देहरादून। भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री रहे भुवन चन्द्र खडूड़ी को जिन गलतियों के कारण जनता के कोप का भाजन बनना पड़ा था इस समय कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी उन्हीं गलतियों को दोहरा रहे हैं। इतना तो तय है कि व्यक्तिगत जीवन में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कितने ही साफ सुधरे क्यों न हों लेकिन राजनीतिक धरातल पर उनकी मिट्रटी पलीत करने में सलाहकार कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
उनका हर कदम आम जनता को चिढ़ाने का ही काम कर रहा है। थोड़ी सी भी राजनीतिक समझ रखने वाले लोग जानते हैं कि मुख्यमंत्री के पद पर बैठा हुआ व्यक्ति स्वयं कोई निर्णय नहीं लेता। यहां तक कि कई बार अपने बारे में भी निर्णय लेना उनके बस में नहीं होता। उनके हरेक निर्णय में या तो उनके सलाहकारों का दिमाक होता है या फिर उनके सहयोगियों का, जिसमें विधायक, पार्टी के नेता या मंत्री मंडल की जिद शामिल होती है। इसी को अगर दूसरे रूप में कहें तो मुख्यमंत्री एक मैनेजर होता है जिसको पार्टी आलाकमान से लेकर अपने आसपास के लोगों को मैनेज कर सरकार की गाड़ी को किसी भी तरह से धकियाना होता है।
यहां मुख्यमंत्री बहुगुणा द्वारा पूर्व सीएम भुवन चन्द्र खंडूड़ी वाली गलती की चर्चा इसलिए की जा रही है क्योंकि दोनों का राजनीतिक कद अच्छा-खासा था मगर दोनों ने ही अपने दिमाक से कभी राजनीतिक निर्णय नहीं लिये। मसलन खंडूड़ी को उनके मीडिया सलाहकार ने हमेशा ऊंचे ख्वाब दिखाये थे। उन्हें बताया गया कि राजनीति में बने रहना है तो दिल्ली में छवि सुधारो। इसके लिए काम भी राज्य में नहीं बल्कि दिल्ली दरबार में ही करने होंगे। अगर काम न भी करो तो गुणगान दिल्ली में तो होना ही चाहिए। उनके कानों में ढूंसा गया कि राज्य से निकलने वाले अखबारों की कोई औकात नहीं होती। उनकी छपाई या तो छापेखानों तक ही सीमित रहती है या फिर जिला या सूचना विभाग की निरीक्षा शाखा तक पहुंचकर दम तोड़ देती है। कुछ एक अखबार पोस्टआफिस के माध्यम से गांवों तक पहुंचते हैं मगर गांवों में साक्षरता नहीं है इसलिए उनको पढ़ा नहीं जाता। लिहाजा इन छोटे-मोटो अखबारों पर सरकार को ध्यान नहीं देना चाहिए। इसलिए जितना भी सरकार एक करोड़-दो करोड़ या पांच करोड़ खर्च करना चाहें उसे राष्ट्रीय अखबरों में खर्च कर देना चाहिए। ताकि सरकार की छवि दिल्ली, महाराष्ट्र व गुजरात में अच्छी बनी रहे। फिर सीएम का निर्णय जब दिल्ली से ही होना है तो कपकोट, भरोड़ी, गैरसैंण, खिर्सू, घेस और देवाल जैसे क्षेत्रों की जनता को बताने की क्या जरूरत है। खंडूड़ी ठहरे आर्मी बु़ि़द्ध वाले, उन्होंने वैसा ही किया जैसा सरकारी तनख्वा पाने वाले मीडिया मैनेजरों ने उन्हें समझाया। इसी का परिणाम था कि लंबे अंतराल के बाद ओय पंचायत चुनाव में इसका रिजर्ट भी आ गया। भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। उस समय उन्हें बचाने के लिए न तो दिल्ली दरबार से कोई नेता आया न महाराष्ट्र और ना गुजरात से। उनकी इस मीडिया पालिसी का इतना बढ़ा असर हुआ कि आने वाले चुनाव में खंडूड़ी है जरूरी भी जनता को फालतू लगने लगा। इस दौरान जिन मीडिया मैनेजरों ने खंडूड़ी को नेशनल अखबारों को करोड़ों का विज्ञापन देकर झाड़ में चढ़ाया था वे अपना काम करके सैटल हो चुके थे। मगर बेचारे खंडूड़ी अब पार्टी के लिए जरूरी नहीं रहे।
अब बात सीएम बहुगुणा की। पिछले दिनों मुख्यमंत्री बहुगुणा ने भी कुछ उसी प्रकार की गलतियों को दोहराया। मसलन सूचना विभाग के अपर निदेशक डा़ अनिल चंदोला के हल्द्वानी स्थानान्तरण और दिल्ली में आपदा पर किचकिच। चंदोला की मीडिया वर्ग में अच्छी खासी पकड़ मानी जाती है इसलिए उन्हें वापस बुलाना मजबूरी बन गया। मगर आपदा प्रबंधन को लेकर न्यूज चैनलों और दिल्ली में बेहद खर्चीले सेमीनार करवाकर सरकार क्या जताना चाहती है यह न तो उत्तरकाशी के आपदा पीड़ितों को पता है न बागेश्वर की जनता समझ सकी। राज्य की जनता को समझ नहीं आ रहा है कि क्षेत्रीय समाचार चैनलों में पेड न्यूज के माध्यम से राहत की बातें बताकर आखिर बहुगुणा सरकार क्या जताना चाहती है। सीएम भी जानते होंगे कि टेलीवीजन या अखबार में गेहूं, चावल और दाल के विज्ञापन देने से गरीब जनता की भूख नहीं मिटाई जा सकती है। इसके बावजूद पिछले एक साल से लगातार इस तरह की गलतियों का दोहराव किया जा रहा है। सरकार दावे भले ही कितने कर ले मगर इतना तो तय है कि सरकार के सलाहकारों को लगता है कि मुख्यमंत्री बहुगुणा की छवि अभी कुछ बची हुई है। प्लान बनाया जा रहा है कि अब इसे पूरी तरह से कैसे धूमिल किया जाए। क्योंकि लोकसभा चुनाव आने वाले हैं भाई!
संतोष फुलारा
बागेश्वर





