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उत्तराखंड

हे विजय बुहुगुणा, आप तो प्रोपर्टी डीलरों से घिरे हो (पढ़ें एक पत्र)

आदरणीय, भाई विजय बहुगुणा जी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड, मान्यवर, आपने मेरी पुस्तक "रंवाई कल आज और कल" का अपने आवास पर विमोचन किया था, तब मैंने अपने संबोधन में कहा था कि आपकी प्रतियोगिता शिशुमंदिर के शिक्षक से मुख्यमंत्री बने बेचारे निशंक जैसों से नहीं है बल्कि अपने पिता स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा से है जिनकी आँखे पहाड़ और पहाड़ की महिलाओं की दयनीय दशा का बखान करते करते भर आती थी. इंदिरा गांधी जैसी नेता से टक्कर लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नई धारा बहाने की सोच रखने वाले ये महान नेता देश के साथ -साथ पहाड़ की भी उतनी ही चिंता करते थे.
आदरणीय, भाई विजय बहुगुणा जी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड, मान्यवर, आपने मेरी पुस्तक "रंवाई कल आज और कल" का अपने आवास पर विमोचन किया था, तब मैंने अपने संबोधन में कहा था कि आपकी प्रतियोगिता शिशुमंदिर के शिक्षक से मुख्यमंत्री बने बेचारे निशंक जैसों से नहीं है बल्कि अपने पिता स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा से है जिनकी आँखे पहाड़ और पहाड़ की महिलाओं की दयनीय दशा का बखान करते करते भर आती थी. इंदिरा गांधी जैसी नेता से टक्कर लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नई धारा बहाने की सोच रखने वाले ये महान नेता देश के साथ -साथ पहाड़ की भी उतनी ही चिंता करते थे.
यही कारण है कि प्रसिद्ध गढ़वाल उपचुनाव में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल, हिमाचल के मुख्यमंत्री राम लाल और न जाने किन किन दिग्गजों ने उत्तखंड में डेरा डाला बावजूद उत्तराखंडियों ने क्षेत्र और जाति से ऊपर उठाकर हेमवती नंदन को जीता कर भेजा। पहाड़ में पोलिंग स्टेशनों में गड़बडी करने की कोशिश करने वाले हरियाणा पुलिस के छ फूटे जवानों को जब वहां की महिलाओं ने जान की परवाह किये बिना कंडाली से ऐसे पीटा कि उसकी जलन उन्हें आज तक याद होगी।
 
आप बिना सर्वमान्य नेता होने के बावजूद उत्तराखंड की सर्वोच्च कुर्सी पर हैं और जिस तरह आपने नौसिखिये बेटे साकेत को सांसद का टिकट दिलाया, वह आपकी कूटनीतिक शतरंज की सफल चाल कही जा सकती है. पर जैसे आप आपदाग्रस्त उतराखंड का शासन चला रहे हैं और उसमें आपके पुत्र साकेत सहयोग कर रहे हैं, उससे आपकी छवि खलनायक की बनती जा रही है. निवेश लाने के नाम पर आप जिस तरह बिल्डरों को जमीनें बाँट रहे हो वह तो उत्तराखंड को लूटने जैसा है!
 
मान्यवर, जितनी चरण बंदना आप दिल्ली जाकर नेताओं की कर रहे हो, उतनी अगर आपदाग्रस्त उत्तराखंडियों की करते तो आप उत्तराखंड के "हीरो" होते और आप सीएम की कुर्सी पर फेवीकोल के जोड़ से चिपक जाते। कभी अपने इर्द-गिर्द खड़े लोगों पर भी नजर दौडाओ और उनकी अकेले में समीक्षा करना कि इनकी जनता में छवि कैसी है? आप अपने नौकरशाहों पर भी नजर दौडाना कि देखना कि उन्होंने उत्तराखंड में रहते हुए कितनी अकूत सम्पति इकठ्ठा कर ली है। देखना कि आपके राज में उत्तराखंड से प्यार करने वाले नौकरशाह कैसे अलग-थलग रह कर सिर्फ वेतन ले रहे हैं और भ्रष्ट नौकरशाहों को कैसे आपके राज में अहम जिम्मेदारियां मिल रही हैं?
 
