Vineet Kumar : बैकुंठ के चौदह दिन.. कारावास में उपवास… सलाखों में साधना… जेल में हरिओम… बापू का वैराग्य….अगले चौदह दिनों में आसाराम को लेकर चलनेवाली न्यूज चैनलों की स्टोरी की ये थीम और स्लग है..पूरी उम्मीद है कि इस दौरान न्यूज चैनल आसाराम की ऐसी ही और इसी के आसपास छवि बनाने की कोशिश करेंगे जिससे कि सबकुछ जल्द ही सामान्य हो जाएग.
हजारों भक्तगणों की आवारा हो चुकी, भटकी आस्था धीरे-धीरे वापस आ सके. वैसे भी कल एबीपी न्यूज उसके बचपन की गाथा को जिस अंदाज में दिखा रहा था, आगे वासुकी का रुप देने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा..चैनलों ने इस बीच जो कई किसिम के पर्यायवाची शब्द इजाद कर लिए थे, सब एक-एक करके बिलाते चले जा रहे हैं और फिर धीरे-धीरे बापू की तरफ लौट रहे हैं. बाबा के "निर्मल" होने की ये स्वाभाविक प्रक्रिया है.
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Vineet Kumar : आप भूल जाइए कि आसाराम के विरोधियों ने, उसके आलोचकों ने, शरद यादव जैसे नेता और मीडिया ने उसके साथ क्या किया, कैसे खिलाफ में माहौल बनाया..बस एक बार सिलसिलेवार ढंग से उसकी उन तमाम ड्रामेबाजी, ओछेपन पर गौर कीजिए और मैट्रिक तक पढ़ी गई किसी भी किताब से एक संत के चरित्र से मिलान कीजिए, तब आप इस नतीजे पर पहुंचिए कि उसके साथ कुछ भी किया गया वो जरुरी है या नहीं, ये काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था या नहीं ? आसाराम को उसके विरोधियों ने नहीं, उसके चरित्र और व्यवहार ने उसे संत के बजाय एक औसत दर्ज के गएगुजरे इंसान के दर्जे में डाला है. कल को उसके निर्दोष साबित होने के बावजूद स्क्रीन पर जो व्यवहार करता दिखा, वो उसे संत तो दूर, ठीकठाक इंसान होने में शक पैदा करेगा.
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Vineet Kumar : आपको लग रहा होगा कि न्यूज चैनल आसाराम की धुंआधार कवरेज से अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ लड़ रहे हैं, नहीं जी..वो उस रिवन्यू सिस्टम से हार रहे हैं जहां दो दिनों तक इस कवरेज के जरिए आसाराम जैसे शख्स को पाखंडी,धोखेबाज,उसकी हरकतों को ड्रामा और गुंडई बताने के कुछ ही दिनों बाद अपने यहां ऐसी जगह तैयार करेंगे हैं, जहां आधे-एक घंटे सिर्फ वो, उनके ड्रामे और प्रवचन होंगे. बीच में कोई लक्स कोजी से निकलनेवाले चूजे और 140 रुपये की गैस नहीं डियो उड़ानेवाले लौंड़े के पीछे आधे दर्जन लड़कियां होगी बल्कि शांतचित्र सिर्फ बाबा और उनके अमृतवचन होंगे. इसे विज्ञापन कहा जाएगा जी और आप तो जानते ही हैं टीवी में विज्ञापन का मतलब होता है महामृत्युंजय जाप जिसके बीच में किसी तरह की खलल नहीं डाली जाती, ऐसा विधान है. हैं जी, आप पूछते हैं तब चौथे खंभे का क्या होगा ? लो कल्ल लो बात. इसमे पूछना क्या है ? आइबीएन 7 की बुलेटिन ढोल-नगाड़े की ट्यून की तरह वैसे ही शुरु होगी जैसे कि मंडी हाउस से कोई भारी रैली निकल रही है और उस पर निर्मल दरबार लगेगा और पीछे से तीन-साढ़े तीन सौ लोगों की विदाई होगी..अजी, गांवघर में इसे कहते हैं- जात भी गंवाना और भात भी न खाना..सब साथे-साथ चलेगा जी..छंटनी भी और कमाई भी. पाखंड भी और पाखंड उन्मूलन कार्यक्रम भी..है न ओरोजिनल तमाशा..बीच-बीच में भूख लगने पर पेटिस( नॉट पेचिश)- बर्गर और कोक-शोक भी चलेंगे..तो डन न जी.
युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.