632 लाइसेंस यथावत जारी है। जानकारों का कहना है कि पुलिस और आबकारी अधिकारियों की मिलीभगत से जारी वैध दुकानों के मुकाबले कम से कम दस गुना दुकानें अवैध रूप से संचालित हो रही है।
 
सरकार की जो आबकारी नीति है, उससे तो यह सन्देश बिल्कुल नहीं जाता कि उसकी मंशा शराब संस्कृति को हतोत्साहित करने की है। तथ्य बताते है कि  आबकारी नीति का मुख्य लक्ष्य राजस्व बढ़ाना ही है। इसके चलते ही राज्य सरकार को दूसरी सर्वाधिक आमदनी आबकारी मद से ही हो रही है। तभी सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए कहती है कि शराब की दुकानों के लाईसेंस शुल्क और इनके नवीनीकरण शुल्क में दस से बीस फीसदी की बढ़ोतरी करने, सीमावर्ती जिलों में शराब की बिक्री बढ़ाने जैसे कदमों से ही सरकार का खजाना भर रहा है। जब सरकार की सोच ही शराब से अधिकाधिक राजस्व प्राप्त करने की हो, तब कैसे शराब संस्कृति को बढ़ने से रोका जा सकेगा। क्या शराब की दुकानों के संचालन समय में चार घंटे कम कर देने मात्र से शराब सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति को रोका जा सकेगा ? यदि ऐसी खुशफहमी गहलोत को है, तो यह उनको मुबारक हो। लेकिन, शराब को अपराधों की जननी मानने वाले लोग इस कार्रवाई को उॅट के मुंह में जीरा मानने को भी तैयार नहीं हैं।
 
छाबड़ा से छल:
 
सरकार को उसका चुनावी वादा याद दिलाते हुए अनेक संगठनों ने बीते चार सालों में शराब व्यवसाय पर रोक लगाने के लिए धरने, प्रदर्शन और आंदोलन किए। उच्च न्यायालय में भी जनहित याचिका दायर की गई। तब सरकार ने सर्वोदयी नेता सिद्धराज ढढ्ढ़ा की याचिका पर न्यायालय में शपथ पत्र देकर कहा था कि सरकार चरणबद्ध तरीके से शराब बंद करेगी। तीन साल हो गए, सरकार ने इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसी स्थिति में सरकार के रवैये से खफा होकर राजस्थान सम्पूर्ण शराबबंदी मंच के बेनर तले पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा इस साल 11 मार्च को अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे गए। छाबड़ा के अनशन से सरकार घबराई। गहलोत को अपने सर से गांधीवादी छवि का ताज छिनने की चिंता सताने लगी। ऐसे में सरकार ने छाबड़ा से बातचीत की और शराबबंदी की प्रक्रिया और इससे होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए एक कमेटी का गठन कर 15वें दिन उनका अनशन समाप्त कराया।
 
तथ्य बताते है कि सरकार ने छाबड़ा से छल किया। उन्हें बताया गया कि कमेटी दो महीने में रिपोर्ट देगी, लेकिन कुछ ही घंटों के बाद इसे संशोधित करते हुए 6 महीने में रिपोर्ट देने का नया आदेश जारी कर दिया गया। नए आदेश से कमेटी के औचित्य पर ही सवाल खड़े हो गए। क्योंकि रिपोर्ट आने से पहले ही राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाएगी और तब आचार संहिता लग जाएगी। सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएगी। ऐसे में कमेटी की घोषणा ओपचारिकता ज्यादा लगती है।
 
छाबड़ा फिर से अनशन पर:
 
सरकार के छल से आहत छाबड़ा ने स्वाधीन दिवस यानी 15 अगस्त से फिर अनशन शुरू कर दिया है। सरकार की साख फिर दांव पर है। छाबड़ा और उनके समर्थक सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाकर इस मुद्दे को चुनाव में ले जाने का ऐलान कर चुके हैं। विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया ने भी छाबड़ा के अनशन और शराब बंदी का मामला मंगलवार को विधान सभा में उठाया। पर, सरकार की ओर से इस पर सार्थक जबाव नहीं दिया गया। इससे सरकार की मंशा उजागर हो जाती है। अब देखना यह है कि जादूगर गहलोत इस बार फिर किस चतुराई से अपने शराब विरोधी होने और गांधीवादी छवि को धूमिल होने से बचाएंगे।
 
राजेन्द्र राज का विश्लेषण.
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