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गाजीपुर

चीन वाले जिला गाजीपुर को ‘चेन-चू’ शब्द से क्यों संबोधित करते हैं?

दौराने पत्रकारिता अपने सम्पादक श्री ईश्वरदेव मिश्र जी के निर्देश पर प्राचार्य श्री कुबेर नाथ राय जी का साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। पहली मुलाकात में ही उनके आडम्बरहीन, विद्वतापूर्ण, सरल व्यक्तित्व से मैं सम्मोहित सा हो गया। साक्षात्कार का अंतिम प्रश्न जो जनपद गाजीपुर को चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ‘‘चेन-चू’’ से सम्बोधित किया है, विषयक था जिस बावत तमाम विद्वान अलग-अलग अर्थ बताते हैं कोई युद्ध देव का साम्राज्य बताता है जिसे संस्कृत में युद्धरणपुर या गर्जपतिपुर कहा जा सकता है तो कुछ लोग बहादुरों का देश बताकर इतिश्री कर लेते हैं। वाकई इस चेन-चू का सही अर्थ क्या होगा? यह हम सभी को जानने की इच्छा रहती है। प्राचार्य ने जो बताया वह अक्षरशः उन्हीं के शब्दों में-

दौराने पत्रकारिता अपने सम्पादक श्री ईश्वरदेव मिश्र जी के निर्देश पर प्राचार्य श्री कुबेर नाथ राय जी का साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। पहली मुलाकात में ही उनके आडम्बरहीन, विद्वतापूर्ण, सरल व्यक्तित्व से मैं सम्मोहित सा हो गया। साक्षात्कार का अंतिम प्रश्न जो जनपद गाजीपुर को चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ‘‘चेन-चू’’ से सम्बोधित किया है, विषयक था जिस बावत तमाम विद्वान अलग-अलग अर्थ बताते हैं कोई युद्ध देव का साम्राज्य बताता है जिसे संस्कृत में युद्धरणपुर या गर्जपतिपुर कहा जा सकता है तो कुछ लोग बहादुरों का देश बताकर इतिश्री कर लेते हैं। वाकई इस चेन-चू का सही अर्थ क्या होगा? यह हम सभी को जानने की इच्छा रहती है। प्राचार्य ने जो बताया वह अक्षरशः उन्हीं के शब्दों में-

''गाजीपुर के प्राचीन नाम के सम्बन्ध में पुराने गजेटेरियों ने लिखा है कि गुप्तकाल में आने वाले चीनी यात्री ने इस क्षेत्र का नाम चेन-चू लिखा है। इस चीनी शब्द का अनुवाद हिन्दी भाषा-भाषी वैज्ञानिकों ने योद्धाओं का क्षेत्र या युद्ध प्रिय लोगों का क्षेत्र कहा है। सर्वदा तत्सम्बन्धी प्रत्येक थिसिस या लेख में यही बात दोहराई जाती है, परन्तु इस बात से मैं सहमत नहीं हूं, मेरी समझ में चेन-चू का सही अनुवाद गाधि क्षेत्र ही है जो लोक परम्परा से प्रमाणित होता है।''

भारत प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक सुनीत कुमार जी ने चीनी लिपि की विशेषता के बारे में हमें पढ़ाया था कि यह चित्र लिपि होती है और ऊपर से नीचे लिखी जाती है। कुछ भारतीय शब्दों के लिए तो यह चिन्ह या चित्र निश्चित कर लिया गया है जैसे-बुद्ध जैसा प्रसिद्ध शब्द है, बुद्ध सूर्यवंश में पैदा हुए थे अतः सूर्य के चित्र प्रतीक के माथे पर ही एक विशेष नया चिन्ह देकर काम चला लेते हैं। पहले प्राचीन काल में बुद्ध का उच्चारण ठीक होता रहा होगा परन्तु आज बिगड़कर फो और फा हो गया है। यह ध्वनि परिवर्तन इस प्रकार हुआ होगा बुद्ध-बुध-भूत-घुर-फुर-फु-फा। लेकिन शेष भारतीय नामों को उनके यहां अनुवाद करके लिखने की परम्परा थी। जैसे शुद्धोधन लिखना हुआ तो पहले शुद्ध का चिन्ह लिखेंगे फिर ओदन का परन्तु अपनी सामर्थ्य के अनुसार उच्चारण करेंगे शुद्धोधन शब्द की ही विकृत रूप। वे इसी तथ्य को अपने एक निबन्ध में एशिया खण्डे संस्कृत भाषा प्रसार और प्रभाव (पृष्ठ सं0-116 निबन्ध संग्रह, सांस्कृतिकी-भाग-2) में भी चर्चित करते हैं इसी प्रकार सैकड़ों संस्कृत नाम चीनी भाषा में प्रचलित होते हुए भी आत्मगोपन करके स्थित है। अश्वघोष को मॉ-हेड अर्थात घोड़े की हिनहिनाहट, तथागत को जू-लाई, धर्म सिंह को फा-शिह लिखने या कहने पर आज कोई संस्कृतज्ञ उन्हें पहचाने और चीनी भाषा पर संस्कृत का प्रभाव आंके यह कठिन है। उसी निबन्ध में बताया गया है कि कवि रविन्द्र नाथ ठाकुर जब चीन गये तो वहां अखबारों ने उनके नाम का चीनी संस्करण बनाया चू-चेन-तान इसका अर्थ होता है सिन्धु देशीय (भारतीय) $ रवि जो उल्टा क्रम में रवि $ इन्द्र $ भारतीय होगा। चीनी भाषा में भारतीयों के लिए थियेन-चू या सियेनचू दो शब्द हैं और इनका संस्कृत रूप है चू मात्र जिसका अर्थ होता है क्षेत्र। प्राचीन चीनी परम्परा से यह संक्षिप्त रूप चलता है।

