: केदारनाथ में एक बार फिर से बाबा भोले का जयकारा गूंजने लगा है। लगभग ८५ दिनों तक मंदिर बंद रहने के बाद बुधवार को पुन: विधिविधान के साथ पूजा शुरू हो गई। लेकिन इसके साथ ही सियासी हलचल भी शुरू हो गई है। कांग्रेस सरकार जहां इस मुददे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में जुट गई है वहीं भाजपा ने भी उसे इस मसले पर घेरने की रणनीति बना ली है :
केदारनाथ में पूजा शुरू होने के साथ ही केदार के दल दल में सियासी दंगल भी शुरू हो गया है। जल प्रलय के बाद पहली बार केदारनाथ में बाबा की पूजा शुरू होने पर जहां राज्य सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस पर कडा ऐतराज जताना शुरू कर दिया है। मंदिर में पूजा शुरू करने के मूर्हूत को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। १६/१७ जून की तबाही के बाद से ही शिव के गयाहरवें ज्र्योतिलिंग केदारनाथ में पूजा बंद हो गई थी और भगवान की भोग मूर्ति को शीतकालीन पूजा स्थल ऊखीमठ के ओकारेश्वर मंदिर मंदिर लाकर पूजा की जा रही थी। इसको लेकर भी शुरूआती दिनों में देश के प्रमुख संत, धर्माचार्य व केदारनाथ के रावल आमने सामने आ गये थे। शंकराचार्य व कुछ अन्य संतों ने तो रावल को पद से हटाने के लिए जोर अजमाइश भी शुरू कर दी थी, लेकिन किसी तरह बीच का रास्ता निकालकर मामले को शांत किया गया।
संत व धमाचार्यों की मांग थी कि केदारनाथ में पूजा जल्दी शुरू की जानी चाहिए, लेकिन सरकार व इस मंदिर को संचालन करने वाली बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के सामने केदारनाथ में हालात को सामान्य करना पहली प्राथमिकता थी। संतों की ओर से लगातार बढ रहे दबाव के चलते एक समय ऐसा भी आया कि जब राज्य सरकार व मंदिर समिति ५ अगस्त से ही केदारनाथ मंदिर में पूजा प्रारंभ करने पर सहमत हो गई थी। वकायदा इसके लिए केदारनाथ के रावल २ अगस्त की देहरादून में आयोजित बैठक के लिए अपने साथ दक्षिण भारत के २५० वेदपाठियों को भी साथ लेकर आये थे, मगर बैठक में तीर्थ पुरोहितों व हक हूकूकधरियों की आपत्ति के बाद सरकार ने फसला टाल दिया और११ सितम्बर की तिथि पर सहमति बनी।
केदारनाथ मंदिर के पांच हजार सालों के इतिहास में यह पहला मौका था, जब वहां प्राकृतिक आपदा के बाद लगभग ८५ दिनों न तो भगवान शिव का जलाभिषेक ही किया गया और नहीं नियमित पूजा अर्चना की गई। मध्य हिमालय स्थित धामों बदरीनाथ व केदारनाथ में छह माह तक ग्रीष्मकाल में नर द्वारा पूजा की जाती है और शीतकाल के छह महीनों में देवों द्वारा भगवान नारायण व केदार बाबा की पूजा की परम्परा है। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है, जिसका निर्वहन अद्यावधि तक किया जा रहा है। १६/१७ जून को केदारनाथ में मची तबाही के बाद यह परम्परा टूटी व वहां पूजा बंद हो गई। मंदिर में अंतिम पूजा १७ जून को प्रात: ४ बजे की गई थी, उसके बाद ११ सितम्बर को एक बार फिर केदारनाथ मंदिर में भोले बाबा का जयकारा गूंजा।
