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आरक्षण दिला पाएगा कांग्रेस को मुस्लिम वोट?

इसे इत्तेफाक कहा जाए या सोची-समझी रणनीति कि लोकपाल का मुद्दा भी कांग्रेस की मुस्लिम-नवाज रणनीति के दायरे में आ गया। इस मुद्दे पर भी कांग्रेस ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि वह रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में ही मुसलमानों को आरक्षण नहीं दे रही है, बल्कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संस्था में भी उन्हें आरक्षण देने का प्रयास कर रही है। संसद में लोकपाल पर होने वाली बहस में मूल मुद्दा तो पीछे चला गया, पूरी चर्चा अल्पसंख्यक सियासत पर सिमट कर रह गई।

इसे इत्तेफाक कहा जाए या सोची-समझी रणनीति कि लोकपाल का मुद्दा भी कांग्रेस की मुस्लिम-नवाज रणनीति के दायरे में आ गया। इस मुद्दे पर भी कांग्रेस ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि वह रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में ही मुसलमानों को आरक्षण नहीं दे रही है, बल्कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संस्था में भी उन्हें आरक्षण देने का प्रयास कर रही है। संसद में लोकपाल पर होने वाली बहस में मूल मुद्दा तो पीछे चला गया, पूरी चर्चा अल्पसंख्यक सियासत पर सिमट कर रह गई।

अपने सहयोगी दलों के दबाव की आड़ में सरकार ने आखिरकार लोकपाल के पदों में घोषित आरक्षण के दायरे में अल्पसंख्यकों को भी शामिल कर लिया। दरअसल किसी संवैधानिक संस्था के पदों पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की व्यवस्था नहीं है, इसलिए केंद्र सरकार ने मूल विधेयक में अल्पसंख्यक आरक्षण की बात, जो पहले शामिल थी, उसे हटा दिया। इसकी वजह से लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस पर संघ परिवार से गठजोड़ करने का आरोप लगाया था। यह चुनावी सियासत का ही असर था कि इस मुद्दे पर लोकसभा को दिन में तीन बार स्थगित करना पड़ा।

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव सदन के बाहर ही कह चुके थे कि जब तक अल्पसंख्यकों को कोटा नहीं दिया जाएगा, वह सदन में बहस नहीं चलने देंगे। सदन में पहले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव लालू के समर्थन में आए, फिर बसपा और वामदल भी अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के मसले में कूद प़डे, क्योंकि ये दल भी अपने आप को मुसलमानों के मसलों का चैंपियन मानते हैं। बसपा ने कहा कि अल्पसंख्यक आरक्षण के बिना उसे लोकपाल मंजूर नहीं होगा, बल्कि उसने यहां तक कहा कि अगर अल्पसंख्यकों को कोटा देने में संविधान में संशोधन की जरूरत है तो बसपा केंद्र सरकार का सहयोग करने को तैयार है। अंतत: सरकार ने इस मामले पर झुकना ठीक समझा ताकि मुसीबत बन चुके लोकपाल विधेयक को पारित करवाया जा सके।

दरअसल अल्पसंख्यकों का कोटा शामिल करने के लिए  सरकार को संवैधानिक संशोधन लाना होगा, जिसके लिए उसे दो तिहाई बहुमत की मंजूरी लेनी होगी। कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा इसका समर्थन नहीं करेगी, इसलिए ऐसा संशोधन मंजूर ही नहीं होगा। तब वह आरक्षण के लिए दबाव डालने वाले लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं को यह जताने की कोशिश करेगी कि हमने तो अपनी तरफ से कोशिश जरूर की, लेकिन भाजपा ने इसमें रोड़ा लगा दिया। अगर लोकपाल विधेयक संसद में पारित हो भी गया तो अल्पसंख्यक आरक्षण के मुद्दे पर यह मामला उच्चतम न्यायालय में जा सकता है।

भाजपा का कहना यह है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण संविधान के प्रतिकूल है, इसलिए मुसलमानों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने धमकी दी कि वह अल्पसंख्यक आरक्षण हटाने के लिए संशोधन प्रस्ताव लाएंगी। अगर भाजपा अड़ जाती है तो लोकपाल के मुद्दे पर सहमति के तार जोड़ना मुश्किल हो जाएगा और लोकपाल जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा सियासी खींचतान की भेंट चढ़ जाएगा। समूची बहस अल्पसंख्यक समर्थक बनाम अल्पसंख्यक विरोधी खानों में बंट कर रह जाएगी। तमाम सियासी दलों ने लोकसभा में जो व्यवहार किया, उससे लगता है कि राजनीतिक दलों की नजर में ज्भ्रष्टाचार की तुलना में अल्पसंख्यक का मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्था में समाज के कमजोर वर्ग, खासतौर से अल्पसंख्यकों को लेना जरूरी है? जहां तक इसके कानूनी पहलू का सवाल है, कानून विशेषज्ञों की इस सिलसिले में मिली-जुली राय है। भारत के दो पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे.एस. वर्मा और जस्टिस वी.एन. खरे ने इस बात पर सहमति जताई है कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था में समाज के सभी वर्गो का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसमें भारत की सांस्कृतिक विविधता भी नजर आनी चाहिए। इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्णा का कहना था, लोकपाल का काम है भ्रष्टाचार से लड़ना। इसमें उन्हीं लोगों को लेना चाहिए जो इस काम में सक्षम हों। यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कौन ब्राह्मण है और कौन मुसलमान। भारत के पूर्व महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने कहा, नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में तो आरक्षण देना ठीक है पर भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्था लोकपाल में इस आरक्षण की कोई तुक नहीं है।

