Alok Nandan : प्लांटवादी का मीडिया का का एक खतरनाक चेहरा यह भी है कि वह जमीनी स्तर पर लोगों से हाड़तोड़ काम तो लेता है लेकिन उसकी जिम्मेदारी नहीं लेता…राजेश वर्मा आन स्पाट मारा गया…एक पत्रकार के लिए निसंदेह एक शहीद की मौत है यह….प्लांटवादी मीडिया उसकी मौत को रुटीन मौत की तरह लिया… वह भी काफी थूथू के बाद….
पत्रकारिता के इस प्लांटवादी दौर में कोई भी पत्रकार सुरक्षित नहीं है…और स्टींगर जैसे जंतु तो कैसे जी रहे हैं उन्हें भी पता नहीं है….क्या इन सब चीजों को लेकर एक राष्ट्रीय आंदोलन की जरूरत नहीं है? है बिल्कुल है…अब तय करना पत्रकारों का काम है कि इसका स्वरूप क्या होगा…इसका उद्देश्य क्या होगा…और इसमें भागीदारी किनकी होगी….? इतना तो तय है कि प्लांटवादी दौर में सबकुछ दुरुस्त नहीं है…
पत्रकार आलोक नंदन के फेसबुक वॉल से.





