नई दिल्ली। गुजरात के पूर्व गृहराज्यमंत्री और तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ कांड के आरोपी अमित शाह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। साथ ही एक स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें बचाने की कोशिश करते दिख रहे बीजेपी के दो नेताओं पर भी शिकंजा कस सकता है। जिस खोजी पत्रकार ने ये स्टिंग ऑपरेशन किया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की इजाजत दे दी है कि वो इस मामले की सीबीआई जांच की अर्जी दाखिल कर सके। पत्रकार का आरोप है कि अमित शाह ने इस केस में मिली जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है और इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए।
गौरतलब है कि खोजी पत्रकार पुष्प कुमार ने छह महीने पहले एक स्टिंग ऑपरेशन किया था। इसमें दिखाया गया है कि पार्टी के सांसद भूपेंद्र यादव एक खोजी पत्रकार से मिलकर इस बात की डील करते हैं कि पत्रकार तुलसीराम प्रजापति की मां नर्मदा बाई से एक सादा वकालतनामा हस्ताक्षर करा लाए ताकि वो इस केस में अपनी मर्जी का वकील रखकर उसे मैनेज कर सकें। वे इस स्टिंग ऑपरेशन में इसके लिए पैसे के लेनदेन और इंदौर में नर्मदा बाई की सुरक्षा के ठेके का जिक्र भी कर रहे हैं।
खोजी पत्रकार के स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर इस पूरी साजिश का हिस्सा हैं। वे दावा कर रहे हैं कि उन्होंने इस ऑपरेशन की जानकारी नरेंद्र मोदी को दे दी है और मोदी ने कहा है कि हमें अमित शाह को ही रिपोर्ट करना है। स्टिंग के तीसरे किरदार बीजेपी में आरएसएस के नुमाइंदे और पार्टी के संगठन महामंत्री रामलाल हैं। रामलाल को पूरी जानकारी है कि अमित शाह को बचाने की कोशिशें कहां तक पहुंची हैं। वो खोजी पत्रकार को भरोसा भी दिलाते हैं कि प्रकाश जावड़ेकर उनका सहयोग करेंगे।
स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि कैसे बीजेपी की ये तिकड़ी मोदी की सहमति के साथ तुलसीराम प्रजापति का केस लड़ रही उसकी मां नर्मदा बाई को पटाकर उनसे एक वकालतनामा लिखवा रही है ताकि वो इस केस में अपना वकील खड़ा कर सकें। मतलब आरोपी अमित शाह का वकील मजबूती से केस लड़कर उन्हें बचाने में लगे और उसके खिलाफ लड़ रहा नर्मदा बाई का वकील केस को कमजोर कर उन्हें हराने में। इस स्टिंग का हवाला देते हुए कांग्रेस ने कहा है कि मामला गंभीर है और इसलिए इसकी जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया है कि स्टिंग ऑपरेशन से ये साफ हो गया है कि कानूनी प्रक्रिया में दखल देकर नरेंद्र मोदी के खास अमित शाह को बचाने की कोशिश हो रही है और चूंकि ये पूरा मामला मोदी की देखरेख में चल रहा था, इसलिए उन्हें अपने पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है।
दूसरी ओर बीजेपी ने इसे कांग्रेस की मोदी के खिलाफ एक और साजिश बताया और पुष्प कुमार के पिछले रिकॉर्ड का हवाला देते हुए उनकी मंशा पर सवाल उठाया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने पुष्प कुमार को इस बात की इजाजत दे दी है कि वो मामले की सीबीआई जांच की अर्जी दाखिल कर सकते हैं जिसमें सीडी में दिख रहे बीजेपी नेताओं और अमित शाह की भूमिका की जांच की मांग की जाए।
गौरतलब है कि तुलसी प्रजापति को 28 दिसंबर 2006 को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया था। ये मुठभेड़ बनासकांठा के छपरी गांव में हुई थी। तुलसीराम प्रजापति की मां नर्मदा देवी ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की सीबीआई जांच कराने की अपील की थी। जिसके बाद अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। जांच के बाद सीबीआई ने सितंबर 2012 में तुलसी प्रजापति मुठभेड़ मामले में अपनी चार्जशीट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी।
चार्जशीट में मुठभेड़ को फर्जी ठहराते हुए सीबीआई ने इसे परफेक्ट मर्डर बताया। सीबीआई के मुताबिक तुलसी की हत्या सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी। सीबीआई ने इस साजिश का पहला आरोपी अमित शाह को बनाया। शाह पर हत्या, आपराधिक साजिश रचने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने जैसे आरोप लगाए गए। चार्जशीट के मुताबिक शाह ने अपनी सत्ता का गलत इस्तेमाल किया।
सीबीआई के मुताबिक तुलसीराम को इसलिए मारा गया क्योंकि वो सोहराबुद्दीन और कौसर बी की हत्या का सबसे अहम गवाह था। कॉल डिटेल्स के आधार पर सीबीआई ने पाया कि तुलसी को दबोचने के लिए शाह ने करीब 380 फोन कॉल किए थे। अमित शाह ने ये कॉल आईपीएस अफसर राजकुमार पांडियन और डी जी वंजारा को किए थे। सीबीआई का आरोप है कि शाह ने जांच की दिशा भटकाने के लिए अफसरों पर दबाव भी बनाया।
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई ने कहा था कि अमित शाह एक फिरौती रैकेट में सरगना हैं। सीबीआई ने कहा कि ये गिरोह नेता-पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ से चल रहा है। सीबीआई के मुताबिक तुलसी प्रजापति की मौत एक राजनीतिक हत्या थी, जिसे पूरी साजिश के साथ अंजाम दिया गया। (आईबीएन7)