दलितों और मुसलमानों के हिमायती के रूप में चर्चित जस्टिस राजीव धवन का कहना था, लोकपाल एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मामला है। इसे आरक्षण के तमाशे में बदलना मुनासिब नहीं होगा। जबकि उधर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस थॉमस का कहना है कि चूंकि संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है, इसलिए आस्था और धर्म के आधार पर उन्हें आरक्षण कैसे दिया जा सकता है? राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य केकी एन. दारूवाला की राय है कि चूंकि लोकपाल एक जांच एजेंसी है, लिहाजा इसमें आरक्षण का कोई सवाल ही नहीं है। इसमें ईमानदार और अपने काम में दक्ष लोगों की ही आवश्यकता है।

बहरहाल अभी तक तो लोकपाल बिल टीम अण्णा और कांग्रेस के बीच कशमकश का जरिया बना हुआ था, अब उसे आरक्षण जैसे कई और विवादों में भी घसीटा जा सकता है, ताकि यह कभी परवान ही न चढ़ सके। कांग्रेस इस मामले में कितनी ईमानदार है, यह तो वक्त ही बताएगा, फिलहाल तो उसकी नजर उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव में लोकपाल के मुद्दे को ज्मुस्लिम रंग देकर इसे भी भुनाने पर है। अण्णा हजारे को आरएसएस का एजेंट बता कर वह पहले भी मुसलमानों को इसके खिलाफ लामबंद करने का प्रयास करती रही है।

उधर नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा भी विवादों में उलझता दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग कोटे में अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत कोटा निर्धारित कर उत्तर प्रदेश चुनाव में मुसलमानों के एकमुश्त वोट हासिल करने का सपना तो जरूर देख रही है मगर यह उतना आसान नहीं है, जितना कि उसे लग रहा है। अधिकांश मुस्लिम संगवनों और नेताओं ने इस कोटे को नाकाफी बताया है।

राजनीतिक स्तर पर भी केंद्रीय कैबिनेट के फैसले पर असंतोष जताया जा रहा है। समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में 18 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की है तो मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों के लिए अलग से 10 प्रतिशत और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण की जरूरत पर जोर दिया है। भाजपा तो अल्पसंख्यक आरक्षण का विरोध कर ही रही है। इसके उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी का कहना है, हुकूमत ने मुसलमानों के साथ सियायी फ्रॉड किया है। इससे मुसलमानों को कोई फायदा नहीं होगा। सरकार के इस कदम से धार्मिक वैमनस्य पैदा होगा। सरकार ने किसी के हक को छीन कर किसी दूसरे को देने का काम किया है। इससे तो देश में ज्सिविल वार की स्थिति पैदा हो सकती है।

जमात-ए-इस्लामी  हिंद के अध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी की शिकायत है कि आरक्षण के लिए मुसलमानों की जो मांग थी, उसे सरकार ने पूरा नहीं किया। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमानों को 10 फीसदी आरक्षण अलग से मिलना चाहिए। मौलाना उमरी का मानना है कि इससे तो खुद मुसलमानों के विभिन्न वर्गो में खींचतान पैदा होगी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना कल्बे जव्वाद भी इस आरक्षण से संतुष्ट नहीं हैं। उनको इस बात पर एतराज है कि मुसलमानों को कोटे में से कोटा दिया गया है। दूसरी बात यह कि इससे सिर्फ पिछ़डे मुसलमानों को फायदा होगा जबकि शेख, सय्यद, मुगल और पठान जैसे उच्च वर्गो की हालत उनसे भी ज्यादा खराब है।

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सरकार के इस फैसले को धोखा करार देते हुए कहा, इसे 18 प्रतिशत होना चाहिए। 4.5 फीसदी कोटे से अल्पसंख्यकों का भला नहीं होगा। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने भी कैबिनेट के फैसले को असंतोषजनक बताया है। उन्होंने कहा है, रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछ़डेपन के आधार पर मुसलमानों के लिए 10 और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत की सिफारिश की गई थी। जमीयत उल उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने केंद्र सरकार से आग्रह  किया है कि वह इस फैसले को सिर्फ चुनावी हथकंडा बनने से बचाए, ताकि इसके सकारात्ममक परिणाम सामने आ सकें। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना निजामुद्दीन ने इस फैसले को ऐतिहासिक तो माना, क्योंकि इस तरह का निर्णय पहली बार लिया गया है, मगर उन्होंने कहा है कि इस तरह के आरक्षण से मुसलमानों का भला नहीं होगा।

उधर लखनऊ से मिली सूचना के अनुसार एक-दो को छोड़ कर उत्तर प्रदेश के तमाम मुस्लिम संगठन और उलेमा मुस्लिम आरक्षण के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और यह कोटा उन्हें अपर्याप्त ही नहीं, अतार्किक भी लगता है। विधानसभा चुनाव में इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा। सिर्फ कांग्रेस ही अपनी सरकार के इस फैसले से संतुष्ट नजर आ रही है। कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा अति उत्साह से कहते हैं, यह फैसला सपा को साफ माया को हाफ और कांग्रेस को टॉप कर देगा। बहरहाल अल्पसंख्यक आरक्षण के मामले में कांग्रेस की यह पहल उत्तर प्रदेश चुनाव में उसके लिए फायदेमंद भी साबित हो सकती है। यह माना जा सकता है कि मुस्लिम आरक्षण को कम बताने की यह कवायद महज राजनीतिक दांवपेंच है। 

''शुक्रवार'' मैग्जीन में प्रकाशित सगीर किरमानी का विश्लेषण

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