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इन मुख्यमंत्रियों ने डेढ़-दो लाख करोड़ हाउसिंग सेक्टर से कमाये और विदेश भेजे

भारत के संकट (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक) का एक मूल पेच दबा-ढका है. हालांकि सत्ता की दुनिया से जुड़ा हर इंसान इन असल तथ्यों से वाकिफ है. पर कमोबेश इस राजनीतिक संसार का हर इंसान इसमें गहराई से उतरने की इच्छा से प्रेरित है, इसलिए संकट आमंत्रित कर रही, इस दुनिया की असल खबरें, मुख्यधारा की बहस में हैं ही नहीं. मसलन, टूजी प्रकरण में अनिल अंबानी और उनकी पत्नी टीना अंबानी की गवाही का प्रसंग ताजा है. जब सीबीआई अदालत ने इस प्रकरण में देश के बड़े कारपोरेट घरानों की टॉप हस्तियों को बुलाना शुरू किया, तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा कि गवाही के लिए हमें क्यों बुलाया जाये? 
भारत के संकट (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक) का एक मूल पेच दबा-ढका है. हालांकि सत्ता की दुनिया से जुड़ा हर इंसान इन असल तथ्यों से वाकिफ है. पर कमोबेश इस राजनीतिक संसार का हर इंसान इसमें गहराई से उतरने की इच्छा से प्रेरित है, इसलिए संकट आमंत्रित कर रही, इस दुनिया की असल खबरें, मुख्यधारा की बहस में हैं ही नहीं. मसलन, टूजी प्रकरण में अनिल अंबानी और उनकी पत्नी टीना अंबानी की गवाही का प्रसंग ताजा है. जब सीबीआई अदालत ने इस प्रकरण में देश के बड़े कारपोरेट घरानों की टॉप हस्तियों को बुलाना शुरू किया, तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा कि गवाही के लिए हमें क्यों बुलाया जाये? 
अनिल अंबानी, भारती इंटरप्राइजेज के मालिक सुनील मित्तल, एस्सार समूह के मालिक रवि रुइया वगैरह के मामले को सीबीआई अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक देश देख रहा है. गवाही या पूछताछ के लिए हम हाजिर नहीं होंगे. सिर्फ इसलिए इस प्रसंग के वैधानिक पक्ष को उठाना हमारा मकसद नहीं, पर जिस कंपनी के आप मालिक हैं, अगर उस पर कुछ गंभीर आरोप हैं, तो जांच के लिए आपको अदालत न बुलाये? आखिर क्यों? पैसे की ताकत या अहं के कारण ही न? इस देश में 1991 के उदारीकरण के बाद पैसेवालों का गुरूर या अहं देखने लायक है. इन बड़े घरानों की बात छोड़ दें.
 
ये तो अरबपति-खरबपति (एक सामान्य इंसान इनके वैभव या अमीरी का आकलन ही नहीं कर सकता) हैं, लेकिन हर शहर-डगर में लूट के बल, अनैतिक रास्तों से अरबपति बने लोगों का अहं देखें. वे खुद को कानून से ऊपर मानते हैं. वैसे ही जीते-रहते हैं. पग-पग पर कानून तोड़ते हुए. ट्रैफिक नियमों से लेकर रोज के जीवन के हर क्षेत्र में. अपने आसपास परख लें. हवाई जहाज में होंगे, तो विमान चलते वक्त भी मोबाइल ऑन रहेगा (जो मना है). सड़क पर वाहन चलायेंगे, पर मोबाइल से बात करेंगे. हार्न दीजिए, सुनेंगे नहीं. स्कूल, अध्यापकों से ऐसे लोगों के बच्चों के बारे में सुन लीजिए, रोंगटे खड़े हो जायेंगे. कैसे इंसान हम बना रहे हैं? ये तो मामूली चीजें हैं. पर यही प्रवृत्ति हर जगह दिखायी देती है. आज कानून किनके लिए रह गया है? जो सीधे, सहज, समूचे शांतिप्रय, नैतिक और संविधान की कद्र करनेवाले हैं. आज के भाषा-व्याकरण में ऐसे लोग ‘फालतू, पागल, सनकी और बोझ’ हैं. यह दुनिया या समाज हमने बना लिया है.
 
