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सुख-दुख...

साफ कहूं तो भड़ास और यशवंत ने मुझे, मेरे लेखन को ग्लोबलाइज कर दिया

: सरोकारनामा मतलब अब सारे सरोकार मेरे, सारा आकाश मेरा : रचना का आकाश : ऐसे निर्मम समय में ब्लाग-वेब की खिड़की खोलने वाले सभी दोस्तों को शुक्रिया : बीते 12 सितंबर, 2013 को एन. टी.पी.सी. के लखनऊ स्थित राज्य मुख्यालय पर आयोजित राजभाषा-पखवाड़ा में बतौर मुख्य-अतिथि हिंदी ब्लागिंग पर बोलने का मौका मिला। अपने लंबे भाषण में मैं ने बताया कि हिंदी ब्लागिग मेरे लिए वैसे ही है जैसे किसी पक्षी के लिए अनंत आकाश हो। कोई भौगोलिक सीमा नही, कोई टिपिकल बंधन नहीं, कोई शब्द सीमा नहीं, कोई रोक-टोक नहीं। नौकरी वाली विवशताएं नहीं। नौकरी जाने का खतरा नहीं। जो जैसा चाहे उड़े, जो जैसा चाहे कहे। वह भी हिंदी में। बातें हिंदी और हिंदी ब्लागिंग को ले कर और भी बहुतेरी हुईं। एन.टी.पी.सी के साथियों ने न सिर्फ़ इस आयोजन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि फ़ेसबुक पर हिंदी विषय पर अपनी टिप्पणियां भी लिखीं। इस मौके पर मेरे ब्लाग सरोकारनामा का जायज़ा भी सब ने लिया। एक बड़े प्रोजेक्टर पर सरोकारनामा को देखना भी मेरे लिए सुख के आकाश में उड़ना ही था।

: सरोकारनामा मतलब अब सारे सरोकार मेरे, सारा आकाश मेरा : रचना का आकाश : ऐसे निर्मम समय में ब्लाग-वेब की खिड़की खोलने वाले सभी दोस्तों को शुक्रिया : बीते 12 सितंबर, 2013 को एन. टी.पी.सी. के लखनऊ स्थित राज्य मुख्यालय पर आयोजित राजभाषा-पखवाड़ा में बतौर मुख्य-अतिथि हिंदी ब्लागिंग पर बोलने का मौका मिला। अपने लंबे भाषण में मैं ने बताया कि हिंदी ब्लागिग मेरे लिए वैसे ही है जैसे किसी पक्षी के लिए अनंत आकाश हो। कोई भौगोलिक सीमा नही, कोई टिपिकल बंधन नहीं, कोई शब्द सीमा नहीं, कोई रोक-टोक नहीं। नौकरी वाली विवशताएं नहीं। नौकरी जाने का खतरा नहीं। जो जैसा चाहे उड़े, जो जैसा चाहे कहे। वह भी हिंदी में। बातें हिंदी और हिंदी ब्लागिंग को ले कर और भी बहुतेरी हुईं। एन.टी.पी.सी के साथियों ने न सिर्फ़ इस आयोजन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि फ़ेसबुक पर हिंदी विषय पर अपनी टिप्पणियां भी लिखीं। इस मौके पर मेरे ब्लाग सरोकारनामा का जायज़ा भी सब ने लिया। एक बड़े प्रोजेक्टर पर सरोकारनामा को देखना भी मेरे लिए सुख के आकाश में उड़ना ही था।

यह उड़ना, यह ब्लाग की उड़ान भी संभव बनी ज्ञानेंद्र त्रिपाठी के कारण। मेरा उपन्यास बांसगांव की मुनमुन पढ़ कर वह इतने भाऊक हो गए कि दिल्ली से चल कर वह लखनऊ आ गए मुझ से मिलने। मिल कर वह वापस भी चले गए। फ़ेसबुक पर मित्र बने हुए थे पहले से। एक दिन बातचीत में तय हुआ कि वह मेरा ब्लाग बनाएंगे। ज्ञानेंद्र ने मुझ से ब्लाग का नाम पूछा मैं ने सरोकार बताया। थोड़ी देर बाद उन्हों ने बताया कि इस नाम से पहले से एक ब्लाग है। फिर मैं ने उन्हें सरोकारनामा नाम बताया। ज्ञानेंद्र ने सरोकारनामा नाम पा लिया और यही मेरे ब्लाग का नाम हो गया। यह जनवरी,2012 के आखिर की बात है। रोजाना सैकड़ों की हिट मन को अजीब खुशी से भर देती है। इस साल भर में ५७-५८ हज़ार की हिट की उड़ान कम नहीं होती। खैर, सरोकारनामा क्या बना मैं पंक्षी बन गया। उड़ने लगा ब्लाग के आकाश में। ब्लाग क्या है आंखें हैं। शत-शत आंखें। और जो इंदीवर के लिखे एक गाने के बोल में कहूं तो-

ये विशाल नयन
जैसे नील गगन
पंक्षी की तरह
खो जाऊं मैं !

