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जॉर्ज बुश के ही वारिस ओबामा को ऐसी क्या जल्दी है कि वह हमला करने पर उतारु है?

बराक ओबामा को 2009 में जब नोबेल शांति पुरस्कार मिला तो ऐसा बताया गया कि उनकी वजह से विश्व राजनीति का माहौन बदलने लगा है। वे परमाणु निशस्त्रीकरण की बात कर रहे थे। राष्ट्रों के बाच सहयोग की बात कर रहे थे। मुस्लिम राष्ट्रों से संवाद स्थापित करने की कोशिश की। और सबसे महत्व्पूर्ण उन्होंने कहा कि विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से तय होनी चाहिए। अब क्या वजह है कि ओबामा पलट गए हैं। उन्हें अमरीकी जनता ने चुना इसलिए था क्योंकि वह युद्ध प्रेमी जॉर्ज बुश से तंग आ चुकी थी। ओबामा ने जब अमरीकी सेना को इराक व अफगानिस्तान से वापस बुलाने का ऐलान भर किया तो उसका सभी ने स्वागत किया। अमरीकी जनता को अपेक्षा थी कि ओबामा शांति स्थापित करेंगे।
बराक ओबामा को 2009 में जब नोबेल शांति पुरस्कार मिला तो ऐसा बताया गया कि उनकी वजह से विश्व राजनीति का माहौन बदलने लगा है। वे परमाणु निशस्त्रीकरण की बात कर रहे थे। राष्ट्रों के बाच सहयोग की बात कर रहे थे। मुस्लिम राष्ट्रों से संवाद स्थापित करने की कोशिश की। और सबसे महत्व्पूर्ण उन्होंने कहा कि विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से तय होनी चाहिए। अब क्या वजह है कि ओबामा पलट गए हैं। उन्हें अमरीकी जनता ने चुना इसलिए था क्योंकि वह युद्ध प्रेमी जॉर्ज बुश से तंग आ चुकी थी। ओबामा ने जब अमरीकी सेना को इराक व अफगानिस्तान से वापस बुलाने का ऐलान भर किया तो उसका सभी ने स्वागत किया। अमरीकी जनता को अपेक्षा थी कि ओबामा शांति स्थापित करेंगे।
किंतु ओबामा को सीरिया पर हमले की बात कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि हमले की वजह वैसी ही ढूंढ़ी जा रही है जैसा बुश ने किया था। जॉर्ज बुश ने दुनिया को झूठ बता कर कि ईराक के पास परमाणु बम है उस पर हमला किया जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षक की रपट यह थी कि ईराक के पास कोई परमाणु बम नहीं है। अब ओबामा दुनिया को बता रहे हैं कि सीरिया के पास रासायनिक हथियार हैं। अभी संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों ने इसकी पुष्टि नहीं की है। आखिर अमरीका को ऐसी क्या जल्दी है कि वह हमला करने पर उतारु है?
 
इजराइल ने दो मिसाइलें दाग कर युद्ध की चेतावनी दे दी है। अमरीका ने जिस निर्लज्जता के साथ फिलिस्तीनियों के दमन में इजराइल का साथ दिया है उसे तो कोई नैतिक अधिकार ही नहीं हैं कि वह पश्चिम एशिया के मामले में हस्तक्षेप करे। दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े रक्षक के रुप में अमरीका ने जगहजगह हस्तक्षेप नहीं किया किंतु फीलिस्तीन की आजादी के लिए उसने इजराइल पर कभी भी निर्णायक दबाव नहीं बनाया। इसी तरह हाल में मिश्र में जब सेना ने लोकतांत्रिक ंग से चुनी सरकार को अपदस्थ किया तो अमरीका ने कुछ नहीं बोला। अमरीका का इतिहास बताता है कि उसने अपनी सुविधानुसार दोहरे मापदण्ड अपनाए हैं।
 
सीरिया में गृह युद्ध में विरोधियों की सांठगांठ अलकायदा से बताई जाती है। किंतु अमरीका को इसमें कोई ऐतराज नहीं कि वह सीरिया के राष्ट्रपति बशरउल असद को अपदस्थ करने के लिए अलकायदा, जिसे वह अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता रहा है, का परोक्ष से साथ देगा। सोशलिस्ट पार्टी अमरीका की बिना सुरक्षा परिषद की सहमति के सीरिया पर हमले की तैयारी का विरोध करती है और मांग करती है कि सीरिया के लोगों का यह अधिकार सुरक्षित रहे कि वह अपना भविष्य तय करें। यही सिद्घांत मिस्र और फिलिस्तीन में भी लागू होना चाहिए।
 
 डॉ. प्रेम सिंह
प्रवक्ता
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
दिल्ली
 
प्रेस विज्ञप्ति
 
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