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शाश्वत चिंतन :: खड़ी बोली हिंदी को जहां तक पहुंचना था, पहुंच चुकी, अब पतन के दिन शुरू

क्राइस्ट चर्च कॉलेज से ग्रेजुएशन और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से विधि स्नातक की परीक्षायें पास करने के बाद जब इच्छित रोजगार नहीं मिला तो बेरोज़गारी के कुछ दिन अपने गृह जनपद में सुकून के साथ गुजारे। काम-धाम कुछ था नहीं, तो उस छोटी सी जगह में दिन आराम के साथ गुजर रहे थे। माँ-बाप चूँकि अध्यापक थे और मित्रों में भी डिग्री कॉलेज में पढ़ा रहे लोग शामिल थे, सो बातचीत में भी अकसर शिक्षा का विषय शामिल हो ही जाता था। अपने शहर में भी विद्यार्थियों को मूर्ख बनाने के लिये जातिगत आधार पर इंटर एवं डिग्री कालेज खुले हुऐ थे, जिन्हें उन कालेजों के नाम से नहीं, बल्कि जिन जातियों ने वो कालेज खोले थे, उन जातियों के नाम से संबोधित किया जाता था। उन कालेजों की कुछ खास विशेषतायें थीं।
 
क्राइस्ट चर्च कॉलेज से ग्रेजुएशन और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से विधि स्नातक की परीक्षायें पास करने के बाद जब इच्छित रोजगार नहीं मिला तो बेरोज़गारी के कुछ दिन अपने गृह जनपद में सुकून के साथ गुजारे। काम-धाम कुछ था नहीं, तो उस छोटी सी जगह में दिन आराम के साथ गुजर रहे थे। माँ-बाप चूँकि अध्यापक थे और मित्रों में भी डिग्री कॉलेज में पढ़ा रहे लोग शामिल थे, सो बातचीत में भी अकसर शिक्षा का विषय शामिल हो ही जाता था। अपने शहर में भी विद्यार्थियों को मूर्ख बनाने के लिये जातिगत आधार पर इंटर एवं डिग्री कालेज खुले हुऐ थे, जिन्हें उन कालेजों के नाम से नहीं, बल्कि जिन जातियों ने वो कालेज खोले थे, उन जातियों के नाम से संबोधित किया जाता था। उन कालेजों की कुछ खास विशेषतायें थीं।
 
कालेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थी खड़ी बोली हिन्दी में नहीं बल्कि अवधी में बातचीत करते थे। पठन-पाठन का माध्यम भी घोषित तौर पर चाहे जो रहा हो व्यावहारिकता के धरातल पर वहाँ पढ़ाई भी स्थानीय अवधी बोली में ही होती थी। कुल मिलाकर माहौल ये था कि प्रबंधन की मिलीभगत से मास्टर बने अधिकांश वेतन भोगी ज्ञान शून्य व्यक्ति अपने सरीखे ज्ञान शून्य विद्यार्थी वहाँ तैयार कर रहे थे, जिनका कोई भविष्य नहीं था। ये लड़के ठेकेदारी करने, स्थानीय नेता बनकर दलाली करने या फिर काला कोट पहनकर स्थानीय अदालतों की भीड़ बढ़ाने को अभिशप्त थे। यहाँ पर यह जरूर याद रखें कि यह पच्चीस साल पहले का माहौल था।
 
बहरहाल, दिन तो आराम से गुजर ही रहे थे लेकिन “जे बिनुकाज दाहिने-बायें सरीखे“ व्यक्तियों से भी वहाँ मिलना-जुलना होता ही रहता था, जो मिलते ही बिना पूछे ये सलाह देने लगते थे कि व्यक्ति को कुछ करना चाहिये, क्यों करना चाहिय और क्या करना चाहिये, पर वे नहीं बताते थे। इस तरह के व्यक्तियों द्वारा लगातार कई बार कोंचे जाने के बाद जीवन में कुछ करने की जरूरत नहीं होते हुए भी कुछ करने निकल पड़ा। तय पाया गया कि पत्रकारिता की जाये, वह भी हिन्दी की, क्योंकि उस समय तक छोटे शहरों और कस्बों में लोगों को यह गलतफहमी थी कि मूलतः दुष्ट और अज्ञानी होने के बावजूद हिन्दी पत्रकारों का जलवा होता है। तो साहब इस तरह पत्रकारीय जीवन की शुरूआत हुई, जिसमें हिंदी पट्टी के कुछ शहरों में रहना पड़ा और तमाम शहरों में घूमा भी।
 
