Ramkrishna Dongre : स्थान- A-325 (चतुर्वेदी साहब का मकान), सेक्टर-31, नोएडा (यूपी)। तारीख- 7 सितंबर, 2013। समय- शाम 5 से पौने छह बजे के बीच का। कभी उन्होंने मुझ जैसे कई युवाओं को पत्रकारिता की एबीसीडी सिखाई थी। आज हमारी बारी है कि हम उन्हें बोलना सिखाएं। या कहें कि उन्हें बोलने के लिए प्रेरित करें। मैं बात कर रहा हूं अखबारी दुनिया की जानी-मानी शख्सियत और वरिष्ठ संपादक गिरीश मिश्र जी की।
वे पिछले एक वर्ष से ज्यादा समय से पैरालाइसिस की बीमारी से जूझ रहे हैं। कुछ दिनों पहले ही गिरीश सर पुणे से नोएडा शिफ्ट हुए हैं। आज मैंने उनसे मुलाकात की। टीचर्स डे पर मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें मैंने उनका जिक्र किया था। उसी दिन मुझे पता चला कि वे नोएडा आ गए हैं। पुणे वाले भाई संतोष मिश्रा से उनका एक नंबर मिला। मैडम से मेरी लगातार बात हुई, फिर आज मिलने का वक्त फाइनल हुआ।

(दाएं- गिरीश मिश्रा के साथ लेखक रामकृष्ण डोंगरे)
मिश्रा सर की मैमोरी जस की तस है। वे सभी को पहचानते हैं। बात करने, कुछ कहने की कोशिश करते हैं मगर इसमें उन्हें प्राब्लम होती है। बातचीत के दौरान मैडम ने मुझसे कहा- 'कभी आपके सर ने कई बच्चों को सिखाया था, अब उन बच्चों की बारी है कि वे सर को बोलना सिखाएं। यानी बोलने की प्रैक्टिस करवाएं। बोलने को मजबूर करें। ज्यादा से ज्यादा उनके स्टूडेंट मिलने आएं। बैठकर बात करें।' उन्होंने कहा कि सर को खुशी होती है, जब कोई उनसे मिलने आता है। बस बात करके, टाइम लेकर आए।
ऐसा क्यों होता है जब तक कोई लाइमलाइट में होता है तब तक लोग उसे याद करते हैं। मगर लाइमलाइट से हटते ही वह व्यक्ति हमारी यादों से ओझल हो जाता है। अगर आपके साथ ऐसा नहीं है तो सर से जरूर मिलिए। उनका फिलहाल फिजियोथेरेपी और स्पीचथेरेपी का ट्रीटमेंट चल रहा है। मैडम सर के साथ हुई घटना को ईश्वर की मर्जी मानती हैं। उस दिन का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वह दिल्ली में थीं। दोनों बच्चे उनके साथ पुणे में थे। रात को सोने से पहले तक सब कुछ ठीक था। सुबह बच्चों ने देखा कि पापाजी बिस्तर से नीचे गिरे हुए हैं। पता चला पैरालाइसिस हो गया है। मैडम इसके लिए ज्यादा टेंशन को जिम्मेदार मानती हैं। उन्होंने बताया कि पुणे में सर (गिरीश मिश्र) ने कई महीनों से तैयारी की, मराठी भाषियों को हिंदी पत्रकारिता के गुर सिखाए और 15से 18 दिन में ही पुणे में लोकमत समाचार के सर्कुलेशन को 40 हजार के पार पहुंचा दिया। आज जो 10 हजार पर आ गया है।
।। पत्रकारिता का लंबा सफर… ।।
वरिष्ठ संपादक गिरीश मिश्र की पत्रकारिता का सफर काफी लंबा है। वे 30 साल से इस फील्ड में हैं। उन्होंने नवभारत टाइम्स, दिल्ली से कॅरियर की शुरुआत की थी। हिंदुस्तान पटना में संपादक रहे, बाद में भास्कर चंडीगढ़, भोपाल में भी लंबे समय तक काम किया। नवभारत भोपाल में कुछ समय तक संपादक रहे। फिर लोकमत नागपुर में ग्रुप एडीटर बनाए गए। उनके मार्गदर्शन में जलगांव और पुणे एडीशन लांच किया गया। अब वे लोकमत समाचार से कार्यमुक्त होकर नोएडा आ चुके हैं। तीन भाइयों में वे सबसे बड़े हैं। उनके दो छोटे भाई भी पत्रकारिता में ही हैं। एक भाई टीवी जर्नलिस्ट आशीष मिश्र जल्द शुरू होने वाले एक न्यूज चैनल में एडीटर हैं। दूसरे भाई हरीश मिश्र कुछ समय पहले तक जनवाणी में थे।
।। मिश्रा सर हर स्टूडेंट के प्रिय…।।
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि में गिरीश मिश्र सर ने कई बैच के स्टूडेंट को पढ़ाया। जिसमें हमारा यानी 2005-07 का बैच भी था। किसी और के पीरियड में कोई आए न आए मगर उनके लेक्चर के समय हर स्टूडेंट मौजूद होता था। सर अपनी बेहतरीन लाइफ स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। मैंने सबसे पहले शायद सन 2004 में ही उनका नाम सुना था। तब वे भास्कर के संपादक थे। फिर 2005 में माखनलाल में उनका लेक्चर अडेंट किया। बाद में उनसे गहरा परिचय हुआ। मैं और मेरा एक दोस्त उनके नवभारत में मिलने जाया करते थे। अगर वे मीटिंग में बिजी होते, तो हमें इंतजार करने के लिए कहते। फिर जब हमें बुलाते तो समझाते कि कैसे पेजवन की खबरें डिसाइड होती। कैसे चंद मिनटों में डिसीजन लेना होता है। कोई खबर पेज वन पर रहेगी। या अंदर के पेज पर। फोटो के सलेक्शन के बारे में भी वे हमें बताते।
।। भाई गुम हुआ तो की थी मदद…।।
मेरा छोटा भाई जब गुम हुआ था तब उन्होंने मेरी हर तरह से मदद की थी। यह साल 2008 की बात थी। जब वे लोकमत नागपुर में थे। मैंने उनसे मुलाकात की। उन्होंने क्राइम रिपोर्टर से मिलवाया। मेरी उनसे लगातार बात होती थी। एसएमएस से संपर्क बना रहता था। मुझे उनके पुणे जाने तक की खबर थी। आखिरी बार सुना कि वे पुणे एडीशन लांच करने गए हैं। फिर वे पैरालाइसिस के शिकार हो, यह सब बहुत बाद में पता चला।
आइए हम सभी ईश्वर से कामना करें कि वे जल्द से जल्द ठीक हो जाए। दुबारा से हमारे बीच आएं हमें अपना प्यार और मार्गदर्शन प्रदान करें।
अमर उजाला में कार्यरत पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे के फेसबुक वॉल से.





