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लखनऊ

अखिलेश को बौना साबित करने में जुटीं हैं आईएएस अधिकारी अनीता सिंह?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव वैसे तो पूर्ण बहुमत की सरकार के मुखिया हैं। अखिलेश यादव में कार्य एवं निर्णय लेने की क्षमता है और उनका व्यक्तित्व मृदुभाषी एवं शालीन है लेकिन इसके बावजूद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बीते 18 महीनों में कुछ प्रकरणों में उनकी जो किरकिरी हुई है, उसकी वजह साफ तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय की प्रभावशाली आईएएस अफसर अनीता सिंह बनी हुई हैं।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव वैसे तो पूर्ण बहुमत की सरकार के मुखिया हैं। अखिलेश यादव में कार्य एवं निर्णय लेने की क्षमता है और उनका व्यक्तित्व मृदुभाषी एवं शालीन है लेकिन इसके बावजूद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बीते 18 महीनों में कुछ प्रकरणों में उनकी जो किरकिरी हुई है, उसकी वजह साफ तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय की प्रभावशाली आईएएस अफसर अनीता सिंह बनी हुई हैं।

अनीता सिंह यूं तो मुख्यमंत्री की सचिव हैं लेकिन सूत्रों के मुताबिक अनीता सिंह मुख्यमंत्री के किसी भी आदेश को दरकिनार करने में माहिर हैं और तो और वह मुख्यमंत्री को कई बार प्रेस कान्प्रेंस या अन्य सार्वजनिक मौकों पर नजर अंदाज कर न मौजूद होकर अपनी हनक दिखा रही हैं। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक अनीता सिंह बीते कई महीनों से मुख्यमंत्री से संवाद विराम किये हुए हैं। जिसके चलते वह स्वयं कई अहम फैसले स्वयं ले लेती हैं, जो मुख्यमंत्री की जानकारी में नहीं होते हैं। जिसके कारण मुख्यमंत्री को अक्सर किरकिरी का सामना करना पड़ता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले तो अफसरों ने मुख्यमंत्री से सही स्थिति छुपा कर मुख्यमंत्री को गुमराह किया गया। पहली वारदात के बाद ही मुख्यमंत्री ने हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में तैनात अक्षम अधिकारियों को हटाने ही नहीं बल्कि उन्हें सस्पेंड करने का मन बना लिया था लेकिन सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह ने इस प्रकरण को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए किसी भी अधिकारी के खिलाफ तबादले तक कि कार्रवाई नहीं होने दी। दरअसल पश्चिमी उप्र में कमिश्नर, डीएम, आईजी, डीआईजी से लेकर दरोगा तक सभी की नियुक्ति अनीता सिंह की अनुकम्पा से हुई है, जिसमें मुख्यमंत्री की कोई भी राय शामिल नहीं है। ऐसे में वह कैसे अपने ही द्वारा तैनात अधिकारियों को दण्डित करतीं। इससे साफ पता चलता है कि उत्तर प्रदेश का शासन अनीता सिंह के हाथों में है और मुख्यमंत्री अपनी ही सचिव के शासन तंत्र के आगे बेबस हैं।

सिर्फ यही नहीं मार्च 2012 में अखिलेश यादव नेतृत्व में सरकार बनने के साथ ही इस खेल की बानगी दिखनी षुरू हो गई थी। जब युवा मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने अपनी पसंद के अधिकारियों की तैनाती करनी चाही लेकिन मुख्यमंत्री के बजाय उनकी सचिव अनीता सिंह के मनमाफिक अफसर शासन में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हो गये और मुख्यमंत्री की शासन तंत्र पर पकड मजबूत होने से पहले ही ढीली हो गई। इसकी सबसे बड़ी बानगी आईएएस संजय अग्रवाल की मुख्यमंत्री कार्यालय से 12 घंटे के अंदर हुई विदाई।

मालूम हो कि मुख्यमंत्री ने आईएएस संजय अग्रवाल को प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया था लेकिन मुख्यमंत्री का यह फैसला अनीता सिंह को नहीं भाया और अनीता सिंह की नाराजगी के चलते संजय अग्रवाल महज 12 घंटे के अंदर मुख्यमंत्री कार्यालय से हटा दिये गये। सूत्रों के मुताबिक थानों से लेकर डीजीपी और बाबू से लेकर प्रमुख सचिव नियुक्ति तक की तैनाती में जहां मुख्यमंत्री की मंशा के विपरीत महज अनीता सिंह के पसंद के अफसरों की तैनाती हुई और मुख्यमंत्री के आदेश सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गये।

यही नहीं, जानकारी के मुताबिक अनीता सिंह मुख्यमंत्री के राजधानी में होने या बाहर होने के दौरान कई महत्वपूर्ण फाइलों पर 'मुख्यमंत्री ने अनुमोदन किया' मुख्यमंत्री के संज्ञान के बगैर लिख कर आदेश कर देती हैं। बाद में इसकी जानकारी होने पर मुख्यमंत्री ने ऐसे फैसलों का कई बार प्रतिवाद किया लेकिन मुख्यमंत्री, अपनी सचिव अनीता सिंह के फैसलों को वापस नहीं करा पाने में सफल नहीं हो सके।

इस तरह के आदेश का अनीता सिंह मुख्यमंत्री पद की गरिमा से खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आ रही हैं। ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन सबसे अंजान हैं। पिछले 18 महीनों से देष के सबसे बड़ी सूबे की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव कई मौकों पर प्रेस कांप्रेंस और मीटिंगों के दौरान अपनी नाराजनी साफ जाहिर कर चुके थे। बावजूद इसके अनीता सिंह ने जिस तरह शासन में महत्वपूर्ण पदों जिसमें प्रमुख सचिव गृह और प्रमुख सचिव नियुक्ति पर अपनी लॉबी के अफसरों को तैनात कर रखा है उससे मुख्यमंत्री के आदेश बेअसर साबित हो जाते है।