सूर्य या रवि के लिए चीनी शब्द है तान और चेढ़्। चेन शब्द का अर्थ होता है 1-आकाश से कड़कने वाला बज्र, 2-ब्रजधर देवता इन्द्र। चीनी भाषा में इन्द्र शब्द को सदैव चेन ही परम्परा के रूप से लिया जाता है। लिपि, चित्र लिपि होने से एक ही प्रतीक चित्र का प्रयोग परस्पर सम्बन्धित शब्दों के लिए करने की परम्परा है। अतः स्पष्ट है कि चेन-चू का अर्थ हुआ इन्द्र-क्षेत्र।

मेरी समझ में इन्द्र क्षेत्र का प्रयोग ही गाधि क्षेत्र के रूप में हुआ है। मेरी इस कल्पना का आधार पुराणों में है। बी0एस0आप्टे ने अपनी संस्कृत डिक्शेनरी में बताया है कि परम्परा के अनुसार राजा गाधि इन्द्र के अवतार थे और ये कुशाम्ब के पुत्र थे। परन्तु हरिवशं पुराण से पता चलता है और प्रायः अन्यत्र भी माना जाता है कि ये कुशाम्ब के ही भाई कुशिक के पुत्र थे और इन्द्र ही स्वयं गाधि बनकर अवतरित हुए थे। इसी से इस वंश का नाम कौशिक हुआ। गाधि पुत्र विश्वामित्र को कौशिक इसी से कहा जाता है। हरिवंश पुराण के प्रथम पर्व हरिवंश पर्व के 27वें सर्ग के श्लोक (12-16) इस तथ्य को बड़ी स्पष्ट भाषा में कहते हैं। इन श्लोकों का अर्थ इस प्रकार है कि कुशिक ने इन्द्र के समान पुत्र पाने की इच्छा से तप करना आरम्भ किया तब इन्द्र स्वयं मारे भय के उनके पुत्र बन स्वयं उत्पन्न हुए। राजा कुशिक को तब तप करते हुए एक हजार वर्ष बीत गये तब इन्द्र का ध्यान कुशिक की ओर गया था। अति उग्र तप करके पुत्र पाने में समर्थ उन्हें देखकर सहस्राक्ष पुरन्दर ने उनमें अपने अंश को स्थापित किया। इस प्रकार देवेन्द्र इन्द्र कुशिक के पुत्र बने थे (13-15) फिर अंतिम श्लोक है…

स गाधिरभवत राजा मघवान कौशिक स्वयं।
पौर कुत्स्यभव भार्या गाधिः तस्यामजायत।।

(इस प्रकार मघवा इन्द्र स्वयं कौशिक गाधि बने राजा कुशिक की भार्या जो पुरूकुत्स की पुत्री थी उससे गाधि पैदा हुए) जब चीनी यात्री इस क्षेत्र में आया होगा तो लोगों ने इसका नाम गाधि क्षेत्र या गाधि देश बताया होगा। भारतीय क्षेत्र के लिए चू शब्द उसे ज्ञात था पर गाधि के लिए उसकी लिपि में कोई चित्र प्रतीक नहीं रहा होगा। अतः निकटतम एवं सम्बन्धी चित्र प्रतीक द्वारा ही इसे व्यक्त किया गया होगा। जैसा कि चीनी भाषा और लिपि की विशेष प्रकृति के बारे में बताया गया है उसके पास गाधि व्यक्ति वाचक संज्ञा को अन्य तरह से लिखने का विकल्प नहीं था अतः उसने अपने लिपि में इन्द्र-क्षेत्र लिखकर उच्चारण गाधि ही किया होगा जैसा कि शुद्धोधन, अश्वघोष या धर्मसिंह जैसी संज्ञाओं के बारे में बताया गया है। अतः मेरी धारणा है कि चीनी यात्री ने चेन-चू शब्द गाधि क्षेत्र के अर्थ में लिखा है। गाधि यहां के राजा थे तो उन्होंने अपने नाम पर गाधिपुर बसाया होगा ऐसा अनुमान सहज ही किया सकता है। लोक परम्परा आज भी बलिया को भृगु क्षेत्र गाजीपुर को गाधिपुर और जमानियां को जमदग्नि क्षेत्र कहती है तो इस लोक परम्परा के पीछे ऐतिहासिकता अवश्य है। कम से कम चीनी यात्री द्वारा उल्लेखित चेन-चू शब्द का यह अर्थ लोक परम्परा की ऐतिहासिकता का एक प्रमाण तो देता ही है।

प्राचार्य इस संसार से चले गये जिसे भगवान ने बनाया है पर अपनी अनेक रचनाओं, पुस्तकों का संसार जो प्राचार्य ने बनाया है, वे इस धरती पर रच-बस रहे हैं। अभी कितनी ही रचनाएं पाठकों के हाथ में थमाते, पर अचानक ही कोई आवाज सुनकर उठे और उसके पीछे चले गये जैसे भरी बहस से उठकर चुपके से कोई चला जाता है, जिसकी स्मृति ही अब शेष है।

लेखक शिवेंद्र पाठक से संपर्क 09415290771 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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