आज के परम बाजारू दौर में चीजें कैसे बेची जाती हैं, कैसे बिकती हैं, कलम कैसे बंधक रखवाया जा सकता हैं, कैसे खतरनाक चीजों का महिमामंडन किया जाता है, इन सारे सवालों का जवाब कोलकाता के खूनी अस्पताल में छुपा हुआ है. 93 बीमार, मासूम लोगों की जिंदगी और उनके परिवार के लोगों की उम्मीदों को जला कर मार डालने वाला एएमआरआई अस्पताल देश के कुछ चुनिंदा और बेहतरीन अस्पतालों में था.
आप मत चौंकिए, यह हम नहीं कह रहे हैं. इसे तो उस खूनी अस्पताल की वेबसाइट बता रही है. वो भी हवा हवाई तरीकों से नहीं बल्कि देश के दो सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के हवाले से. अस्पताल की वेबसाइट पर तमाम खबरों की कटिंग मौजूद हैं, जिसमें अस्पताल की गतिविधियां और अच्छाइयों को दिखाने का प्रयास किया गया है. इमामी एवं स्राची ग्रुप का यह ज्वाइंट वेंचर मरीजों की सेवा के लिए नहीं खोला गया था, इसे खोला गया था लाभ के लिए, पैसा बनाने के लिए, बिजनेस करने के लिए. वैसे भी सेवा भाव का चादर ओढ़कर पैसे बनाने के लिए अस्पताल खोलने से बढि़या कोई फैक्टरी आज के समय में है ही नहीं. आप किसी मरीज का खून मरने तक चूस सकते हैं, मरने के बाद भी पैसे डूबने का कोई रिस्क नहीं. मरा आदमी पैसे मिलने की गारंटी, यानी मरने की बाद भी बड़े अस्पताल लाश तभी देते हैं जब उनके पूरे पैसे मिल जाते हैं. कोई रहम नहीं, कोई दया नहीं, कोई भाव नहीं, कोई मोल-भाव भी नहीं, कोई मुरौव्वत नहीं फिर भी धंधा चोखा.
एएमआरआई अस्पताल भी सेवाभाव का चादर ओढ़कर पैसा रुपी घी पी रहा था. इस अस्पताल के बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर में भी ज्यादातर उसी कौम के लोग शामिल थे, जो दिन भर पाप करने के बाद शाम को किसी गाय को घास खिलाकर अपना पाप धो लेती है. गोयनका, अग्रवाल, तोदी जैसे लोग बिजनेस करना जानते हैं. उन्हें पता है कि बिजनेस करने के लिए कौन-कौन से हथकंडे अपनाए जाते हैं या अपनाए जा सकते हैं. इन्हीं हथकंडों के बल पर ये देश के दो बड़े पत्रिकाओं की कलम को खरीद कर खुद को देश के बेहतरीन और चुनिंदा अस्तपतालों में शुमार करा लिया था. बढि़या मार्केटिंग का प्रभाव भी पड़ता है. कुछ पैसा मार्केटिंग पर खर्च करो और उससे कई गुना ज्यादा कमाओ. 93 लोगों को निगलने वाले अस्पताल से आज यानी गुरुवार की सुबह भी धुंआ उठता देखा गया, पर फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों तीन दमकलों के साथ तत्काल आग पर काबू पा लिया. हालांकि यह अस्पताल घटना के बाद से बंद है इसलिए जान-माल का नुकसान नहीं हुआ.
तो एएमआरआई अस्पताल भी इन दोनों पत्रिकाओं के चुनिंदा लिस्ट में था. द वीक पत्रिका ने इस खूनी अस्पताल को 'बेस्ट हास्पीटल' की श्रेणी में रखा था. साथ ही बेस्ट हास्पीटल ऑफ इमरजेंसी केयर में कोलकाता का पहला तथा बेस्ट सुपरस्पेसियालिटी हास्पीटल में दूसरे स्थान पर रखा था. इंडिया टुडे ने भी इस मौत की इमारत को देश के चुनिंदा 'केयरिंग हास्पीटल' की श्रेणी में रखा था. सवाल यह नहीं है कि ये हास्पीटल देश के बेहतरीन हास्पीटल हैं या नहीं, बल्कि सवाल उस पत्रकारिता पर है, जो करोड़ों देशवासियों के प्रति जवाबदेह होने की बजाय अनजान कारणों से कुछ लोगों के प्रति ही जवाबदेही दिखाती है. अब किस आधार पर दोनों पत्रिकाओं ने इस खूनी अस्पताल को अपने लिस्ट में शामिल किया था, वे और उनके लिए काम करने वाले ही बेहतर बता सकते हैं.
पर बीस रुपये रोज कमाने वाले आधे भारत के लिए ऐसे अस्पतालों में इलाज दिवास्वप्न भी नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसे अस्पताल में इलाज तो उनके सपने और सोच से भी बाहर होते हैं. तमाम सरकारी अस्पताल इन प्राइवेट अस्पतालों से बेहतर हैं, जहां हर रोज सैकड़ों-हजारों लोगों की जिंदगियां डाक्टर अथक मेहनत करके बचाते हैं. मरीज को न बचा पाने पर सहानुभूति भी जताते हैं. पर पत्रकारिता का धंधा करने वाले लोगों को ये बातें नजर नहीं आती हैं. द वीक और इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं का सच शायद सामने भी नहीं आता अगर इस अस्पताल में इतना बड़ा हादसा न हुआ होता. अच्छा होता कि इन पत्रिकाओं का सच सामने आने की बजाय 93 लोग बच जाते. पर ऐसा हो न सका. शायद इन पत्रिकाओं का पैमाना भी देश के टीआरपी सिस्टम की तरह है, जहां सबसे ज्यादा देखा जाने वाला दूरदर्शन इनके पैमाने में नहीं आता.







