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उत्तराखंड

कुछ महिलाएं और बच्चे रो रहे थे क्योंकि सबको आपदा के बाद से ही डर सताने लगा था…

Mayank Saxena : तारीख याद करता हूं, 24 जून की एक रात मयाली कस्बा…एक छोटे से अजीबोगरीब और अवैध तरीके से कई मंज़िलों में बनाए गए एक होटल में हम रात काट रहे थे…अचानक रात 12 बजे तेज़ बारिश शुरू हो गई…कुछ देर बाद ज़ोर की आवाज़ा हुई, पता चला कि होटल के ठीक सामने तिराहे पर बहने वाला गदेरा (झरना) टूट गया है और वहां से लैंड स्लाइड में पत्थर और मलबा बिजली की तेज़ी से सड़क पर इकट्ठा होने लगा है… ज़्यादातर साथी सोने लगे थे…दूसरे कमरों में कुछ महिलाएं और बच्चे रो रहे थे क्योंकि सब को आपदा के बाद से ही डर सताने लगा था…हम ने कुछ मोमबत्तियां जला कर उनको दी और ढांढस बंधाया… 
Mayank Saxena : तारीख याद करता हूं, 24 जून की एक रात मयाली कस्बा…एक छोटे से अजीबोगरीब और अवैध तरीके से कई मंज़िलों में बनाए गए एक होटल में हम रात काट रहे थे…अचानक रात 12 बजे तेज़ बारिश शुरू हो गई…कुछ देर बाद ज़ोर की आवाज़ा हुई, पता चला कि होटल के ठीक सामने तिराहे पर बहने वाला गदेरा (झरना) टूट गया है और वहां से लैंड स्लाइड में पत्थर और मलबा बिजली की तेज़ी से सड़क पर इकट्ठा होने लगा है… ज़्यादातर साथी सोने लगे थे…दूसरे कमरों में कुछ महिलाएं और बच्चे रो रहे थे क्योंकि सब को आपदा के बाद से ही डर सताने लगा था…हम ने कुछ मोमबत्तियां जला कर उनको दी और ढांढस बंधाया… 
Aj Singh, Pushpendra Singh, Nandan Tripathi, Gaurav Gupta और मैं हालात का जायज़ा लेने बाहर निकले तो रूह कांप गई…सामने झरने की लैंड स्लाइड से बह कर टन भर भारी पत्थर तक आ रहे थे…
पानी बह कर सड़क पर मलबा भरता जा रहा था, ज़्यादातर गाड़ियां मलबे में फंस गई थीं…कुछ बुरी तरह क्षतिग्रस्त थीं… हम दौड़ कर अंदर गए और सोच ही रहे थे कि किसे किसे जगाया जाए…तब तक पानी और मलबा बह कर होटल में भरने लगा…घनसाली से आने वाला रास्ता बंद हो चुका था…गुप्तकाशी जाने का मार्ग भी बंद हो गया था…तब तक पानी और मलबा होटल में बढ़ता गया… 
 
Ila Joshi, Zahreelaa Tapan, Nitish K Singh, Amit Dharmendra समेत सभी को जगाया गया…और हम सिर्फ मोबाइल, पैसे, टॉर्च और रेनकोट ले कर बाहर आ गए…बाकी सामान होटल में ही छोड़ा गया…
सड़क पर घुटने तक पानी भर गया था और लगातार पानी के साथ बड़े बड़े बोल्डर पत्थर बहते चले आ रहे थे…हम समझ नहीं पा रहे थे कि रिहायशी इलाके के घरों और होटलों में भरते जा रहे पानी और मलबे को कैसे रोका जाए…
बस उस घड़ी सभी को लगा कि शायद ये ज़िंदगी की आखिरी रात है, हम सभी ने एक दूसरे को गले लगाया, दोस्तों-नज़दीकियों को फोन लगा कर अपने कपड़े के रंग और लोकेशन की जानकारी दी…और फिर जुट गए अभी तक के सबसे मुश्किल मिशन मे…
 
मुंह में टॉर्च दबा कर हम 8 लोग पानी में उतरे…बाकी साथी पत्थरों को होटलों और घरों के आगे लगा कर उनमें घुसते पानी को रोकने में लग गए… हम लोगों ने बड़े पत्थरों को पकड़ कर पानी के बहाव और झरने के बीच लगाना शुरु किया…धीरे धीरे कतार बनाते गए और फिर एक के बाद एक पत्थर लगाते गए…धीरे धीरे एक छोटा सा बांध तैयार हो गया और पानी की धारा का रुख खाई की ओर मुड़ गया…हम खुश थे और चिल्ला रहे थे..घर बच गए थे और संभवतः हम सब भी…बाकी लोग हम को हैरानी से देख रहे थे…
 
रात वहां फंसी बसों और ऊपर के ढाबों की टीन के नीचे काटी गई…सुबह जेसीबी के आने के बाद टीम ने मिल कर गुप्तकाशी की ओर जाने वाली सड़क की मरम्मत की और रास्ता खुल गया… आपको मालूम है हम तबसे लगातार रास्ते खोल रहे हैं…भौगोलिक भी और दिलों के भी… बूंद Boond की उम्मीद उत्तराखंड Ummeed Uttarakhand टीम यहां तब थी जब प्रशासन और पुलिस नदारद थे…कई एनजीओ के दलाल पैसे बटोरने की आदिकालीन उम्मीद में थे…लेकिन अब…
 
अब वो पुलिस और प्रशासन हमें यहां से भगाना चाहते हैं…बिना कोई कारण दिए…हमने भी तय किया है कि हम यहां से नहीं जाएंगे…उम्मीदों को छोड़ कर जाना ज़िंदगी का रास्ता नहीं है… सवाल ये है कि क्या आप हमारे साथ हैं…?
 
पत्रकार और एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.
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