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लखनऊ

उप्र में पीपीपी कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता समितियों में सिविल सोसाइटी को कोई जगह नहीं

लखनऊ । पीपीपी जिसे अंग्रेजी में 'पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप' और हिंदी में 'जन-निजी भागीदारी' कहा जाता है । यह हैरतअंगेज है कि जिस पीपीपी के नाम की शुरुआत ही 'पब्लिक' शब्द से होती है उसी पीपीपी के तहत स्वीकृत किये जाने वाली कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता समितियों में 'पब्लिक' यानि जनता की आवाज सरकार तक पंहुचाने बाली ‘सिविल सोसाइटी’ के सदस्यों के लिए कोई जगह ही नहीं है। इस तथ्य का खुलासा लखनऊ की सामजिक कार्यकत्री उर्वशी शर्मा द्वारा माँगी गयी एक आरटीआई से हुआ है ।
लखनऊ । पीपीपी जिसे अंग्रेजी में 'पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप' और हिंदी में 'जन-निजी भागीदारी' कहा जाता है । यह हैरतअंगेज है कि जिस पीपीपी के नाम की शुरुआत ही 'पब्लिक' शब्द से होती है उसी पीपीपी के तहत स्वीकृत किये जाने वाली कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता समितियों में 'पब्लिक' यानि जनता की आवाज सरकार तक पंहुचाने बाली ‘सिविल सोसाइटी’ के सदस्यों के लिए कोई जगह ही नहीं है। इस तथ्य का खुलासा लखनऊ की सामजिक कार्यकत्री उर्वशी शर्मा द्वारा माँगी गयी एक आरटीआई से हुआ है ।
बीते मार्च माह में  राजधानी लखनऊ की सामजिक कार्यकत्री उर्वशी शर्मा ने मुख्यमंत्री कार्यालय से आरटीआई के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप ( PPP) के तहत स्वीकृत किये जाने बाली कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता-समितियों में सिविल सोसाइटी के सदस्यों को सम्मिलित करने के सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किये गए प्रयासों/उपायों/प्रस्तावों से सम्बंधित अभिलेखों की नोट शीट्स सहित सत्यापित प्रतियाँ मांगी थी । मुख्यमंत्री कार्यालय ने उर्वशी की आरटीआई को उत्तर प्रदेश शासन के औधोगिक विकास विभाग को स्थानांतरित कर दिया था ।
 
उत्तर प्रदेश शासन के अवस्थापना विकास अनुभाग के अनुसचिव एवं जन सूचना अधिकारी हरनाम द्वारा उर्वशी को दी गयी सूचना के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी)  के तहत स्वीकृत किये जाने वाली कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता-समितियों में सिविल सोसाइटी के सदस्यों को सम्मिलित करने के सम्बन्ध में पी0 पी0 पी0 गाइड लाइन्स में कोई व्यवस्था निहित नहीं है तथा न ही किसी विभाग द्वारा ऐसा कोई प्रस्ताव अवस्थापना एवं औधोगिक विकास विभाग को उपलब्ध कराया गया है।
 
उर्वशी कहती हैं कि सरकारी परिभाषा के अनुसार पीपीपी परियोजना का अर्थ उस परियोजना से है जिसमें एक तरफ सरकार या स्वतंत्र अस्तित्व के वैधानिक निकाय और दूसरी ओर निजी क्षेत्र की कंपनी के बीच एक अनुबंध या रियायती अनुबंध होता है जो बुनियादी ढाँचागत सेवा प्रदान करने के लिए उपभोक्ता से शुल्क वसूल करेगी। जन-निजी भागीदारी (पीपीपी) दूसरी ओर एक ऐसा मॉडल है जिसमें सेवाप्रदाय का कार्य निजी क्षेत्र (अलाभकारी/लाभार्थ संगठन) द्वारा किया जाता है जबकि सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में सरकार या तो निजी भागीदार के साथ अनुबंध में शामिल रहती है या निजी क्षेत्र को सेवा प्रदान करने की प्रतिपूर्ति करती है। अनुबंध नई गतिविधियों को तत्परता प्रदान करता है विशेषकर, जब सेवा प्रदान करने के लिए न तो निजी क्षेत्र और न ही सार्वजनिक उपस्थित क्षेत्र होता है।
 
अतः पीपीपी परियोजनाओं को भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी से मुक्त रखने के लिए एवं इनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित कर जनता के हितों के महत्तम संरक्षण के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी)  के तहत स्वीकृत किये जाने बाली कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता-समितियों में सिविल सोसाइटी के सदस्यों को भी सम्मिलित रखने की व्यवस्था पी0 पी0 पी0 गाइड लाइन्स में किये जाने की मूलभूत आवश्यकता थी किन्तु हमारी सरकार द्वारा ऐसा नहीं किया गया है । उर्वशी के अनुसार यही कारण है कि आये दिन पीपीपी परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं और जनता पीपीपी के तहत आने वाली कार्ययोजनाओं को आत्मसात नहीं कर पा रही है ।
 
उर्वशी शर्मा ने लखनऊ के स्वयंसेवी संगठन येश्वर्याज सेवा संस्थान के माध्यम से  प्रदेश सरकार और भारत सरकार को इस सम्बन्ध में पत्र लिखकर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी)  के तहत स्वीकृत किये जाने वाली कार्ययोजनाओं की स्वीकर्ता-समितियों में सिविल सोसाइटी के सदस्यों को भी सम्मिलित किये जाने की व्यवस्था पी0 पी0 पी0 की गाइड लाइन्स में किये जाने का अनुरोध किया है ।
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