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‘पांच राज्यों के विस चुनावों के बाद ही मोदी पर फैसला हो, तो अच्छा है’

हसीन सपने तो दोनों महानुभाव देख रहे हैं। इन सपनों को साकार करने के लिए अपनी तर्इं जमकर खून-पसीना भी बहा रहे हैं। यह अलग बात है कि अपनी सुविधा की राजनीति के लिहाज से वे न्यारी छवियां गढ़ने में जुट गए हैं। सो, त्यागमयी छवि बनाने के लिए कुछ इस तरह की बातें भी की जा रही हैं, मानों सत्ता की कुर्सी से उन्हें कोई बड़ा मोह न हो। इनमें से एक महाशय तो खेले-खाए खिलाड़ी हैं। एक दशक से मुख्यमंत्री बने बैठे हैं। उनका दावा तो यही है कि उनके अलावा स्वतंत्र भारत में अब तक इतना कश्मिाई मुख्यमंत्री शायद ही कोई और हुआ हो। सो, वे अपने राज्य के ‘विकास मॉडल’ के ढोल बजाते पूरे देश में घूमते रहे हैं।

हसीन सपने तो दोनों महानुभाव देख रहे हैं। इन सपनों को साकार करने के लिए अपनी तर्इं जमकर खून-पसीना भी बहा रहे हैं। यह अलग बात है कि अपनी सुविधा की राजनीति के लिहाज से वे न्यारी छवियां गढ़ने में जुट गए हैं। सो, त्यागमयी छवि बनाने के लिए कुछ इस तरह की बातें भी की जा रही हैं, मानों सत्ता की कुर्सी से उन्हें कोई बड़ा मोह न हो। इनमें से एक महाशय तो खेले-खाए खिलाड़ी हैं। एक दशक से मुख्यमंत्री बने बैठे हैं। उनका दावा तो यही है कि उनके अलावा स्वतंत्र भारत में अब तक इतना कश्मिाई मुख्यमंत्री शायद ही कोई और हुआ हो। सो, वे अपने राज्य के ‘विकास मॉडल’ के ढोल बजाते पूरे देश में घूमते रहे हैं।

उनका दावा है कि इसी विकास मॉडल के जरिए पूरे देश का आर्थिक और सामाजिक उद्धार हो सकता है। दूसरी तरफ, जो मुकाबले में हैं वे भी ‘त्यागी पुरुष’ हैं। उनके अपने, जो उन्हें सबसे बड़ी कुर्सी का दावेदार बता देते हैं। कई बार उनको ही झिड़क चुके हैं। उनके इस अंदाज की भी जमकर वाहवाही हो चुकी है। यही कहा जा रहा है कि देखो, एक तरफ हमारा नेता है, जो कि ‘पीएम इन वेटिंग’ बनने के लिए बेताब नहीं है। दूसरी तरफ, दूसरा चेहरा अपनी उम्मीदवारी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। उसे तो यह भी परवाह नहीं है कि इस चक्कर में पार्टी की एकता को पलीता लगता हो, तो लगा करे।

जाहिर है कि इन पंक्तियों तक गुजरने के बाद आप अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि यहां पर किनकी चर्चा का संदर्भ है? आइए, पहले नरेंद्र मोदी और उनके राजनीतिक कुनबे की चर्चा कर लें। पिछले दिनों दिल्ली में 3 दिन तक संघ परिवारी घटकों का मंथन दौर चला है। उम्मीद बांधी गई थी कि इस निर्णायक महामंथन कवायद से शायद नरेंद्र मोदी का चेहरा सर्वानुमति का संदेश लेकर आ जाए। संघ नेतृत्व ने बहुत कोशिश की कि मोदी के रास्ते में रणनीतिक तौर पर अड़ंगे लगाने वाले भाजपा के ‘लौह पुरुष’ लालकृष्ण आडवाणी को किसी तरह मना लिया जाए। यदि आडवाणी को पटा लिया गया, तो शायद सुषमा स्वराज जैसों के भी बोल बदल जाएं।  

बीच-बीच में इस तरह की खबरें भी उड़वाई गईं कि आडवाणी जी मान गए हैं। क्योंकि, उन्होंने पार्टी की भावनाओं का संदेश अच्छी तरह से समझ लिया है। ऐसे में ही भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने फटाफट फैसले के लिए संसदीय बोर्ड बैठक की तारीख भी तय कर डाली। ताकि, बोर्ड की बैठक में सबकी राय से मोदी के नाम पर मुहर लग सके। मीडिया में इस तरह की खबरें भी प्रचारित-प्रसारित हो रही हैं कि 13 सितंबर को ही औपचारिक रूप से चुनावी चेहरे के रूप में मोदी के नाम का ऐलान हो जाएगा। लेकिन, एक बार फिर फांस पार्टी के ‘लौह पुरुष’ की तरफ से फंसती नजर आ रही है। बुधवार को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह, आडवाणी की थाह लेने के लिए उनके पास गए थे। खबर तो यही है कि आधे घंटे की मुलाकात में बात नहीं बन पाई।

