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‘विस्फोट’ के अलावा ‘मोहल्ला’ भी संकट में : हम अच्छे हिंदी पोर्टलों को आर्थिक मदद क्यों नहीं दे सकते!

विकास कुमार गुप्ता ने  अपने आलेख ‘संजय और विस्फोट के बहाने हिंदी न्यू मीडिया की पड़ताल’ में सच्चाई बयान की है। आजकल जब बड़े-बड़े मीडिया घराने संकट से जूझ रहे हैं, तो वह हिंदी न्यू मीडिया कब तक जिंदा रह सकता है, जिसके पास आय के साधन न के बराबर हैं। 'विस्फोट' ही क्यों, इस जैसे कई पोर्टल अंतिम सांसें गिन रहे लगते हैं। 'मोहल्ला लाइव' 3 अगस्त के बाद अपडेट नहीं किया गया। क्या यह इस ओर इशारा है कि 'मोहल्ला' भी अब गुजरे जमाने की बात होने वाला है। वैचारिक बहस के लिए जाने, जाने वाला 'मोहल्ला' दम तोड़ देगा, तो बहुत नुकसान होगा। 
विकास कुमार गुप्ता ने  अपने आलेख ‘संजय और विस्फोट के बहाने हिंदी न्यू मीडिया की पड़ताल’ में सच्चाई बयान की है। आजकल जब बड़े-बड़े मीडिया घराने संकट से जूझ रहे हैं, तो वह हिंदी न्यू मीडिया कब तक जिंदा रह सकता है, जिसके पास आय के साधन न के बराबर हैं। 'विस्फोट' ही क्यों, इस जैसे कई पोर्टल अंतिम सांसें गिन रहे लगते हैं। 'मोहल्ला लाइव' 3 अगस्त के बाद अपडेट नहीं किया गया। क्या यह इस ओर इशारा है कि 'मोहल्ला' भी अब गुजरे जमाने की बात होने वाला है। वैचारिक बहस के लिए जाने, जाने वाला 'मोहल्ला' दम तोड़ देगा, तो बहुत नुकसान होगा। 
'मोहल्ला' भी अक्सर पोर्टल चालू रखने के लिए चंदा देने की अपील करता रहता है। हो सकता है कि मोहल्ला के अविनाश कहीं और व्यस्त रहने की वजह से उसे अपडेट नहीं कर पा रहे हों, लेकिन पाठकों में तो यही संदेश जा रहा है कि वह अब बंद होने के कगार पर आ गया लगता है। बहरहाल, बात विस्फोट की हो रही थी। दरअसल, विस्फोट जैसे समाचार-विचार वाले पोर्टलों से सबसे ज्यादा फायदा प्रिंट मीडिया ने ही उठाया है। देश के कई अखबार हैं, जो विस्फोट से नामचीन लेखकों के लेख उठाकर संपादकीय पृष्ठों पर प्रकाशित कर रहे हैं। 
 
लखनऊ के कई अखबार विस्फोट से उठाकर मेरे लेख प्रकाशित करते हैं। लखनऊ के ‘डीएनए’ ने एक सितंबर को ही अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी से हुई मेरी बातचीत को प्रकाशित किया है, जो पहले जनवाणी में छपी और फिर विस्फोट पर उसका प्रकाशन हुआ। न्यूज पोर्टलों से लेख उठाकर छापने से अखबारों का पैसा बचता है। ऐसे में जब विस्फोट धन के अभाव में बंद हो गया है, तो उन अखबारों की जिम्मेदारी बनती है कि वे लेख उठाने की एवज में विस्फोट को पैसा दें। भले ही इतना न दें, जितना वे लेखक को देना चाहते हैं।
 
कोई भी अखबार कम से कम 500 रुपये एक लेख के देता है। यदि अखबार विस्फोट या उस जैसे किसी और पोर्टल से लेख उठाते हैं, तो कम से कम 250 रुपये प्रति लेख ही अदा कर देंगे, तो हिंदी न्यू मीडिया के सामने ऐसा संकट नहीं आएगा, जैसा विस्फोट के सामने आएगा। संजय तिवारी जीवट वाले आदमी हैं। छल-कपट से दूर इस आदमी ने बहुत बहादुरी के साथ विस्फोट चलाया। रास्ते में कई दानवीर भी मिले होंगे, लेकिन कोई कब तक किसी के साथ चल सकता है, वह भी तब, जब राह पथरीली हो।
 
लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सब एडिटर हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. 
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