हाल में अनिल अंबानी (रिलायंस एडीएजी के चेयरमैन) और उनकी पत्नी टीना अंबानी (पूर्व अभिनेत्री भी) को टूजी मामले में सीबीआइ कोर्ट में गवाही देनी पड़ी. विवश होकर. पहले तो उच्चतम न्यायालय तक कानूनी लड़ाई चली कि हमें हाजिर न होना पड़े. पर विवश होकर सीबीआइ अदालत (जो टूजी मामले की सुनवाई कर रहा है) जाना पड़ा. अदालत में अनिल अंबानी या उनकी पत्नी टीना अंबानी ने गवाह के रूप में क्या कहा, इस देश ने जाना. टीना अंबानी ने कहा कि वह घर चलाती (हाउसवाइफ) हैं. सामाजिक काम करती हैं. अस्पताल भी चलाती हैं. जज साहब को मुंबई आकर अपना अस्पताल देखने का निमंत्रण भी दे डाला. उनसे पूछा गया कि कई कंपनियों में आप डायरेक्टर हैं. आपकी मौजूदगी में बैठक के ब्योरों (मिनट्स) पर आपके दस्तखत हैं. आप बतायें? उनका जवाब था कि वर्ष 2006 का मामला है. अब याद नहीं है या हमने तब ऐसा किया होगा? अनिल अंबानी के जवाब तो और भी अस्पष्ट और घुमावदार थे. सोचिए कि क्या एक साधारण इंसान इसमें फंसा रहता, तो जज साहब को घर बुलाने या ऐसे जवाब देने की गुस्ताखी करता?
 
दरअसल, ऐसे मानस, रुझान या प्रवृत्ति को समझना व जानना जरूरी है. यह किसी एक व्यक्ति का प्रसंग नहीं. एक समुदाय या वर्ग का सवाल है. संपन्न (पैसे या सत्ता वाला) वर्ग मानता है कि पैसा और सत्ता की पूंजी उसके पास है. आज के भारत में सत्ता के असल स्नेत यही दो चीजें हैं. इसमें भी पैसा बुनियादी चीज है. आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल का एक बड़ा सटीक व सामाजिक नारा है, ‘सत्ता से पैसा, पैसा से सत्ता.’ इस फामरूला या व्याकरण से इस मानस को समझिए. इस वर्ग का चरित्र भी. चाल-चलन व चिंता भी. फिर इस मानस को भारत के सभी मौजूदा संकटों से जोड़ कर देखिए, संकट के स्नेत साफ हो जायेंगे. अनिल अंबानी का गवाही प्रकरण पढ़ते हुए कुछ पुरानी खबरें याद आयीं. एचडी देवगौड़ा जब प्रधानमंत्री बने, तब वह पहले किन-किन लोगों से मिले? प्रधानमंत्री चयन के बाद वह किसके विमान से दिल्ली से बेंगलुरू गये? 2004 में यूपीए का शासन आया, तो सोनिया गांधी से (सरकार के शपथ के दिन या एकाध दिन पूर्व) पहले मिलनेवाले कौन लोग थे? राष्ट्रपति, प्रणब मुखर्जी के कौन लोग दशकों से करीबी है? एनडीए कार्यकाल में भी किन लोगों की तूती बोलती थी? ये सब तथ्य एकत्र कर लें या जान लें, तो कानून को कुछ न समझनेवालों का मानस साफ समझ में आने लगेगा. जो सत्ता के शिखर पर हैं, वे ही जब ऐसे लोगों से जुड़े हैं या उनके संरक्षक -मददगार हैं, तब कोई क्या कर सकेगा? अगर कोई बहुत कानूनप्रिय आदमी है (हालांकि ऐसे लोग अपवाद हैं), तो यह वर्ग मानता है कि ‘हर आदमी की कीमत है?’
 