आप अपने और साकेत के बयानों पर भी कभी अकेले में गौर करना जब आपने चुनाव में अपने पुत्र साकेत को "इनोवा कार" और भाजपा प्रत्याशी राज्य लक्ष्मी शाह को "छकडा जीप" बता कर लोगों को अपने खिलाफ किया। कैसे साकेत अपने भाषणों में कहते थे कि वे तो बोलने के लाखों रुपये लेते हैं, अब आपके सामने फ्री में बोल रहे हैं.… आपकी इन बचकानी हरकतों ने मतदाता इतना नाखुश हुआ कि काफी वोट रानी के पक्ष के बजाये आपके विपक्ष में पड़े और आपकी हार हुई.… आपके इर्द गिर्द मंडराने वालों ने आपसे कहा होगा कि साकेत को लाखों वोट कैसे मिले, तो आपको बता दें कि साकेत की जगह अगर कांग्रेस से सौणा सिंह भी होता तो वह वोट उसको भी मिलता क्योंकि वह कांग्रेस की सौ साल से भी ज्यादा के विरासत के कारण है.
 
मान्यवर, साकेत एक लिखा पढ़ा बहुराष्ट्रीय कंपनी का कारिन्दा व वकील है, पर डीएवी कालेज देहरादून में जिस तरह उन्होंने गेट पर जड़ा ताला खुलवाया वह उनके किसी फ़िल्मी सीन जैसा था, यह किसी और राज्य में तो चल सकता है, पर उत्तराखंड जैसे शान्तिप्रिय राज्य में तो बिलकुल नहीं। साकेत उत्तराखंड के जनप्रतिनिधि बनने की होड़ में हैं, ज़रा अपने दिल्ली स्थित आवास में ध्यान देना कि वे पहाड़ के लोगों से कैसे और कितना मिलते है? और गैर उत्तराखंडी मोटे तोंद वालों से कैसे?? आम लोगों का कहना है कि निशंक सरकार के घोटालों को लोग आपके शासन में चल रही अराजकता के सामने भूल से गए हैं. निशंक शासन में कथित घोटालों का चित्रकार नौकरशाह आपके शासन में भी उत्तराखंड का प्रमुख भाग्य विधाता बना है, पता कीजिये कि वे निजी हेलीकाप्टरों में सीटी बसों की तरह क्यों और कैसे घूमते है? जबकि एक सचिव का महीने भर का वेतन दिल्ली के एक चक्कर का किराया ही होता है??.
 
मान्यवर, कुर्सी दिल्ली से मिल सकती है पर उसको मजबूती जनता ही प्रदान करती है. उत्तराखंड में आई आपदा से लोगों का पलायन तेजी से हो रहा है.. यह आपदा यहाँ आख़िरी नहीं है.आप यहाँ आपदा प्रबंधन के लिए एक बल का गठन कर रहे है जिसमें पुलिस वालों को भेज रहे हैं.… दुःख है कि आपको पहाड़ के मिजाज का अब तक पता नहीं चल पाया है.। आपको हर नदी घाटी में स्थानीय युवकों का बल गठन करना चाहिए जो आपदा प्रबंधन के समय त्वरित कार्रवाई कर सके, आप इनको 10 -15 हजार वेतन पर भी रखेंगे तब भी चलेगा और ये लोग जंगलों से आग से बचाने, बृक्षरोपण करने, पर्यटन को बढ़ावा देने जैसे कई कामों में सरकार की मदद कर सकते हैं.। क्यों न पूरे पहाड़ में ऐसे 50 हजार लोगों के बल का गठन हो, ये लोग बदरीनाथ के पास पहुंचकर मटरगस्ती करने वाले चीन को, सेना के साथ मिलकर आँखे भी दिखा सकते हैं! इससे पलायन भी रुकेगा और हिमालय भी बचेगा।
 
मान्यवर, कभी ध्यान से मनन करके तटस्थ भाव से देखना आपके इर्द गिर्द जनसेवक नहीं अधिकतर प्रोपर्टी डीलर हैं जो जहाज के डूबते ही चूहों की तरह सबसे पहले भागकर दूसरे जहाज में शरण ले लेंगे। सैकड़ों सालों के बाद उत्तराखंड इतनी भीषण आपदा की चपेट में है, आप जुगाड़बाजी के सहारे सत्ता चलाकर सबसे बड़े खलनायक भी बन हैं! और हिमालय के गरीबों की सच्चे दिल से सेवा करके सबसे बड़े हीरो भी.…!! फैसला अभी आपके हाथ में है समय बीतने के साथ-साथ आपके हाथ से वह अधिकार भी जाता रहेगा!! ज्यादा क्या लिखें आप खुद समझदार हैं कम लिखे को ही ज्यादा समझना जी!!!
 
हिमालय के चन्दन हेमवती नंदन का एक प्रशंसक और उत्तराखंड का शुभ चिन्तक
 
विजेंद्र रावत
पत्रकार 
देहरादून
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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