दरअसल, आडवाणी और उनकी निकट टोली यही कह रही है कि 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही मोदी के बारे में फैसला हो, तो अच्छा है। तर्क यही है कि औपचारिक रूप से मोदी को ‘पीएम इन वेटिंग’ बना देने से मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में चुनावी समीकरण उलझ सकते हैं। इनका भारी नुकसान पार्टी को हो सकता है। चर्चा तो यह भी रही है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संघ नेतृत्व तक इस आशय की गुहार पहले ही लगा चुके हैं। वे फरियाद कर आए हैं कि विधानसभा चुनाव के पहले मोदी के नाम का ऐलान हो गया, तो उनके राज्य में ही कम से कम 30 सीटों पर पार्टी को बड़ी राजनीतिक दुश्वारी का सामना करना पड़ सकता है।

इधर, तमाम कोशिशों के बावजूद आडवाणी की हट ने भाजपा की राजनीति में नए उलझाव पैदा कर दिए हैं। मोदी के मुद्दे पर संघ नेतृत्व की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है। ऐसे में, पार्टी के पास विकल्प यही बचता है कि वह मोदी के मुद्दे पर आडवाणी के तुनकने की परवाह न करे और उनके विरोध को रौंदते हुए आगे बढ़ जाए। मुश्किल यह है कि इस मुद्दे पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। वे भी कहने लगे हैं कि यदि दो-चार महीने बाद ही मोदी के नाम का ऐलान हो जाए, तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा? हालांकि, भाजपा के अंदर डॉ. जोशी के ताजा तेवरों को लेकर हैरानी जरूर जताई जा रही है। क्योंकि, उनकी छवि खांटी संघनिष्ठ नेता की है। संघ प्रमुख मोहन भागवत से उनकी जमती भी है। ऐसे में, डॉ. जोशी कौन-सा राजनीतिक दांव चला रहे हैं? इसको लेकर जोशी के करीबी भी संशय में हैं। मोदी के मुद्दे पर सुषमा स्वराज भी आडवाणी की राय की समर्थक हैं।

संकेत तो यही दिए जा रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक के बगैर ही मोदी के नाम का ऐलान कर देगी। यदि बैठक बुलानी जरूरी भी हुई, तो बहुमत से भी फैसला लिया जा सकता है। यानी, आडवाणी को एकदम हाशिए पर पहुंचाने का भी अल्टीमेटम है। अब यह देखना दिलचस्प है कि ऐन वक्त तक आडवाणी अड़े रहते हैं या मान जाते हैं? मोदी के मुद्दे पर आडवाणी की नाराजगी एकदम नई नहीं है। जब गोवा कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपने का फैसला हुआ था, उस वक्त ही वे नाराज हो गए थे। उन्होंने पार्टी   की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए चिट्ठी लिख दी थी। इसमें पार्टी के सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश कर डाली थी। भारी मशक्कत के बाद नाराज आडवाणी अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी हुए थे। निकट भविष्य में भाजपा के अंदर एक बार फिर कोई नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिले, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। यह अलग बात है कि पार्टी की अंदरूनी खींचतान को लेकर कई बार मोदी भी झल्ला उठते हैं। पिछले दिनों उन्होंने कह दिया था कि वे पीएम बनने का सपना ही कहां देखते हैं? उन्होंने एक कार्यक्रम में कुछ आध्यात्मिक पुट देते हुए कहा था, ‘मैं सपना नहीं देखता। सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं। मैं सपने देखने के बजाए काम करने में विश्वास करता हूं।’

यह अलग बात है कि पूरा संघ परिवार मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखने लगा है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में आयोजकों ने उनके भाषण के लिए ‘नकली लालकिला’ ही बनवा दिया था। इस मॉडल को तैयार करने में 2 करोड़ रुपए स्वाहा हो गए। दरअसल, मोदी के समर्थक बेचैन हैं कि उनका नेता कब दिल्ली के लालकिले से तिरंगा फहराता है? दूसरी तरफ, कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी हैं, जिन्हें पिछले दिनों ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पीएम उम्मीदवार के लिए आदर्श चेहरा बता चुके हैं। मनमोहन के ताजा सुरों से राहुल बनाम मोदी की धुनें तेज हो गई हैं। यह अलग बात है कि राहुल अपनी ‘त्यागी पुरुष’ की छवि को चमकाने में ज्यादा ऊर्जा लगा रहे हैं। उन्होंने बुधवार को उदयपुर (राजस्थान) की रैली में कह दिया, ‘आप सबका सपना पूरा करने के लिए, मैं अपना सपना कुचलने को तैयार हूं।’ यानी, जनसेवा के जुनून में इन्हें बड़ी कुर्सी तक पहुंचने की बेताबी नहीं है। अब ये त्यागमयी जुमले कितने असली हैं और कितने नकली हैं? इनका फैसला तो शायद ईवीएम मशीन से ही निकले? इधर, राहुल ने ना-ना करते हुए चुनावी चेहरा बनने की तैयारियां तेज कर दी हैं। उन्हें उम्मीद है कि देश के लोग उसे ही मौका देंगे, जो अपनी कुर्सी का सपना न देखकर, आम आदमी का सपना पूरा करने का जज्बा रखता हो।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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