सचमुच मैं पंक्षी ही बन गया हूं। पंख फैला कर उड़ पड़ा हूं। अनंत आकाश में। नहीं बहुत दिनों से रमानाथ अवस्थी का एक गीत झख मार कर गाता रहता था , 'मेरे पंख कट गए हैं वरना मैं गगन को गाता !' तो जैसे पंक्षी का आकाश हो गया है यह मेरा ब्लाग सरोकारनामा मेरे लिए। जो चाहूं, जैसे चाहूं लिखूं। कोई शब्द सीमा नहीं, कोई बधन नहीं, रोक-टोक नहीं, जब चाहूं लिखूं, जब नहीं मन हो न लिखूं। अहा ब्लाग जीवन भी क्या जीवन है ! जैसे पंक्षी के लिए आकाश में कोई भारत -पाकिस्तान नहीं, कोई चीन-जापान नहीं, अमरीका-रुस नहीं, इराक-ईरान नहीं, सीरिया-इसराइल नहीं, जापान-वियतनाम नहीं, चीन-ताइवान नहीं, ठीक वैसे ही ब्लाग में मेरे लिखने के लिए भी यह सारे बैरियर नहीं। कोई फ़ज़ीहत नहीं। बिना किसी रोक-टोक के मैं उड़ने लगा। नदी की तरह बहने लगा। ज्ञानेंद्र ने फिर मेरे कई उपन्यास, कहानी, लेख, इंटरव्यू आदि इस ब्लाग पर पोस्ट किए। वह सभी जो टाइप किए हुए मिले। बहुत सारा कुछ यशवंत सिंह की मशहूर पोर्टल भडास फ़ार मीडिया पर भी था। मेरा नया-पुराना लिखा बटोर-बटोर कर वह सरोकारनामा के आकाश पर वह न्यौछावर करने लगे। ज्ञानेंद्र मेरे गोरखपुर के पड़ोसी जनपद सिद्धार्थ नगर के रहने वाले हैं और इन दिनों जापान में हैं। पी.एच.डी. करने गए हैं। पर उन दिनों वह दिल्ली के एक इंजीनिरिंग कालेज में पढ़ाते थे। कई बार वह व्यस्त भी होते तो भी मेरा आग्रह नहीं टालते।

