: दंगों के बाद तेजी से होता है वोटों का ध्रुवीकरण : साम्प्रदायिक अनिवार्यता की स्वीकार्यता का बढ़ता ग्राफ : लखनऊ : उत्तर प्रदेश के अमन-चैन को किसकी नजर लग गई है। इस सवाल का जबाव प्रत्येक शांति पसंद नागरिक जानना चाहता है। सपा के डेढ़ वर्ष के शासनकाल में करीब 50 बार साम्प्रदायिकता की आग में और अनेकों बार मजहबी तनाव में राज्य की जनता झुलस चुकी है। दर्जनों लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। सैकड़ों घायल अस्पतालों में पड़े हैं। कारोबार का नुकसान अलग हो रहा है। उत्तर प्रदेश के बिगड़े हालातों के कारण उद्योगपति भी यहां पैसा लगाने से परहेज कर रहे हैं। कोई इस बात की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है कि क्यों रह-रहकर लोग खून के प्यासे हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश को सरकार की नाकामयाबी की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
विपक्ष समाजवादी सरकार को बदनाम करने के लिये सूबे की आबो हवा में साम्प्रदायिकता का जहर घोल रहा है या फिर सरकार के नाकारेपन से प्रदेश बार-बार दंगों की आग में झुलस रहा है। यह यक्ष प्रश्न बन गया है। सबसे दुख की बात यह है कि ऐसे मौकों पर जनता के जख्मों पर लेप लगाने की बजाये नेतागण आरोप-प्रत्यारोपों की ‘मंडी’ सजा कर बैठ जाते हैं। अपने ऊपर तो जिम्मेदारी लेते नहीं। अधिकारियों के पेंच कसे नहीं जाते। सवाल यह उठता है कि जब दंगे की संभावना मात्र से एक आईएएस को निलंबित किया जा सकता है तो फिर उस सरकार को भी तो कुछ सजा मिलनी चाहिए जिसके राज में दंगों की बाढ़ आई हुई है। यह कहकर सरकार अपने दामन के दाग धो नहीं सकती है कि यह विपक्षियों की साजिश है। हालात ऐसे ही बने रहे तो समाजवादी सरकार के लिये अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल हो जायेगा। दुख की बात यह भी है कि मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के जिलों में फैले दंगें थम भी नहीं पाये हैं और इसी बीच मिर्जापुर, श्रावस्ती, आगरा आदि कुछ जिलों मे भी दो समुदायों के बीच गरमा-गरमी की खबरें डरा रही हैं।
मुजफ्फरनगर की हिंसा ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये। जिला स्तर के कुछ अधिकारियों का निलंबन या फिर तबादला करके सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है। मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव जिनके पास गृह मंत्रालय भी है, वह ऐसे मौकों पर क्या कर करते रहते हैं। डीजीपी देवराज नागर, एडीजी लॉ एंड आर्डर अरूण कुमार मुजफ्फरनगर ने दंगा प्रभावित इलाके का दौरा किया था, सब कुछ ठीकठाक होने की बात कही जा रही थी, लखनऊ में बैठे मुख्य सचिव जावेद उस्मानी भी सरकार के सुर में सुर मिला रहे थे। केन्द्रीय गृह मंत्रालय पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार को सचेत कर चुका था कि छोटी-छोटी घटनाएं बड़े तनाव की वजह बन रही हैं, लेकिन दिल्ली की गद्दी के लिये उतावले सपा नेताओं ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के हालात से निपटने की बजाये अन्य राज्यों में सपा को मजबूती प्रदान करने के लिये दौरे कर रहे थे। अक्सर देखने में यह आया है कि उनकों जहां होना चाहिए होता है वह वहां नहीं दिखते हैं। यह स्थिति इस लिये आती है क्यों कि उनके ऊपर बैठे ‘सुपर सीएम’ राजनीति के मैदान में उनके आका हैं।
