Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

जब मेरठ के दंगों के दौरान हम पत्रकारों ने कर्फ्यू में निकाला था जुलूस

मेरठ के बारे में यह एक ऐसी घटना है जिसे याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बात 1987 की है। मेरठ में दंगा हो गया और कर्फ्यू लग गया। कर्फ्यू लगे दो दिन हो गए। डी. एम. ने केवल दो स्थानीय संपादकों को पास दिए,  बाकी पत्रकारों को पास देने से मना कर दिया। इस पर विचार करने के लिए मैंने कुछ पत्रकारों को अपने आफिस बुलाया। जागरण से अभय गुप्ता और ओ. पी. सक्सेना, अमर उजाला से सुनील छइंया और हरि जोशी के अलावा एक हिंदुस्तान के पत्रकार जिनका नाम याद नहीं आ रहा, के अलावा चार पांच अन्य पत्रकार समस्या पर विचार करने के लिए सिर जोड़ कर बैठे।

मेरठ के बारे में यह एक ऐसी घटना है जिसे याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बात 1987 की है। मेरठ में दंगा हो गया और कर्फ्यू लग गया। कर्फ्यू लगे दो दिन हो गए। डी. एम. ने केवल दो स्थानीय संपादकों को पास दिए,  बाकी पत्रकारों को पास देने से मना कर दिया। इस पर विचार करने के लिए मैंने कुछ पत्रकारों को अपने आफिस बुलाया। जागरण से अभय गुप्ता और ओ. पी. सक्सेना, अमर उजाला से सुनील छइंया और हरि जोशी के अलावा एक हिंदुस्तान के पत्रकार जिनका नाम याद नहीं आ रहा, के अलावा चार पांच अन्य पत्रकार समस्या पर विचार करने के लिए सिर जोड़ कर बैठे।

काफी विचार विमर्श के बाद तय पाया कि आज अगर डी. एम. कर्फ्यू पास नहीं जारी करते तो डी. एम. की मीटिंग का बहिष्कार कर दिया जाए। यह भी तय पाया कि जैसे ही मैं बहिष्कार का नारा दूं, सब एक साथ खड़े हो जाएं और मीटिंग से बाहर आ जाएं। शाम के तय समय पर मीटिंग हुई। पत्रकारों ने पास की मांग की तो डी. एम. ने साफ इंकार कर दिया। उनके इंकार करते ही मैं खड़ा हो गया और कहा कि जब आप हमारी बात मानने को तैयार नही हैं तो हम इस मीटिंग का बहिष्कार करते हैं। मेरे यह कहते ही आठ दस पत्रकार एक साथ खड़े हो गए तो दो को छोड़ कर बाकी भी खड़े हो गए और बाहर आ गए। बाद में वह दो भी बाहर आ गए मगर हमारे पास न आ कर अपने रास्ते चले गए।

बाहर आते ही पहला भाषण अभय गुप्ता ने डी. एम की तानाशाही के विरोध में दिया। और भी कई लोग बोले। मेरा नम्बर आया तो अनजाने ही मैंने कह दिया कि अगर डी. एम पास नहीं दे रहे तो हम बिना पास ही कर्फ्यू ग्रस्त क्षेत्र का दौरा करेंगे। सब उस समय जोश में थे। अतः यह प्रस्ताव सर्वसममति से पारित हो गया। लगभग साठ पत्रकार थे। सब खड़े हो गए और जुलूस बना कर कर्फ्यू ग्रस्त इलाके की ओर प्रस्थान कर दिया। पहले सब लिसाड़ी गेट थाने पर आए। पुलिस कर्मी हक्का बक्का हो कर देख रहे थे। थाने में एक डी. एस. पी. बैठे थे।

