शुक्र है कि सांप्रदायिकता की आग में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को झोंक देने की साजिश ज्यादा कामयाब नहीं हुई। उन्माद का दौर कुछ थमता नजर आने लगा है। लेकिन, पिछले 3-4 दिनों में जितनी मार-काट हो चुकी है, वह कम नहीं है। खतरे की घंटी बज गई है। समाज के सेक्यूलर मिजाज के लोगों को आगे आना चाहिए। क्योंकि, यदि सरकार और प्रशासन के भरोसे ही सब कुछ छोड़ दिया गया, तो खतरा यही है कि केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही नहीं, देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जा सकता है।
अगले कुछ महीनों में उत्तर भारत के चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान भी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहा है। कई सियासी दलों को इंतजार है कि ऐसा कुछ हो जाए, जिससे की बैठे-बिठाए ही उनके पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए। ये सियासी दल, ऐसे नापाक हथकंडे पहले भी अजमा चुके हैं। ये लोग इस बार भी इस जुगाड़ में बढ़ते दिख रहे हैं। इसलिए, मुजफ्फरनगर की सांप्रदायिक चिंगारी के काफी खतरनाक निहितार्थ भी हो सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि इनकी चालों को समय रहते ही समझ लिया जाए।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए अब काफी कड़े कदम उठाए हैं। सेना सहित तमाम सुरक्षा बलों को चप्पे-चप्पे पर तैनात किया गया है। लापरवाही के आरोप में सहारनपुर मंडल के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर तबादले आदि की गाज भी गिराई गई है। सरकार के इस कड़े रुख के बाद प्रशासन में चुस्ती देखने को जरूर मिल रही है। लेकिन, अहम सवाल यह है कि आखिर शुरुआती दौर में मुजफ्फरनगर का जिला प्रशासन और लखनऊ में बैठी अखिलेश सरकार इतनी गफलत में कैसे रही? प्रशासन के घोर नाकारापन को समझने के लिए, आइए दंगाई घटनाक्रम की कुछ बातों पर चर्चा करते चलें।
27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में एक मामूली झगड़े से पूरी रार बढ़ी है। हुआ यह था कि गांव की एक लड़की ने इस बात की शिकायत की थी कि उसे बस में एक अल्पसंख्यक लड़के ने छेड़ दिया था। इसकी शिकायत पीड़िता ने अपने मोबाइल से परिजनों को की थी। यह सूचना पाकर उसके खानदानी युवकों ने बस से छेड़छाड़ करने वाले दो युवकों को उतार लिया था। इनकी जमकर पिटाई की गई। इस पिटाई से एक की मौत हो गई थी। जब यह सूचना फैली, तो अल्पसंख्यकों की भीड़ ने दो हमलावर भाइयों की हत्या कर दी। दरअसल, एक ही दिन में हुई तीन हत्याओं से तनाव फैला था। यदि प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई की होती, तो जातीय और सांप्रदायिक उन्माद बढ़ने की नौबत नहीं आती।
इस मामले में पीड़िता के परिजनों ने बिरादरी के लोगों से यही गुहार लगाई कि दूसरे पक्ष ने गलत लोगों को नामजद किया है। जबकि, ये लोग तो मारपीट में शामिल ही नहीं थे। इस बीच दोनों धड़ों के लोगों ने इस आपसी झगड़े को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। 30 अगस्त को मुजफ्फरनगर के मीनाक्षी चौक पर अल्पसंख्यक बिरादरी के कुछ लोगों ने इंसाफ दिलाने के नाम पर पंचायत कर डाली। इसमें कई छुटभैया नेताओं ने जहरीले भाषण किए। इसमें काफी भीड़ जुटी थी। लेकिन, प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। यहां तक कि अधिकारी इनसे ज्ञापन लेने के लिए इस पंचायत में ही पहुंच गए। इस घटना का प्रचार संघ परिवार के लोगों ने इस तरह किया कि सपा नेताओं के दबाव में प्रशासन काम कर रहा है। ऐसे में, उनका ज्ञापन लेने के लिए अधिकारी टोपीधारियों की पंचायत में भेजे गए। इस तरह साफ है कि सरकार और प्रशासन एक खास समुदाय के पक्ष में खड़ा है। ऐसे में, बहुसंख्यक समुदाय को इंसाफ नहीं मिल सकता।
