पंकज शर्मा का तबादला दिल्ली हो गया और मैं स्थायी रूप से मेरठ आ गया। यों तो मेरठ से जुड़ी कई यादें हैं मगर इनमें मुख्य है मेरी पिटाई। मेरे साथ जैसा कि नौकरियों के मामले में हुआ है कि अनायास ही मिलती रहीं उसी प्रकार पिटाई के मामले में भी हुआ। किसी से कोई विवाद नहीं था और न ही किसी खबर को ले कर कोई पंगा था। कहने का मतलब कि पिटाई के लिए कोई भी परिस्थिति नहीं थी फिर भी पिटाई हो गई। है ना अजीब बात। हुआ यह कि मेरठ पालिका के कर्मचारियों को कोई युवक नवभारत टाइम्स के नाम पर परेशान कर रहा था। मेरे पास फोन आया तो मैंने कह दिया कि अगली बार जब वह आए तो उसे बिठा लेना और मुझे फोन कर देना।
दो दिन बाद फोन आया तो मैं एक मित्र के स्कूटर पर पालिका पहुंच गया। मित्र स्कूटर खड़ा करने के लिए रुक गया और मैं अंदर चला गया। वहां देखा तो कई कर्मचारी एक युवक को घेरे बैठे थे और उसकी पिटाई कर रहे थे। मैंने जाते ही उनसे मारपीट के लिए मना किया तो उन्होंने मुझे उसका हिमायती समझ लिया और जब तक मित्र अंदर आते, मुझ पर दो चार हाथ पड़ चुके थे। मित्र ने लोगों को हड़काया और बताया कि आप लोग जिसे मार रहे हैं वह नभाटा का पत्रकार है। यह सुन कर वह लोग घबरा गए और माफी मांगने लगे। इस बीच वहां खासी भीड़ जमा हो गई थी और इस अफरातफरी का लाभ उठा कर फर्जी पत्रकार फरार हो चुका था।
मित्र ने पुलिस बुलाने की बात कही तो वह लोग और अधिक घबरा गए और हम दोनों के पैर पकड़ने लगे। उनके अधिकारी को बुलाने को कहा तो पता चला वह आज नहीं आए हैं। खैर, माफी तलाफी के बाद हम लोग चले आए। इस बीच अन्य पत्रकारों को भी पता चल गया। सब पूछने आ रह थे। जो हुआ वह बता दिया। साथ में निवेदन भी किया कि इस मामले को इश्यू न बनाएं क्योंकि जो हुआ वह गलतफहमी में हुआ है। मगर पत्रकार कहां मानने वाले थे। अगले दिन सबने मजे लेकर खबर को छापा और कई ने जैसा कि पत्रकारों की आदत होती है, इसे प्रेस की आजादी पर हमला बता दिया। अगले दिन जैसे ही कार्यालय गया, पालिका की अधिकारी बैठी मिलीं। वह काफी परेशान थीं कि मामला तूल पकड़ गया तो उन्हें परेशानी होगी। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि आगे कुछ नहीं होगा। मामला यहीं समाप्त मान लें।
मेरठ में दूसरी पिटाई भी बिना किसी पूर्व निधारित्र कार्यक्रम के ही हो गई। दिल्ली से फोटाग्राफर कमलजीत सिंह मेरठ घूमने आया था। उसे साथ लेकर मैं पैदल ही कचहरी की ओर जा रहा था। रास्ते में देखा कि बेगम समरू की हवेली तोड़ी जा रही थी। कुछ मजदूर काम पर लगे थे और पास ही एक शेड में तीन चार कुर्सियां पड़ी थीं जिन पर दो आदमी बैठे तोड़फोड़ की निगरानी कर रहे थे। तोड़ फोड़ देख कर कमलजीत का फोटोग्राफर जाग गया और उसने एक फोटो क्लिक कर लिया। यह देख कर उन दो में से एक ने कमलतीत को दौड़ा लिया। मैंने कमलजीत को भाग कर कार्यालय पहुंचने को कहा। कैमरा कीमती था। उसे भी बचाना था। उस आदमी ने कमलजीत का पीछा छोड़ दिया और मेरे पास आ गया। जब तक मैं कुछ कहूं, उसने दो हाथ मुझ पर जमा दिए। मैंने उसे बताया कि हम पत्रकार हैं तो उसने दो हाथ और जमा दिए और बोला बहुत तोप समझता है अपने आप को। अब मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे हड़काया और शेड में उसकी कुर्सी पर आ कर बैठ गया। इस बीच वहां से दो परिचित वकील गुजर रहे थे। उन्होंने मुझे देखा तो रुक गए और मामले के बारे में पूछा। पता चलने पर एक ने कहा कि अभी पुलिस बुलाते हैं, ये लोग रोजाना गुजरने वालों को परेशान करते हैं।
इस बीच कमलजीत पुलिस के साथ आ गया तो मेरा हौसला बढा। मैंने मेरी पिटाई करने वाले की लात घूंसों से पिटाई आरंभ कर दी। खैर, बीचबचाव के बाद सब थाने आ गए। थाने आकर पुलिस ने भी उन पर दो-दो हाथ जमा दिए। वह दोनों हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे कि माफ कर दिया जाए, उनसे बहुत भारी गल्ती हो गई। दारोगा ने मुझसे पूछा कि अब क्या चाहते हैं। मैं भी रपट के मूड में नहीं था। मैंने कहा कि अगर ये लोग माफीनामा लिख कर दें और एक दूसरे को पांच पांच चप्पल मारें तो बात निपट सकती है। वे लोग अपना पीछा छुड़ाना चाहते थे सो तुरंत तैयार हो गए। मैंने दारोगा को इशारा कर दिया कि वह चाहे तो अपनी दिहाड़ी बना सकता है। दारोगा ने हमको विदा कर दिया और उन्हें रोक लिया। थोड़ी देर बाद वे लोग भी आफिस आ गए और फिर माफी मांगने लगे। मामला निपट ही गया था। मुझे भी दिल्ली आना था। धर्मवीर सहाय यहां ज्वाइन कर चुके थे। मैंने उनसे कहा कि इस मामले को खबर न बनाएं। मैं दिल्ली आ गया। अच्छी बात यह रही कि यह मामला खबर नहीं बना। अपनी पिटाई की बार बार खबर बनाना मुझे पसंद भी नहीं था।
डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 0931207699 के जरिए किया जा सकता है.
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नभाटा में पहला दिन : नियुक्ति पत्र देखते ही चिढ़ गया पंकज शर्मा