सत्ता के करीबी जानकार तो यहां तक बताते हैं कि आज जिलों से लेकर शासन तक के आला अधिकारी जहां अनीता सिंह के एक फोन पर ष्सिर के बल’ खड़े होने को तैयार रहते हैं, वहीं मुख्यमंत्री आवास और स्वमं मुख्यमंत्री द्वारा किए गये फोन को ये अफसर नजरअंदाज कर देते हैं। इसकी वजह साफ है मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश हैं कि आईएएस एवं पीसीएस अफसरों की नियुक्ति की फाइल अनीता सिंह के जरिए ही मुख्यमंत्री तक अनुमोदन के लिए पहुंचेगी। इस आदेश की आड़ में शासन के अधिकारियों को साफ पता है कि अनीता सिंह ही किसी की नियुक्ति या तबादला करवा सकती हैं। इसलिए जब-जब मुख्यमंत्री अधिकारियों को नसीहत देते हैं, अधिकारी मुख्यमंत्री को नजरअंदाज कर अनीता सिंह की सरपरस्ती में अहम पोस्टिंग पा जाते हैं।

यहां पर सवाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरोकारी या विरोध का नहीं है बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जिस तरह एक आईएएस अफसर मुख्यमंत्री को नजरअंदाज कर अपने इशारे पर शासन सत्ता चला रही है और मुख्यमंत्री को हर मुद्दे पर बौना साबित करने की कोशिश हो रही है उससे कई संवैधानिक खतरे पैदा होने की आशंका है। मुख्यमंत्री जहां प्रदेश की जनता के प्रति जवाबदेह हैं वहीं वे जनता के नुमाइंदे हैं। आम जनता हो या विधानसभा मुख्यमंत्री अपनी सरकार की कार्यशैली के लिए संवैधानिक तौर पर जिम्मेदार हैं। फिर महज एक आईएएस अफसर कैसे इस पूरी संवैधानिक व्यवस्था को नजरअंदाज कर अपना राज कायम किए हुए है।

बहरहाल, जिस तरह पश्चिमी उप्र में हुई हिंसा के बाद समीक्षा बैठक के नाम पर मुख्यमंत्री को एक बार फिर बौना साबित करने की कोशिश की गयी, उससे फिलहाल उप्र के हालात सुधरते नजर नहीं आ रहे हैं। मुख्यमंत्री मुजफ्फरनगर में हुई हिंसा के बाद डीएम, एसएसपी समेत कई थानेदारों को सस्पेंड कर कड़ी कार्रवाई का मन बना चुके थे, लेकिन अनीता सिंह ने एक बार फिर अपने प्रभाव से उन अक्षम एवं गैर जिम्मेदार अधिकारियों का बचाव कर महज तबादला करके उनका बचाव किया वहीं मुख्यमंत्री के लिए एक नई चुनौती पेश कर दी है।

मैं इससे कतई नहीं डरता कि एक प्रभावशाली आईएएस अफसर अनीता सिंह इन बातों से नाराज होकर मेरा दमन कर सकती है अथवा करवा सकती हैं। अपने आईपीएस पति या अपने अधीनस्थों के जरिए मुझे जेल भेज सकती है अथवा मेरी हत्या तक करवा सकती है। डरना मेरी फितरत में नहीं, अन्याय और तानाशाही के विरूद्ध मैं हमेशा ही खड़ा होता रहा हूं, चाहे बीएसपी सरकार में प्रभावशाली अफसर विजयशंकर पाण्डे की तानाशाही को चुनौती देना हो या मौजूदा सरकार में अनीता सिंह का कार्यशैली का खुलासा करना हो, मैं असत्य एवं अन्याय के विरूद्ध चुप नहीं बैठ सकता। यदि मैं चुप बैठ जाता तो यूपी में हुए एनआरएचएम घोटाले, सीएमओ हत्याकाण्ड जैसे मामलों की सीबीआई जांच के लिए न्यायालय को दखल नहीं देना पड़ता और व चीनी मिलों की बिक्री एवं मनरेगा घोटाले पर न्यायालय का दरवाजा न खटखटाता। हालांकि यहां मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि मेरी व्यक्तिगत रूप से आईएएस अधिकारी श्रीमती अनीता सिंह से कोई वैमन्यता या दुराव नहीं है लेकिन उनकी कार्यशैली का विरोध करना मेरा धर्म बनता है और यही सच्ची पत्रकारिता है।

इसी क्रम में मेरी माननीय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी से अपील है कि उप्र की जनता ने सिर्फ और सिर्फ आप पर विश्वास जाहिर करते हुए समाजवादी पार्टी को अपने जन्म के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत प्रदान किया। लेकिन आज आपकी ही विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगने लगे हैं। ऐसे में आपको सतर्क एवं सचेत होते हुए उप्र की जनता को भयमुक्त एवं विकासशील राज्य बनाने के लिए कड़े निर्णय लेने होंगे। इस राह में भले ही कोई भी आड़े आये, आपको उसका दमन करने के लिए मन कड़ा करना ही होगा।

लेखक सच्चिदानंद ‘सच्चे’ लखनऊ से प्रकाशित उर्दू दैनिक ‘जदीद अमल’ के संवाददाता हैं. सच्चे से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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