भाजपा के कुछ नेताओं की सक्रियता के चलते जाटों की 36 बिरादरी की एक पंचायत नंगला मंदौड़ में 31 अगस्त को बुला ली गई। इसमें कई वक्ताओं ने भड़काऊ बयानबाजी की। प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि 7 सितंबर तक दूसरे पक्ष के नामित लोगों को हत्या के मामले में गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो महापंचायत बुलाई जाएगी। इसमें आर-पार का फैसला होगा। दावा किया जा रहा है कि इस पंचायत में भाजपा के एक विधायक ने काफी भड़काऊ भाषण किया था। उसने इस कांड को हिंदुत्व की अस्मिता से जोड़ने की कोशिश की थी। यहां तक कहा था कि मुकाबला नहीं किया गया, तो बिरादरी की बहू-बेटियों की इज्जत सुरक्षित नहीं रह सकती। इन दो पंचायतों के बाद माहौल को गर्म करने की कोशिशें जारी हो गई थीं। लेकिन, जिला प्रशासन का रवैया लापरवाही का बना रहा। हालांकि, तनाव को देखते हुए प्रदेश के डीजीपी भी यहां का दौरा करके गए थे। जबकि, कई धड़े यहां नफरत की आग को हवा देने के काम में जुटे हुए थे। पता नहीं, कैसे खुफिया तंत्र को इसकी कोई भनक नहीं लग पाई?
5 सितंबर को संघ परिवार के घटकों ने मुजफ्फरनगर बंद का आह्वान किया था। इसको लेकर सांप्रदायिक आधार पर लामबंदी तेज की गई। इसके बावजूद प्रशासन ने इन गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाने की जरूरत नहीं समझी। इसी दौरान नंगला मंदौड़ गांव में ही महापंचायत बुलाने का फैसला किया गया। इसके लिए 7 सितंबर की तारीख तय की गई। शहर के तमाम लोगों को यह आभास हो गया था कि दोनों तरफ से पंचायतें होंगी, तो माहौल खराब होगा। तमाम आशंकाओं के बावजूद नंगला मंदौड़ में आयोजित ‘बहू-बेटियों की इज्जत बचाओ’ महापंचायत को होने दिया गया। यद्यपि, अब प्रशासन द्वारा दावा किया जा रहा है कि उसने इसके लिए आधिकारिक अनुमति नहीं दी थी। सवाल यह है कि यदि अनुमति नहीं दी थी, तो इस पंचायत को रोकने-टोकने की कोशिशें क्यों नहीं की गईं? जबकि, यह महापंचायत कोई अंडर ग्राउंड तौर-तरीकों से नहीं हो रही थी। पूरे प्रशासन को पता था कि इस महापंचायत के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगा रखा है। फिर भी, प्रशासन की नींद नहीं टूटी।
इस महापंचायत में करीब 1 लाख लोग जुटे थे। ये भीड़ स्थानीय लोगों की थी। इसमें खासतौर पर एक बिरादरी के लोग ही जुटे थे। ट्रैक्टरों में भरकर ये लोग आए थे। सबको दिखाई पड़ रहा था कि ट्रैक्टरों में आई भीड़ के पास राइफल और बंदूक जैसे हथियार भी हैं। इस पर शुरुआती दौर में यही कहा गया कि ये हथियार लाइसेंस वाले हैं। इनको लेकर ज्यादा ऐतराज करने की जरूरत नहीं है। बताते हैं कि महापंचायत में कई सियासी नेताओं ने जमकर भड़काने वाले भाषण किए। इससे लोगों के अंदर गुस्से जज्बा बढ़ा। जब भीड़ वापस जा रही थी, तो लौटते वक्त अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों में इन पर कुछ पत्थरबाजी हुई। यहीं से सांप्रदायिक हिंसा का नंगा नाच शुरू हुआ। पहले ही दिन करीब 10 लोग मारे गए। सैकड़ों लोगों के घर जला दिए गए। दर्जनों लोग लहू-लुहान होकर अस्पतालों की तरफ भागे। इसके पहले ही सोशल मीडिया के जरिए शरारती तत्वों ने बड़ी साजिश की तैयारी कर ली थी। खास तौर पर