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अब संत ही बन गए हैं शोषक

जिन्हें जनता सिर आंखों पर बिठाती है। बापू, महाराज, महाप्रभु, जगद्गगुरु से संबोधित करके पूजती है। जो खुद को धर्म का नुमांइदा बताकर सनातन धर्म का ढोल पूरी दुनिया में पीटते फिरते हैं,ऐसे ‘‘संत’’  भी नारियों के शोषक बन गए। पूरी दुनिया को यह त्याग, तप, संयम, नियम और वैराग्य की शिक्षा देते हैं और खुद  ‘सेक्स’ के गहरे गर्त में गिर जाते है। महिला भक्तों को अपनी कामेच्छा पूर्ति का साधन बनाते हैं। भेद खुलने पर मीडिया द्वारा बदनाम करने की साजिश बताते हैं।  ऐसे संत तो पशुओं से बदतर हैं। भक्त ईश्वर की जगह ऐसे धूर्त साधुओं की पूजा करते हैं और असली भगवान भूल जाते है।

जिन्हें जनता सिर आंखों पर बिठाती है। बापू, महाराज, महाप्रभु, जगद्गगुरु से संबोधित करके पूजती है। जो खुद को धर्म का नुमांइदा बताकर सनातन धर्म का ढोल पूरी दुनिया में पीटते फिरते हैं,ऐसे ‘‘संत’’  भी नारियों के शोषक बन गए। पूरी दुनिया को यह त्याग, तप, संयम, नियम और वैराग्य की शिक्षा देते हैं और खुद  ‘सेक्स’ के गहरे गर्त में गिर जाते है। महिला भक्तों को अपनी कामेच्छा पूर्ति का साधन बनाते हैं। भेद खुलने पर मीडिया द्वारा बदनाम करने की साजिश बताते हैं।  ऐसे संत तो पशुओं से बदतर हैं। भक्त ईश्वर की जगह ऐसे धूर्त साधुओं की पूजा करते हैं और असली भगवान भूल जाते है।

ऐसे संत मीडिया द्वारा अपनी श्रेष्ठता का प्रचार प्रसार करवाते हैं और नारी के सामने नग्नता का गंदा खेल खेलते है। बदनाम होने पर उसी मीडिया को निशाना बनाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जो मीडिया उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचा सकती है वह गिरा भी सकती है।  आखिर नारी में ऐसा क्या आकर्षण है जिसे देखकर बड़े-बड़े वैरागियों का मन डोल जाता है? आज के दौर में नामी गिरामी धर्मगुरुओं की पोल खुल रही है। कभी अनुष्ठान के नाम पर आसाराम नारियों की अस्मत से खिलवाड़ करते हैं तो कभी कृपालु महाराज प्रेमदान के बहाने बेडरूम में रंगरेलियां मनाते हैं। तो कभी नित्यानंद झाड़-फूंक के नाम पर उनकी इज्जत से खिलवाड़ करते है। समझ में यह नहीं आता कि यह बाबा लोग अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए धर्म का लबादा क्यों ओढते हैं।

जिस धर्म की वह जनता को दुहाई देते है वही धर्म एक पिता को अपनी बेटी तक से एकांत में मिलने की इजाजत नहीं देता। धर्म की अपनी मनमर्जी से व्याख्या करने वाले  ऐसे संत न जाने कितने लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाते है। महिलाओं को दुर्गा का दर्जा देने वाले क्यों उनकी अस्मिता से खिलवाड़ करते है? मंच पर तो बड़ी शान से कहते है कि ‘‘यत्र नार्यस्तु पूजयंते,रमंते तत्र देवता’’ उनके यह विचार आखिर कहां गुम हो जाते हैं। तुलसीदास जी ने मानस में ठीक ही लिखा है ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे।’’ दूसरों को उपदेश देने वाले इस कलिकाल में बहुत है लेकिन उसको आचरण में उतारने वाले एकाध ही होते है। संत कबीर ने परमात्मा की प्राप्ति के संबंध में ठीक ही लिखा है कि ‘‘चलन-चलन सब कोई कहे,विरला चले ही कोय,एक कंचन अरू कामिनी घाटी दुर्लभ होय।’’ कंचन यानि धन  संपत्ति और कामिनी यानि स्त्री, इन घाटियों को कोई विरला ही पार कर पाता है। हमारे कुछ कलयुगी गुरू तो शायद यही सब पाने के लिए धर्म की दुहाई देते हैं।

रेखा मिश्रा दीक्षित
सब एडीटर
हरिभूमि प्रेस
रायपुर

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