खैर जब इन जगहों पर रहा तो यहाँ के शैक्षिक संस्थानों में भी जाना हुआ। यह देखकर खासा अचरज हुआ कि जातिगत आधार पर खुलने वाले कॉलेज केवल मेरे गृह जनपद की ही, विशेषता नहीं ये बल्कि हिन्दी पट्टी के तमाम क्षेत्रों में ऐसे कॉलेज खुले थे, जहाँ वैसे ही ज्ञान शून्य अध्यापक थे और स्थानीय बोली में वार्तालाप करते विद्यार्थी। पढ़ाई का माध्यम भी स्थानीय बोलियाँ ही थीं। खड़ी बोली हिंदी इन कॉलेजों से भी नदारद थी। अपवाद सिर्फ पुराने नामचीन कॉलेज और विश्वविद्यालय थे जहाँ विद्यार्थी खड़ी बोली हिन्दी में बातचीत कर रहे थे, पढ़ाई का माध्यम भी खड़ी बोली हिन्दी ही था और अंग्रेजी भाषा की कक्षाओं में मास्टर अंग्रेजी भाषा में ही पठन-पाठन करते दिख जाते थे। ये बात है करीब एक दशक पहले की।
 
अब आते हैं आज के समय पर। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के नाम जानबूझ कर नहीं ले रहा हूँ, बिलावजह वितंडा खड़ा होगा। मुझे यकीन है नाम नहीं लेने पर भी लोग समझ जायेंगे। इधर चार-पाँच सालों में कुछ ऐसा संयोग बना कि हिन्दी पट्टी के कुछ पुराने और नामचीन विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाने का मौका एक बार फिर मिला। लेकिन इस बार स्थितियाँ एकदम बदली हुई मिली। इन विश्वविद्यालयों और कॉलेज कैंपस से भी खड़ी बोली हिन्दी नदारद हो रही है। अधिकांश छात्र-छात्रायें अपनी-अपनी स्थानीय बोलियों में संवाद कर रहे हैं और अधिकांश मास्टर भी अपने विद्यार्थियों का ही अनुसरण कर रहे हैं। टीचर्स रूम में भी स्थानीय बोलियों का ही बोलबाला है, गनीमत सिर्फ अंग्रेजी भाषा की कक्षाओं में दिखी वह भी सिर्फ इतनी कि अंग्रेजी भाषा अब अंग्रेजी के बजाये खड़ी बोली हिन्दी माध्यम से पढ़ाई जा रही है।
 
यह सब देखकर दिमाग में सोच विचार चल ही रहा था कि अवधी भाषी और भोजपुरी भाषी लोगों के सम्मेलन में जाने का मौका मिला। दोनों ही सम्मेलनों में यह विचार प्रमुखता से उठाया जा रहा था कि जब अवधी और भोजपुरी बोलने वालों की संख्या खड़ी बोली हिन्दी बोलने वालों से कहीं ज्यादा है तो राजभाषा का दर्जा खड़ी बोली हिन्दी को क्यों दिया जा रहा है और अब तो भोजपुरी बोली संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है इसलिये उसका महत्व अब भाषा का है न कि बोली का।
अनेहस शाश्वत

अनेहस शाश्वत

बात यहीं रूके तो भी गनीमत जानिये। ऐसे लोगों से भी भेंट हुई जो उत्तर प्रदेश को चार भागों में बांटने के पक्षधर हैं, हरित प्रदेश, अवध प्रदेश, पूर्वांचल और बुन्देलखण्ड। ऐसे लोगों का यह भी मानना है कि जब भी अवध प्रदेश, पूर्वांचल और बुन्देलखण्ड राज्य बने तो उनकी राजभाषा क्रमशः अवधी, भोजपुरी और बुन्देली बनाई जाये। इन राज्यों में खड़ी बोली हिन्दी का क्या काम। वैसे भी इन जगहों पर सामान्य जनजीवन तो इन्हीं बोलियों के सहारे चल रहा है और यहाँ के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विद्यार्थी पहले से ही इन्हीं बोलियों में संवाद कर रहे है। हरित प्रदेश बेशक अपनी राजभाषा खड़ी बोली हिन्दी को बनाये क्योंकि यह वहां की स्थानीय बोली है।
 
पाठकों, अभी भले ही यह आपको दूर की कौड़ी लगे लेकिन अपने देश की जो दशा-दिशा है उसमें यह परिदृश्य देखकर मुझे तो लगता है कि हिन्दी की बाकी बोलियाँ कहाँ तक पहुँचेंगी यह तो अभी नहीं मालूम, लेकिन खड़ी बोली हिन्दी को जहां तक पहुंचना था, पहुंच चुकी, अब शायद उसके पतन के दिन शुरू हो चुके हैं।
 
लेखक अनेहस शाश्वत हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अखबारों में कई शहरों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं. इन दिनों सांसारिक जीवन त्याग कर अध्यात्म की दुनिया में रमे हुए हैं.


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