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‘ब्रेकिंग न्यूज’ कंटेंट नहीं है एक पत्रकार की हत्या!

मुजफ्फरनगर जिले में हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं| पुलिस विभाग के मुखिया यहाँ का दौरा कर गये, कई वरिष्ठ अधिकारी भी डेरा जमाये बैठे रहे लेकिन इसके बावजूद यहाँ भड़की हिंसा में छः लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा जिनमे वहाँ कवरेज कर रहे आईबीएन7 के पत्रकार राजेश वर्मा और एक फोटोग्राफर इसरार अहमद का नाम भी शामिल है|

मुजफ्फरनगर जिले में हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं| पुलिस विभाग के मुखिया यहाँ का दौरा कर गये, कई वरिष्ठ अधिकारी भी डेरा जमाये बैठे रहे लेकिन इसके बावजूद यहाँ भड़की हिंसा में छः लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा जिनमे वहाँ कवरेज कर रहे आईबीएन7 के पत्रकार राजेश वर्मा और एक फोटोग्राफर इसरार अहमद का नाम भी शामिल है|

ताज्जुब की बात है कि जब कई न्यूज चैनल इस पत्रकार के मारे जाने की खबर को प्रमुखता के साथ दिखा रहे थे उस समय आईबीएन7 नरेंद्र मोदी से जुड़ी एक डिबेट दिखाने में व्यस्त था| इस चैनल ने ये भी मुनासिब नहीं समझा कि जो व्यक्ति इनके चैनल के लिए खबर जुटाते हुये अपनी जान से हाथ धो बैठा उसकी मौत की खबर को एक लेकर एक पट्टी भी चला दी जाये| शायद इसमें इन्हें 'ब्रेकिंग न्यूज' जैसा कोई कंटेंट नहीं लगा होगा|

सोशल मीडिया के माध्यम से जब यह खबर तेजी से फ़ैली और लोगों की तल्ख़ टिप्पणियाँ आने लगीं उसके बाद आईबीएन7 वालों ने यह खबर दिखाकर एक बोझ सा उतार दिया| लेकिन संस्थान की ओर से उस मृत पत्रकार के परिजनों के लिए किस प्रकार की व्यवस्था की जायेगी, आर्थिक सहयोग दिया जायेगा अथवा नहीं इस पर अभी तक मौन धारण कर रखा है| यह बात इसलिए भी काबिलेगौर है क्यूँकि खबरों के अनुसार मृत पत्रकार एक 'स्ट्रिंगर' के तौर पर इस संस्थान को अपनी सेवाएं दे रहा था| शासन की ओर से जरूर हर बार की तरह एक बार फिर मृतकों, गंभीर घायलों और मामूली घायलों के लिए मुआवजे का ऐलान कर दिया गया है|

जो लोग पत्रकारों के लिए लाइसेंस की बात करते हैं, मिनिमम एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया की बात करते हैं वो लोग कभी इस प्रकार की विषम परिस्थितियों में पत्रकारों और उनके परिजनों के अधिकारों को सुरक्षित करने की बात क्यूँ नहीं करते, न्यूनतम वेतनमान निर्धारित करने की बात क्यूँ नहीं करते ? एक वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए, जोकि इनका अधिकार है, भी पत्रकारों को न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है और फिर विभिन्न कारणों से चलता है तारीख पर तारीख का सिलसिला| पत्रकारिता के पेशे की बाहरी चमक और कुछ 'गंदी मछलियों' के कारण आमजन भी यही सोचते हैं कि एक पत्रकार होने का अर्थ है -ढेर सारा पैसा, रुतबा और शोहरत जबकि यह केवल एक पहलू है और हर एक पत्रकार को यह नसीब भी नहीं होता|

एक पत्रकार को हर समय रहने वाले तनाव, असुरक्षा की भावना, और उपरोक्त जैसी दुर्घटना होने पर उस पत्रकार के परिवार की स्थिति की ओर उनका ध्यान नहीं जाता| ख़बरों को 'ब्रेक' करने वाले खुद भी कितना 'ब्रेक' होते हैं इस ओर भी ध्यान दिए जाने की जरुरत है…

लेखक विनोद भारद्वाज 'ताज प्रेस क्लब (आगरा)' के अध्यक्ष एवँ दैनिक जागरण आगरा के डीएनई रह चुके हैं| उनसे संपर्क मो. 9837074023 पर किया जा सकता है|

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