जैसे कि मैं कुछ नया लिखूं और तुरंत पोस्ट करने की उतावली में पड़ूं तो वह एस.एम.एस. करते कि क्लास में हूं। पर क्लास से निकलते ही वह पोस्ट करते और बताते कि पोस्ट हो गया ! कई बार आधी-आधी रात में उन्हें सोए से जगाता और वह पोस्ट करते। बिलकुल बच्चों की सी ललक लिए। पर कई- कई बार अब वह खीझ-खीझ भी जाते। बच्चों की ही तरह से। इसी बीच बलिया से डाक्टर ओमप्रकाश सिंह से मित्रता हुई। बिना मुलाकात वाली मित्रता। वह मेरा उपन्यास लोक कवि अब गाते पढ़ कर मित्र बने। वह भोजपुरी में अंजोरिया डाट काम चलाते हैं। डाक्टर ओम प्रकाश सिंह ने अंजोरिया पर लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी अनुवाद इस विकलता और उछाह से छापा है कि बस पूछिए मत। भोजपुरी मेरी भी मातृभाषा है। पर सच यह है कि अगर मैं भी लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी अनुवाद करता तो इतना शानदार, इतना भाऊक, इतना धाराप्रवाह नहीं कर पाता। वह तुर्शी, वह चाव मेरे भोजपुरी अनुवाद में शायद नहीं ही आ पाती, भोजपुरी की वह महक, माटी की महक जिस तरह से डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने लहकाई है वह अविरल है। मेरे वश की बात नहीं थी इस तरह अनुवाद करना। डाक्टर ओम प्रकाश सिंह ने और भी बहुतेरे लेख मेरे भोजपुरी में अनुवाद किए हैं अंजोरिया पर। लेकिन अब वह मेरे नए लिखे को सरोकारनामा पर पोस्ट भी उसी उछाह से करने लगे। जैसे ज्ञानेंद्र करते थे। क्यों कि ज्ञानेंद्र पहले बेंगलूर चले गए पी.एच.डी. करने। व्यस्त रहने लगे। उन को गाइड भी ठीक नहीं मिला। अंतत: वह पी.एच.डी. छोड़ कर वापस दिल्ली आ गए। बेरोजगारी उन के गले पड़ गई। पर जल्दी ही वह राजस्थान चले गए । एक कालेज में पढा़ने लगे। वहां बिजली का संकट भी उन्हें सताने लगा। तो कभी ज्ञानेंद त्रिपाठी तो कभी डाक्टर ओम प्रकाश सिंह मेरे नए लिखे को पोस्ट करने लगे। डाक्टर साहब को भी कई बार मैं आधी-आधी रात तंग करता। कई बार वह कहते अभी आपरेशन में हूं। निकलते ही करता हूं। अब लेकिन इतना ज़्यादा मैं लिखने और तंग करने लगा कि अब दोनों ही मुझे समझाने लगे कि अब आप खुद पोस्ट करना सीखिए। मैं बहुत नहीं-नहीं करता रहा। पर एक दिन डाक्टर साहब ने पूरी प्रक्रिया लिख कर भेजी। बच्चों की मदद ली मैं ने और यह देखिए मैं भी पोस्ट करना सीख गया। अब सारा आकाश जैसे मेरा आकाश है। जब चाहता हूं, जो चाहता हूं लिखता हूं, पोस्ट कर देता हूं।

नहीं तो सच यह है कि मैं जो लिखता हूं और जैसा लिखता हूं पढ़ कर तो सभी वाह करते हैं खास कर राजनीतिक टिप्पणियां या और भी टिप्पणियां । पर कह दीजिए कि कोई अखबार या पत्रिका उसे छाप कर सब को पढ़ाए तो बहुतों को खांसी-जुकाम हो जाता है तो कुछ को डायरिया हो जाता है। तो बहुतों को जाने क्या-क्या हो जाता है ! गुलाम मीडिया, दुकान मीडिया, बिका हुआ मीडिया आदि-आदि और भी जो-जो कह चाहिए कह लीजिए अब निरर्थक हो गया है। प्रिंट भी और इलेक्ट्रानिक भी। सब के सब नौटंकी बन गए हैं। सच कहने और सुनने की ताकत बिसर गई है इन से। बशीर बद्र के एक मिसरे में जो कहें तो ये जुबां किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी का गुलाम है ! ऐसे में यह ब्लाग एक नई ताकत बन कर उभरा है। और फ़ेसबुक उस का सब से प्रिय दोस्त। फ़ेसबुक से बड़ा कोई और संचार माध्यम नहीं है ब्लाग के लिए। दोस्त-दुश्मन, सहमत-असहमत सभी को वह सूचना दे ही देता है। और उन की भावनाओं से भी रुबरु करवा ही देता है।

हालां कि नेट पर सब से पहले मेरी एक कहानी आबूधाबी में रह रहे कृष्ण बिहारी जी ने मांगी। नवनीत मिश्र जी के मार्फ़त। शारज़ाह से अभिव्यक्ति चला रही पूर्णिमा वर्मन जी के लिए। मैं ने उन्हें कहानी दी। अपनी सब से लंबी कहानी मन्ना जल्दी आना। जो उन्हों ने अभिव्यक्ति पर छापी। यह कोई वर्ष २००० की बात है। फिर अमरीका में रह रही इला प्रसाद जी ने गर्भनाल पर मेरी कई रचनाएं छपवाईं। फिर जय प्रकाश मानस जी ने भी अपनी साइट पर छापा। लेकिन जब भड़ास 4 मीडिया पर यशवंत सिंह ने मुझे लिखने के लिए लगातार उकसाया वह तो गज़ब का अनुभव है मेरे जीवन का। न भूतो, न भविष्यति। यशवंत के भड़ास ने मुझे दुनिया भर के लोगों से जोड़ दिया। देश-विदेश में मुझे लोग पढ़ने लगे। कनाडा, अमरीका, लंदन जाने-जाने कहां से लोग फ़ोन करने लगे। रात-बिरात। चिट्ठी लिखने लगे। जिस दिन भड़ास पर कुछ छपता मेरा सोना हराम हो जाता। जीना मुश्किल हो जाता। इतने फ़ोन आते कि बस मत पूछिए। यशवंत खुद विभोर हो कर रात-बिरात फ़ोन करते। मेरा उपन्यास अपने-अपने युद्ध जब छपा था २००० में तब भी काफी चर्चित हुआ था। लेकिन जब भड़ास ने छापा तो हंगामा सा हो गया। फिर तो भड़ास ने एक-एक कर मेरे पांच उपन्यास, कई कहानियां, ढेर सारे लेख, टिप्पणियां छापीं। अनवरत। जो बाद में मेरे सरोकारनामा पर कट-पेस्ट हो कर काम आईं। साफ कहूं तो भड़ास और यशवंत ने मुझे, मेरे लेखन को ग्लोबलाइज़ कर दिया। बता दिया कि हिंदी का यह नील गगन बहुत विशाल है ब्लाग और पोर्टल की दुनिया के मार्फ़त। जहां बिना कोई समझौता किए, बिना झुके, बिना झिझक, बिना दरबारी हुए, लिखने की उड़ान मुमकिन है।

