Dr. Kumar Vishwas : एक थी संतोष… बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की शब्दावली के अनुसार 'दलित' कहलाने वाले एक परिवार की बेटी। चेतना की पहली सीढ़ी पर उसका सामना उस दुकानदार से हुआ, जिसकी दुकान के बाहर 'सरकारी राशन की दुकान' का बोर्ड लगा था। उस दुकान के बारे में उसने सुना था, कि वहां से उसे और उसके परिवार के लिए सस्ता राशन मिलेगा। लेकिन यह भ्रम टूटने में ज्यादा समय नहीं लगा, क्योंकि वहाँ शायद ही कभी राशन मिलता था। लेकिन क्यों? इस बात की पड़ताल करने में जुटी, तो जमाखोरी, कालाबाजारी और भ्रष्टाचार की एक पूरी काली दुनिया नज़र आई। अब क्या?
अब उसने तय किया, कि इस सिस्टम के खिलाफ लड़ेगी। तो पता चला कि देश भर में लाखों ऐसी दुकानें हैं। कैसे लडूं? उसने हथियार ढूँढने शुरू किए, तो उसे मिला RTI, जिसके सहारे उसने राशन माफियाओं से लोहा लेना शुरू किया। धीरे धीरे अरविन्द केजरीवाल के संपर्क में आई, और उसकी लड़ाई को बल मिला।
नतीजा यह हुआ, कि एक तरफ तो दिल्ली के कई राशन माफियों को उसने किनारे कर दिया, लेकिन दूसरी तरफ इस प्रयास में संतोष पर नौ बार जानलेवा हमले हुए। आखिरी हमला बीते जून में किया गया, जिसने उस योद्धा को हम सब से छीन लिया। चुनाव लड़ने वाली थी, जीतने वाली थी, लेकिन…। कहते हैं, कि क्षेत्र के विधायक धींगान के लोगों द्वारा कई दिन से मार डालने की धमकियाँ भी दी जा रही थीं।
उस षड़यंत्र ने संतोष को शांत कर दिया, लेकिन उसकी लड़ाई को कोई भी षडयंत्र नहीं रोक सकता। कांग्रेसी सरकार के 'भारत-निर्माण' के इस वीडियो में भी साफ़-साफ़ स्वीकार किया गया है, कि सरकारी वितरण व्यवस्था में अन्दर तक धांधली फैली हुई है, और कहीं न कहीं से एक संतोष को निकल कर बाहर आना पड़ता है, ताकि गलत व्यवस्था को सुधारा जा सके।
http://www.youtube.com/watch?v=JU7RaY8dmG4
यह टीवी है, इसलिए यहाँ एक पोलिश्ड चेहरा प्रस्तुत किया गया है… वरना अपनी संतोष के चेहरे पर तो सच्चाई की चमक होती थी, संघर्ष का तेज होता था, सफलता की मुस्कान होती थी, जूनून का रंग होता था और उत्साह की लालिमा होती थी। तुम्हारी लड़ाई जारी है संतोष!
डा. कुमार विश्वास के फेसबुक वॉल से.