तमाम साम्प्रदायिक हिंसा की वारदातों या फिर किसी कौम पर अत्याचार की घटना के बाद राजनेता मरहम लगाने के नाम पर वोटों के धु्रवीकरण का खेल शुरू करते हैं। अयोध्या विवाद के बाद ऐसा ही धु्रवीकरण सपा-भाजपा के बीच देखने को मिला था, जिसकी धमक कई वर्षों तक सुनायी दी थी। दलितों पर अत्याचार के नाम बसपा भी दलित वोटरों को अपने पक्ष में लामबंद करती रही है। अब तो साम्प्रदायिक हिंसा को राजनीति शास्त्र के पाठ की उपमा दी जाने लगी है। अब तो राजनैतिक पंडित और बुद्धिजीवी शार्टकर्ट में वोटों के ध्रुवीकरण के लिये साम्प्रदायिक अनिवार्यता की स्वीकार्यता की थ्योरी जरूरी बताने लगे हैं। नौकरशाही भी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन करने के बजाये नेताओं के नाकारेपन का भरपूर फायदा उठा कर अपनी नौकरी चला रही है। पीड़ित को इंसाफ और गुनाहगार को सजा का फार्मूला सपा राज में बेईमानी हो गया है, जिस राज्य का मुखिया इंसाफ और सजा का पैमाना अपराधी या फिर भुक्तभोगी की जात-बिरादरी देख कर तय करता हो, वहां की जनता का भगवान ही मालिक हो सकता है। ऐसे राज्य सुलगते ही रहते हैं। जब उपद्रवी सेना के जवानों पर भी हमला करने की ताकत करने लगे, उपद्रवी खुले आम सुरक्षा कर्मियों के सामने असलहे लहरायें तो हालात की गंभीरता को समझा जा सकता है। सरकारी नाकामी या फिर वोट बैंक की राजनीति ही है जिसके चलते दंगें की आग गांवों तक पहुंच गई, जबकि पूर्व में ऐसा शायद ही कभी देखने को मिला हो। सरकार एक पक्ष मात्र बन कर रह गई है।
अफसोस की समाजवादी सरकार बसपा राज के भ्रष्टाचार का तो खूब ढिंढोरा पीटती है, लेकिन बसपा राज में कानून व्यवस्था, साम्प्रदायिक दंगों या तनाव के समय उसके द्वारा उठाये जाने वाले कड़े कदमों की तरफ उसका ध्यान कभी नहीं जाता है। बसपा राज में साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए तो इसकी एक मात्र वजह थी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का ऐसे मौकों पर निष्पक्ष होकर पुलिस को सख्ती के साथ पेश आने की छूट देना था। वह जिलाधिकारी और एसएसपी जैसे बड़े अधिकारियों को जरा से घटना होने पर ही अर्दब में ले लेती थीं। यही वजह थी उस समय छोटी-छोटी घटनाओं को निपटाने में भी अधिकारी एड़ी-चोटी का जोर लगा देते थे। बात पुरानी नहीं है, बसपा राज में उच्च न्यायालय का बाबरी मस्जिद/रामजन्म भूमि के संद्रर्भ में अहम फैसला आया था, लेकिन कहीं कोई हिंसा नहीं फैली। उस समय दहशत का आलम यह था कि फैसला आने के समय लोग घरों में किसी अनहोनी के डर से कैद हो गये थे, लेकिन सरकार की मुस्तैदी के चलते जनजीवन पूरी तरह से सामान्य रहा। कहीं कोई कर्फ्यू नहीं लगा। यही फैसला आज आया होता तो क्या हालात होते, यह सोचा और समझा जा सकता है। समाजवादी सरकार की नाकामी ही है जो कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी समाजवादी सरकार के मुकाबले बसपा सरकार की तारीफ करने को मजबूर हो गये। प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी को भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैले साम्प्रदायिक तनाव के बाद अखिलेश सरकार के खिलाफ केन्द्र को लिखना पड़ गया। राज्यपाल ने दंगों के लिये पूरी तरह से राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। बसपा सुप्रीमों को लगता है कि ऐसे दंगे भाजपा और सपा की राजनैतिक सांठगांठ से ही होते हैं।