केदारनाथ में जल प्रलय के बाद वहां चारों ओर दल दल हो गया था, जिसमें सैकडों यात्रियों के शव दवे हुए थे। राहत व वचाव कार्य समय से न होने के चलते यात्रियों को नहीं बचाया जा सका था। कई लोग अभी भी अपने परिजनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर राज्य सरकार व कुछ संत केदारनाथ मंदिर में फिर से पूजा शुरू करने का राग अलापते रहे। सूबे की कांग्रेस सरकार भी पूजा शुरू करने में अपना राजनीतिक फायदा लेने के लिए तत्पर दिखाई दी। इसमें कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व की भी रजामंदी थी। इसके पीछे का कारण भाजपा को इस मसले पर राजनीतकि लाभ लेने से रोकना था। हालांकि बहुगुणा कुछ हद तक अपनी रणनीति में सफल तो हुए हैं, लेकिन जिस तरह से स्थानीय लोगों, तीर्थ पुरोहितों व तीर्थ यात्रियों को वहां जाने से रोका गया है, उससे कांग्रेस सरकार को नुक्सान भी उठाना पड सकता है। एक ओर केदारनाथ में स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है। लोगों के शव अभी भी मिल रहे हैं।
दूसरी ओर सियासी दल इसमें भी अपनी सियासत चमकाने में लगे हुए हैं। पूजा की तिथि घोषित होने से लेकर पूजा शुरू होने तक भाजपा व कांग्रेस इस मुददे पर राजनीति करते दिखे। जहां केदारनाथ में पूजा हो रही थी वहीं केदारघाटी में भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अपने कुछ समर्थकों के साथ केदारनाथ कूच कर मीडिया का ध्यान अपनी ओर खीच रहे थे। सबसे बडा सवाल यह खडा होता है कि बदरीनाथ केदरनाथ मंदिर समिति में वर्तमान में अध्यक्ष को छोडकर उपाध्यक्ष के अलाव अधिकांश सदस्य भाजपा सरकार द्वारा ही नामित हैं। ये सभी भाजपा के कार्यकर्ता हैं। इसमें से एक ने भी २ अगस्त को सरकार की ओर से बुलाई बैठक में पूजा को लेकर अपना पक्ष नहीं रखा। इसके अलावा बैठक में केवल एक शंकराचार्य के प्रतिनिधि को आंमत्रित किये जाने पर भी मौन साधे रहे। एक सदस्य ने भी यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि आखिर केदारनाथ से संबधित विषय पर आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में केवल एक ही शंकराचार्य के प्रतिनिधि को क्यों आंमतित्र किया गया।
यहां बता दें कि केदारनाथ ज्योतिष्पीठ के अंर्तगत आता है और यहां वर्तमान में शंकराचार्य पद को लेकर तीन संत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी वासुदेवानंद व स्वामी माधवाश्रम अपनी अपनी दावेदारी कर रहे हैं। लेकिन २ अगस्त की बैठक में केवल शंकराचार्य स्वरूपानंद के प्रतिनिधि ही शामिल हुए। इस मुददे पर भी मुख्य विपक्षी दल भाजपा खामोश रही। यहां यह बात गौर करने वाली है कि ज्योतिष्पीठ के अन्य दावेदार स्वामी वासुदेवानंद संध के करीबी माने जाते हैं। स्वामी वासुदेवानंद कारसेवा के राष्टीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लेकिन तब भाजपा के किसी भी नेता व पदाधिकारी ने सरकार व मंदिर समिति से यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। जब केदारनाथ में पूजा की तिथि २ अगस्त को तय कर दी गई थी तब क्यों नहीं इस पर सवाल उठाया गया। अब जबकि केदारनाथ धाम में मंदिर के शुद्विकरण के बाद एक बार फिर से भगवान केदारनाथजी की पूजा अर्चना शुरू हो गई ऐसे में विपक्ष व सत्ता पक्ष के लोगों की ओर से समय व मूर्हूत को लेकर सवाल उठाया जाना महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के अलावा कुछ नहीं है।
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बृजेश सती
उत्तराखंड
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