फेसबुक के जरिए एक फर्जी वीडियो अपलोड किया गया। इसमें दिखाया गया कि कैसे टोपीधारी भीड़ दो युवकों को दरिंदगी से पीट-पीट कर मार डालती है। इस फर्जी वीडियो की क्लिपिंग लोगों के मोबाइल पर भी भेजी जाने लगी। जिस तरह से कुछ साल पहले गणेश जी को दूध पीने वाली अफवाह कुछ घंटों में ही देशव्यापी बना दी गई थी। कुछ इसी तर्ज पर इस क्लिपिंग का भी प्रसार किया गया। यह अफवाह फैलाई गई कि एक खास समुदाय के लोगों ने हमारे दो लड़कों का यह हाल किया है। जाहिर है ऐसे में, लोगों का सांप्रदायिक गुस्सा ऊफान पर आना था। वह जमकर आया भी। जबकि, हकीकत यह है कि यह फर्जी वीडियो अफगानी तालिबानियों की एक करतूत का था।
सांप्रदायिक आग जब बेकाबू होने लगी, तो प्रशासन ने सेना बुला ली। फ्लैग मार्च हुए। मुजफ्फरनगर में ही करीब 10 हजार सुरक्षाबल तैनात कर दिए गए। इसके बावजूद रविवार और सोमवार को भी हिंसा का उन्माद बढ़ता रहा। शहर में कर्फ्यू के बावजूद शामली, बागपत व हापुड़ तक हिंसा की लपटें फैलने लगीं। मुश्किल यह आई कि नफरत की आग ग्रामीण इलाकों में ज्यादा फैल गई, तो वहां सुरक्षाबलों के जरिए भी स्थिति नियंत्रण में लाना मुश्किल रहेगा। यह जरूर रहा कि स्थिति काफी गंभीर होने पर लखनऊ में सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने निर्णायक भूमिका में अपने को आगे किया। उन्होंने देर रात जाग-जागकर आलाअफसरों से रिपोर्ट ली। जल्दी-जल्दी कई कदम उठाए। सख्त संदेश देने के लिए कई अफसरों के खिलाफ कार्रवाई हुई। विपक्ष के 40 नेताओं के खिलाफ दंगा भड़काने के लिए गिरफ्तारी के आदेश जारी किए गए। इस ताबड़तोड़ कार्रवाई से सियासी नेताओं के हौसले भी कुछ कमजोर जरूर पड़े। लेकिन, तब तक काफी देर हो चुकी थी। खतरनाक बात यह रही कि कई इलाकों से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बड़े शहरों के लिए पलायन करने लगे। खबर है कि करीब 300 परिवार डरकर अपने गांवों से ही चले गए हैं।
इस बीच सपा के खिलाफ बसपा, रालोद व भाजपा जैसे दल खुलकर सामने आए। इन दलों ने अखिलेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी शुरू की। कांग्रेस ने भी तीखे तेवर दिखाए। राज्यपाल बीएल जोशी ने केंद्र को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही का उल्लेख किया है। राज्यपाल की रिपोर्ट से सपा नेताओं को मिर्ची लगी है। नरेश अग्रवाल जैसे सपाई नेताओं ने इस पर नाराजगी भी जाहिर की है। अब मुलायम सिंह ने कहना शुरू किया है कि मुजफ्फरनगर में जो कुछ हुआ है, यह सांप्रदायिक दंगा नहीं, बल्कि यह तो एक बड़ा जातीय संघर्ष था। सपा सुप्रीमो भले इस हादसे को लेकर अपनी सरकार की इज्जत बचाने के लिए ‘नई परिभाषाएं’ गढ़ें। लेकिन, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जरूरत इस बात की है कि लोग सियासी दलों के नापाक झांसों का असली मकसद समझ लें। वे अच्छी तरह जान लें कि वोट बैंक की राजनीति के लिए ज्यादा हाय-तौबा मचाया जा रहा है। सपा नेतृत्व के लिए भी अभी एक मौका है कि वह सांप्रदायिक आग के खेल में न उलझे। वरना, इसमें जलकर बहुत कुछ रहा-सहा खाक हो सकता है। क्योंकि, आग का ऐसा धर्म होता है कि वह अपने-पराए में फर्क नहीं करती। इन दंगों में अभी तक 42 लोगों के मरने की खबर है। इस मामले में केंद्र को भी केवल तमाशबीन की भूमिका में नहीं रहना चाहिए। क्योंकि, नफरत का यह लुकाटा कहीं भी बर्बादी की नई कहानी लिख सकता है। यह खतरा टला भी कहां है?
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