वैसे, केन्द्र पहले ही इस बात पर नाराजगी जता चुका था कि उत्तर प्रदेश में छोटी-छोटी घटनाओं को समय रहते नही निपटाये जाने के कारण बाद में साम्प्रदायिक हालत बिगड़ जाते हैं। ऐसा ही कुछ मुजफ्फरनगर के कवाल में भी हुआ था। स्कूली लड़की से छेड़छाड़ और उसके बाद दो गुटों में हुए झगड़े को समय रहते सुलटा लिया जाता तो ऐसा नहीं होता, लेकिन पुलिस ने एक तरफा और वह भी गैर वाजिब कार्रवाई करके दूसरे समुदाय की नाराजगी मोल ले ली। एक के बदले दो लाशे गिराने के जुनून ने सब कुछ तबाह कर दिया। जो सरकार महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे करती हो उसके निजाम में महिलाओं-लड़कियों की आबरू से खिलवाड़ किया जाये, उनका डर के मारे सड़क पर निकलना मुश्किल हो जाये, ऐसी सरकार को सरकार नहीं एक पक्ष ही कहा जा सका है। अब, बसपा, राष्ट्रीय लोकदल सहित सम्पूर्ण विपक्ष राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहा है।
संभावना यह भी जताई जा रही है कि दंगों की आड़ में 2014 के लोकसभा चुनाव के लिये विभिन्न दलों के राजनैतिक आकाओं द्वारा चुनावी बिसात बिछाई जा रही है। सीधे तौर प्रदेश में हिंसा के लिये अखिलेश सरकार ही जिम्मेदार है, लेकिन भाजपा भी इस मौके को अपने हित में भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। वह समाजवादी सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाकर घेर नहीं है। पहले 84 कोसी परिक्रमा पर रोक के बहाने भाजपा ने सपा सरकार को घेरा, अब मुजफ्फरनगर और अन्य कुछ जिलों में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के बहाने वह सरकार को घेर रही है। भाजपा नेताओं पर दंगा भड़काने का अरोप लगाया जाने और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किये जाने के सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं। भाजपा से इत्तर है कांग्रेस और बसपा की परेशानी है। भाजपा तो यह मान कर चलती है कि उसके हाथ मुस्लिम वोट नहीं लगने वाला है, इसीलिये वह हिन्दू हितों के नाम पर सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती है, लेकिन कांग्रेस और बसपा को मुस्लिम वोटों की भी दरकार रहती है,इस लिये वह तुष्टिकरण जैसे शब्द चाहकर भी इस्तेमाल नहीं कर पाती है। यही कारण है कांग्रेस और बसपा को प्रदेश में राजनैतिक नुकसान होते दिखता है।
बहरहाल, जो भी हो मरना और तड़पना आम आदमी को पड़ रहा है। सभी दलों के नेता और जनप्रतिनिधि अपने-अपने घरौंदों में महफूज थे।दिन के उजाले में विभिन्न दलों के नेताओं द्वारा अखबारी बयानबाजी करके संवेदना जताई जाती हैं तो शाम को दंगों से फायदे-नुकसान का लेखा-जोखा खंगाला जाता है। मुजफ्फरनगर शहर के समाजवादी विधायक चितरंजन स्वरूप इस समय राज्य सरकार में मंत्री हैं। जिले में जब नफरत की आग फैली तो वह कोसों दूर वाराणसी में थे। पूर्व डीजीपी श्रीराम अरूण पूरे घटनाक्रम पर काफी निष्पक्ष तरीके से अपनी बात रखते हुए कहते हैं, नौकरशाह हों या खाकी वर्दी वाले सरकार का रूख जानते हैं। जहां काम करने वालों को सजा और नाकारा अधिकारियों को पनाह दी जाती हो वहां के हालात तो कुछ ऐसे ही होंगे। हालात यह हैं कि साम्प्रदायिक दंगों या अन्य अपराधिक वारदातों के समय पुलिस और प्रशासन सरकार की तरफ ताकते रहते हैं। ऐसे मौकों पर किसी तरह की कार्रवाई करके जेल जाने या निलंबित होने से बचने (जैसा की आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल) के लिये अधिकारी मूक दर्शक बने रहना बेहतर समझते हैं।
