Shambhunath Shukla : 35 साल के अखबारी जीवन में मैने पाया कि हिंदी अखबारनवीसी में सबसे उपेक्षित पत्रकार फोटोग्राफर होते हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो हर प्रेस कांफ्रेंस का फोटो लाएं, प्रेस नोट लाएं तथा चीफ रिपोर्टर का प्रजेंट भी ले आएं। इसी हिसाब से उसकी रोज की बीट तय की जाती है। पर जो सिर्फ फोटो जर्नलिस्ट होते हैं उनके साथ रिपोर्टर से लेकर ब्यूरो चीफ और संपादक तक सब बड़ा खराब व्यवहार करते हैं। उनकी फोटो छापी नहीं जाती अथवा रात बिरात उन्हें ऐसी कवरेज में लगाया जाता है जो सिर्फ खानापूरी होती है। संपादक चाहता है कि उसके बेटी-बेटी का एडमिशन फोटोग्राफर करवाए, चीफ रिपोर्टर चाहता है कि उसके घर का राशन पानी फोटोग्राफर भिजवाए और रिपोर्टर चाहता है कि ब्रीफिंग भी वही कर लाए। फिर भी कुछ फोटोग्राफर इतनी खराब स्थितियों में भी अदभुत फोटोग्राफी करते हैं।
मैंने अपने पूरे कार्यकाल में तीन ऐसे फोटोग्राफर देखे। ज्ञान त्रिपाठी, प्रशांत पांडेय, विवेक निगम दिल्ली में तथा शैलेंद्र द्विवेदी, संजय पांडेय व अमित यादव कानपुर में, इनके अलावा चंद्रकांत मिश्र व सुनील कैथवास मेरठ में। इन सबने मेरे साथ काम किया है और मैने भरसक उनकी फोटो का इस्तेमाल किया। लेकिन अखबार में सब कुछ तो किसी के पास नहीं होता। स्थानीय संपादक तो वह दयनीय प्राणी है जिसकी मुखबिरी तो सभी करते हैं उसके किए काम की तारीफ तो तब ही होती है जब कारपोरेट आफिस में बैठे ताकतवर संपादक उसके खैरख्वाह हों और मेरा यह दुर्भाग्य रहा कि कारपोरेट आफिस में सब मेरे विरोधी रहे।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.