देहरादून। जो उत्तराखण्ड राज्य शहीदों की शहादत के बाद बना हो, उन शहीदों के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री के दो पुष्प भी उनकी शहादत दिवस पर मयस्सर नहीं हो पाए। राजधानी देहरादून से खटीमा तो दूर है, लेकिन मात्र 22 किलोमीटर तक भी बीते दिन शहीदों के शहादत दिवस पर मसूरी झूलाघर नहीं पहुंच पाए। रस्म अदायगी के लिए वे मंगलवार सुबह मसूरी जाना चाह रहे थे लेकिन कार से जाने के बजाय दो बार प्रयास के बाद भी हैलीकाप्टर महज 22 किलोमीटर की यात्रा नहीं कर पाए ।
उल्लेखनीय है कि तमाम शहीदों की शहादत के बाद उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आया। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से पूर्व के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों को शहादत से बने इस राज्य के शहीदों का शहादत दिवस याद रहा और उन्होंने शहीदों के शहादत दिवस पर उनके चित्रों के समक्ष दो पुष्प अर्पित भी किए, लेकिन प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के हाथों दो पुष्प पाने के लिए राज्य के शहीद तरसते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं गए।
गौरतलब हो कि एक सितम्बर 1994 को खटीमा गोलीकाण्ड में तीन राज्य आंदोलनकारी शहीद हो गए थे, जबकि दो सितम्बर 1994 को मसूरी में गोलीकाण्ड हुआ था, जिसमें छह: राज्य आंदोलनकारी राज्य के लिए शहीद हो गए थे। इसके बाद महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर दो अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा काण्ड हुआ और इस काण्ड ने राज्य आंदोलन को और भड़का दिया, महीनों तक समूचा उत्तराखण्ड कर्फ्यू की मार झेलता रहा।
तमाम शहादतों के बाद नौ नवम्बर 2000 को शहीदों के सपनों का उत्तराखण्ड अस्तित्व में आया। राज्य बने हुए बारह साल गुजर चुके हैं, इन बारह वर्षों में छहः मुख्यमंत्री देखे। जिसमें दो बार भुवन चंद खण्डूडी मुख्यमंत्री रहे, लेकिन राज्य बनने से आज तक प्रदेश से सभी मुख्यमंत्रियों ने एक सितम्बर को खटीमा व दो सितम्बर को मूसरी शहादत दिवस पर अपने श्रद्धासुमन राज्य आंदोलनकारियों को अर्पित किए। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जो राज्य आंदोलनकारियों की शहादत दिवस पर राज्य आंदोलनकारियों को एक पुष्प भी श्रद्धा के भेंट नहीं कर पाए। राजनैतिक गलियारों में जब इस बात की चर्चा हुई तो मुख्यमंत्री को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे आज प्रातः देहरादून से मसूरी मात्र 22 किलोमीटर की यात्रा भी कार के बजाए हैलीकाप्टर करने कि कोशिश की जिसमे वे सफल नहीं हो पाए , जिसका राज्य आंदोलनकारियों ने विरोध किया है।
राज्य आंदोलनकारी रहे राधा कृष्ण गैरोला ने कहा कि जिन्होंने राज्य के लिए संघर्ष ही नहीं किया हो और जिन्हें राज्य आंदोलन के उस जुनून का अहसास नहीं है, उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों से राज्य आंदोलनकारियों के प्रति अपेक्षा करना सरासर बेईमानी होगी। ऋषिकेश के रवि कुमार जैन का कहना है कि खटीमा और मसूरी गोलीकाण्ड की बरसी पर आंदोलन के जख्म हरे हो गए हैं, उन्होंने कहा कि इतना बड़ा स्वतः स्फूर्त आंदोलन विश्व के लिए एक मिशाल है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि जिन्होंने राज्य के लिए संघर्ष ही नहीं किया, जिन्हें उस जुनून का अहसास नहीं है, वो शहीदों की शहादत क्या जाने।
लेखक राजेंद्र जोशी उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.