आबिद नाम के एक फोटोग्राफर ने उन्हें कंधा पकड़ कर झकझोरा और कहा कि हमें गिरफ्तार करें, हम कर्फ्यू तोड़ कर आए हैं। डी. एस. पी. किंकर्तव्यविमूढ देखता रहा। वहां से चल कर सभी पत्रकार कर्फ्य वाले इलाके में प्रवेश कर गए। भारी पुलिस बल मौजूद था मगर सब मुंह बाए देखते रहे। गली में जुलूस देख कर लोग भी अपने घरों के दरवाजों पर खड़े हो कर तमाशा देखने लगे। सबको यही डर सता रहा था कि पता नहीं कब लाठी चल जाए मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और लगभग एक घंटा कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में घूम कर हम सब बच्चा पार्क आ गए। यहां एक छोटी-सी सभा भी हुई और तय पाया कि कल सुबह दस बजे सब यहीं मिलते हैं।

जोश में प्रदर्शन तो कर दिया मगर हम कुछ लोग काफी परेशान भी थे। नभाटा के आफिस में मैं अभय गुप्ता और कई लोग बैठे और तय पाया कि रात में अपने घर न सोया जाए। रात में गिरफतारी हो सकती है। आखिर कर्फ्यू में प्रदर्शन करना कोई मामूली अपराध तो नहीं था। खैर, रात शांति पूवर्क बीत गई। सवेरे जब तक पत्रकार बच्चा पार्क पहुंचते, सूचना विभाग का अमला वहां पहुंच चुका था। सूचना विभाग वालों ने बताया कि आप सब अपने-अपने पास ले लें। इस सूचना पर सभी पत्रकार बहुत प्रसन्न हुए। थोड़ी दूर पर ही सूचना विभाग का कार्यालय था। सब वहां पहुंच गए और कई ने तो अपने लिए ही नहीं, अपने मित्रों और रिश्तेदारों के लिए भी पास ले लिए।

इस प्रदर्शन को लेकर पहली गाज सूचना अधिकारी पर गिरी। घटना के तीसरे दिन ही उनका तबादला हो गया। दूसरी गाज गिरी डी. एम. पर। एक सप्ताह के भीतर उनको भी हटा दिया गया। और तीसरा शिकार मैं बना। सारे प्रशासन को पता चल गया था कि बहिष्कार और प्रदर्शन की योजना मेरे आफिस में बनी थी। मेरठ से लेकर दिल्ली और लखनउ तक प्रदर्शन की चर्चा थी। मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने अपने दूत दिल्ली दौड़ा दिए। मुख्यमंत्री के दूतों ने कार्यकारी संपादक एस. पी. सिंह से फरियाद की और मेरी हरकतों के बारे में बताया तो मुझे भी दिल्ली से बुलावा आ गया मैं गया।

एस. पी. ने प्रदर्शन को बहुत बड़ा रिस्क बताया और कहा कि आप लोगों को यह रिस्क नहीं लेना चाहिए था, कुछ भी हो सकता था। मुझे कहा कि अब आपका वहां रहन उचित न होगा। मैं भी ऐसा ही मान रहा था, सो अगले दिन मेरठ में पत्रकारों को पता चला कि मैं भी जा रहा हूं। मेरे जाने के बाद दंगों में इजाफा हो गया तो नए डी.एम. ने पत्रकारों के पास निरस्त कर दिए। पत्रकार पहले की तरह हंगामा करने लगे तो डी. एम. ने लाठीचार्ज करा दिया जिसमें कई पत्रकार चोटिल हो गए। मेरे पास कुछ मित्रों के फोन आए तो मैंने कहा कि वह काठ की हांडी थी, एक बार चढ गई, यही बहुत था, उसे दोबारा चढाने का प्रयास नहीं करना चाहिए था। उसके बाद दंगों की हाशिमपुरा और मलियाना में पी. ए. सी. द्वारा जो खूनी इबारत लिखी गई, वह दंगों के इतिहास का एक काला अध्याय है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


यह भी पढ़ सकते हैं…

अब तक याद है मेरठ की वह पिटाई

नभाटा में पहला दिन : नियुक्ति पत्र देखते ही चिढ़ गया पंकज शर्मा

छह महीने पार्ट टाइम करता रहा और एक अधिकारी से पंगा ले कर सचमुच सस्पेंड हो गया

कविता सुन कुंवर साहेब नाराज हुए और मुझे शिक्षक पद से बर्खास्त कर दिया

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...