अखिलेश सरकार अमन-चैन के मोर्चे पर नाकाम हो रही है या फूट डालो राज करों की अंग्रेजो शैली को आगे बढ़ा रही है यह तो वह ही जानें, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह भी कुछ ऐसी ही राजनीति करा करते थे। जिस तरह मुख्यमंत्री बनते ही अखिलेश यादव ने प्रदेश को दंगों की आग में झोंक दिया ठीक इसी तरह उनके पिता मुलायम ने भी सन् 1990-91 में यूपी को दंगों की आग में झोंक दिया था। एक साथ प्रदेश के 45 जिलों में कर्फ्यू लगा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और खासकर मुंजफ्फरनगर में जिस प्रायोजित तरीके से अफवाहें फैलाई गयी और पुलिस द्वारा दंगाइयों को माहौल को विषाक्त करने का पूरा मौका दिया गया उससे यह साफ है कि दंगे सरकार की मंशा के मुताबिक ही हुए हैं।
पिछड़ा समाज महासभा के एहसानुल हक मलिक और भागीदारी आंदोलन के पीसी कुरील और भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद कहते हैं कि सपा सरकार के डेढ़ वर्षों के शासनकाल में जिस तरह से दंगे दर दंगे उत्तर प्रदेश में लगातार हो रहे हैं और सरकार जिस तरह से इन दंगों को रोक पाने में लगातार विफल साबित हो रही है, इस बात की ओर इशारा है कि सपा सरकार प्रदेश की सांप्रदायिक ताकतों के आगे न केवल नतमस्तक हो चुकी है बल्कि इन दंगों की आड़ में हो रहे धार्मिक और जातीय धु्रवीकरण को अपने चुनावी लाभ के बतौर देख रही है। इन दंगों ने यह साबित कर दिया है कि प्रदेश की कानून और व्यवस्था चलाने वाले पुलिस अफसरों पर से सरकार का नियंत्रण एकदम खत्म हो गया है। मुजफ्फर नगर मे जो भी हो रहा है उसकी पृष्ठभूमि अचानक नहीं बनी लिहाजा इतने बड़े पैमाने पर हुए इस जन संघार को प्रायोजित करने में किन किन की भूमिका है इसकी सीबीआई जांच कराई जाए।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता, खाद्य रसद एवं कारागार मंत्री राजेन्द्र चौधरी जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही आते हैं, मुजफ्फरनगर में अशांति फैलाने वाले तत्वों की करतूत निदंनीय बताते है। वहॉ एक टी0वी0 पत्रकार सहित निर्दोष लोगों की मौत बहुत दुःखद है। समाजवादी पार्टी की सरकार सांप्रदायिक शक्तियों पर अंकुश लगाने और शांति तथा सद्भावना बनाए रखने को कृत संकल्प हैं। समाजवादी सरकार को निशाना बनाकर कांग्रेस, बसपा और भाजपा के जो नेता अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं वे प्रदेश की छवि खराब करना चाहते हैं।
समाजवादी पार्टी के अन्य नेता कहते हैं मुजफ्फरनगर में जो कुछ घटा है, उसके पीछे वे दल हैं जो राज्य सरकार की विकास योजनाओं से चिढें है और उन्हें अपनी जमीन खिसकती नजर आती है। उन्हें अपनी साजिश में सफल नहीं होने दिया जाएगा। कानून अपना काम करेगा। अपनी राजनीतिक रोटियॉ सेंकने के लिए विपक्षी भोले भाले नागरिकों को गुमराह करने की कोशिश न करें। किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती ।
लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.