ताकतवर, पैसेवाले लोग पहले डायरी लिखते थे. किन-किन को क्या दिया? बाद में चक्कर होने लगा, तो डायरी बंद हो गयी. नेता लाखों-करोड़ों में कमाने लगे, तो उनके पैसे बैंकों में तो रह नहीं सकते. वे नये उद्योग-धंधों में लगने लगे या कारपोरेट हाउसों के पास सुरक्षित पहुंचने लगे. यह असल खेल है, इस सत्ता की दुनिया का. सबसे दिलचस्प है, सुप्रीम कोर्ट के बंद कमरे में चल रही राडिया टेप की सुनवाई. इसके अंश जान कर सुप्रीम कोर्ट के एक जज कह बैठते हैं कि लगता है, दलाल सरकार के हर दूसरे कोने (नूक एंड कार्नर) में हैं. इसमें वर्णन है कि हाईकोर्ट के एक जज ने नौ करोड़ लेकर ‘फेवरेबुल जजमेंट’ (पक्षपातपूर्ण फैसला) दिया. सरकार के एक बड़े विधि अधिकारी को एक महंगे पांच सितारा होटल के स्वीमिंग पूल की कांप्लीमेंट्री (सम्मानार्थ) सदस्यता दिलानी पड़ी. ट्रिब्यूनल के सदस्य कैसे काम करते हैं, इसकी भी चर्चा है. ‘न्याय के अपहरण’ का ब्योरा. इस टेप ने इस देश के राजनेताओं, कारपोरेट घरानों, न्यायपालिका, मीडिया, सरकार, नौकरशाह, सबके चेहरे से पर्दा उठा दिया है. सब बेनकाब हैं. हकीकत यही है कि देश की सत्ता भी राजनेता, कारपोरेट घराने, नौकरशाह, मीडिया या न्यायपालिका ही चलाते-प्रभावित करते हैं. जब मालिक या चौकीदार ही लुटेरे की भूमिका में हों, तो घर को कौन बचायेगा? वह कहावत है न! घर को आग लगी, घर के चिराग से, वही स्थिति आज भारत की है.
 
एक बड़े राजनेता मिले. मुख्यमंत्री रहे हैं. केंद्रीय मंत्री भी. अब भी ताकतवर हैं. उन्होंने दिल्ली का एक प्रकरण सुनाया. पुराने परिचित, एक बड़े बिल्डर उनसे मिलने आये. देश के कई राज्यों में उनके समूह का काम चल रहा है. ‘रियल एस्टेट’ का बड़ा समूह है. इसके मालिक ने उस पुराने परिचित राजनेता को अपने अनुभव सुनाये. पिछले एक दशक के. देश के एक बड़े राज्य के. बिल्डर ने बताया कि वहां दो मुख्यमंत्रियों का राज देखा. दोनों एक-दूसरे को समूचा उखाड़ देने के प्रयास और मकसद से संचालित हैं. पर उस राज्य में फारमूला तय है. फ्लैट या घर निर्माण के धंधे में हैं, तो सूत्र साफ है. प्रति वर्ग फुट के हिसाब से पैसा देना है, कानूनी अनुमोदन के लिए. आप पैसे लेकर सीधे सीएम हाउस जायें. वहां किससे मिलना है, तय है. वहां नोट गिनने की मशीन लगी है. आप भुगतान करें. गिनने के बाद कटे-फटे या नकली नोट आपको ईमानदारी से वापस कर दिये जायेंगे. बदले में आप असली नोट फिर चुका दें. आपके काम को अनुमोदन मिल जायेगा. याद करिए, अरविंद केजरीवाल का नारा, ‘सत्ता से पैसा, फिर पैसे से सत्ता.’ 1991 के बाद भारत का यह असल सच है. उस बिल्डर ने बताया कि कैसे इन मुख्यमंत्रियों ने (दो ध्रुव के दो सत्ता प्रतिष्ठानों के अनुभव, पर एक ही राज्य के) डेढ़-दो लाख करोड़ ‘हाउसिंग सेक्टर’ से कमाये और विदेश भेजे.
 
जो सत्ता की दुनिया जानते हैं, राडिया टेप प्रकरण समझते हैं, उनके लिए बिल्डर की बतायी ये बातें सौ फीसदी सही हैं. गौर करिए, अलग-अलग मुख्यमंत्री, अलग-अलग पार्टियां, दोनों के राजनीतिक दर्शन अलग, दोनों एक-दूसरे के घोर विरोधी, पर निजी जीवन में सत्ता से ‘कमाई’, फिर कमाई से सत्ता का दर्शन एक. अब ये नेता बड़ी-बड़ी बातें करने लगे हैं. राजनीतिक सिद्धांत, दर्शन और मूल्यों की. देश में हुए बड़े नेताओं के नाम गिनाते हैं. खुद को उनका वारिस घोषित करते हैं. लेकिन इनके असल आचरण क्या हैं? भारत लूट में ये सभी एक जैसे हैं. यह है, आज के भारत की राजनीतिक दुनिया का असल सच.
 
सूचना है कि राडिया टेप में, मौजूदा भारतीय व्यवस्था को चलानेवालों की बातों का इस तफसील में ब्योरा है कि सुननेवाले के मस्तिष्क में व्यवस्था के अंदरूनी हालात की फिल्म स्वत: साफ हो जाती है. यह ‘पावर कॉरिडोर की ग्राउंड रियलिटी’ (सत्ता की दुनिया की जमीनी हकीकत) है. एक आदमी 300 करोड़ का कारोबारी हो जाता है. न उसके पास फैक्टरी है, न उसके कल-कारखाने में कोई उत्पादन है. न पूंजी निवेश है, न उसने पसीना बहाया है. बिना कर्म, श्रम या खटे उसके पूंजीपति बनने का असल राज, आज की व्यवस्था का असल रूप है. यही भारत की इस आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संकट में मूल में है. क्या इन बुनियादी सवालों पर कहीं कोई बहस है? असल मुद्दे कहीं और बात कहीं और.
 
धन्य है, इस देश का शासकवर्ग. इस पूरे प्रकरण को एक ज्वलंत उदाहरण से समङिाए. कोयला घोटाले की फाइलें गायब हैं. सरकार को यह कहने में कोई शर्म नहीं कि उसके पास से सबसे महत्वपूर्ण फाइलें गायब हैं. इन फाइलों में किये गये फैसलों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय, कोयला मंत्रलय, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, देश के बड़े अफसरों की टिप्पणियां-सिफारिशें दर्ज हैं. देश के बड़े घरानों द्वारा कराये गये कोल आबंटन के तथ्य दर्ज हैं. आरोप लगे कि ऊपर से नीचे तक इसमें गड़बड़ी हुई है. इन फाइलों में इस महाघोटाले के सूत्रधारों के चेहरे-करतूत दर्ज हैं. पर फाइलें सरकार की कस्टडी से गायब! इस ज्वलंत उदाहरण से बड़ा इस शासकवर्ग के चरित्र-हेकड़ी और अहंकार का क्या कोई दूसरा नमूना हो सकता है? एक महाघोटले की जांच शुरू हुई, तो सरेआम उसकी फाइलें गायब. कोई इसका नैतिक दायित्व लेने को तैयार नहीं. याद रखिए यह उसी मुल्क में हो रहा है, जहां कुछ लोगों की जान चली जाने पर लालबहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था.
 
लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. वे झारखंड-बिहार के लीडिंग न्यूजपेपर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.
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