एक किस्सा तुलसी दास का जो मैं ने एन.टी.पी.सी. के कार्यक्रम में भी सुनाया था। आप मित्रों को भी सुनाता हूं। हम सब जानते ही हैं कि तुलसीदास अकबर के समय में हुए। बल्कि यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि तुलसीदास के समय में अकबर हुए। खैर आप जैसे चाहें इस बात को समझ लें। पर हुआ यह कि अकबर ने तुलसी दास को संदेश भिजवाया कि आ कर मिलें। संदेश एक से दो बार, तीन बार होते जब कई बार हो गया और तुलसी दास नहीं गए तो अकबर ने उन्हें कैद कर के बुलवाया। तुलसी दरबार में पेश किए गए। अकबर ने पूछा कि, ' इतनी बार आप को संदेश भेजा आप आए क्यों नहीं?' तुलसी दास ने बताया कि, 'मन नहीं हुआ आने को। इस लिए नहीं आया।' अकबर ज़रा नाराज़ हुआ और बोला कि, 'आप को क्यों बार-बार बुलाया आप को मालूम है?' तुलसी दास ने कहा कि, 'हां मालूम है।' अकबर और रुष्ट हुआ और बोला, 'आप को खाक मालूम है !' उस ने जोड़ा कि, 'मैं तो आप को अपना नवरत्न बनाना चाहता हूं, आप को मालूम है?' तुलसी दास ने फिर उसी विनम्रता से जवाब दिया, 'हां, मालूम है।' अब अकबर संशय में पड़ गया। धीरे से बोला, 'लोग यहां नवरत्न बनने के लिए क्या नहीं कर रहे, नाक तक रगड़ रहे हैं और आप हैं कि नवरत्न बनने के लिए इच्छुक ही नहीं दिख रहे? आखिर बात क्या है?'

तुलसी दास ने अकबर से दो टूक कहा कि, 'आप ही बताइए कि जिस ने नारायण की मनसबदारी कर ली हो, वह किसी नर की मनसबदारी कैसे कर सकता है भला?' अकबर निरुत्तर हो गया। और तुलसी दास से कहा कि, 'आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। अब आप जा सकते हैं।' तुलसी दास चले गए। और यह नवरत्न बनाने का अकबर का यह प्रस्ताव उन्हों ने तब ठुकराया था जब वह अपने भरण-पोषण के लिए भिक्षा पर आश्रित थे। घर-घर घूम-घूम कर दाना-दाना भिक्षा मांगते थे फिर कहीं भोजन करते थे। शायद वह अगर अकबर के दरबारी बन गए होते तो रामचरित मानस जैसी अनमोल और अविरल रचना दुनिया को नहीं दे पाते। सो उन्हों ने दरबारी दासता स्वीकारने के बजाय रचना का आकाश चुना। आज की तारीख में तुलसी को गाली देने वाले, उन की प्रशंसा करने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे पर तुलसी का यह साहस किसी एक में नहीं मिलेगा। शायद इसी लिए तुलसी से बड़ा रचनाकार अभी तक दुनिया में कोई एक दूसरा नहीं हुआ। खैर यह किस्सा जब खत्म हुआ तो मैं ने कहा कि गनीमत थी कि तुलसी दास अकबर के समय में हुए और यह इंकार उन्हों ने अकबर से किया पर खुदा न खास्ता जो कहीं तुलसी दास औरंगज़ेब के समय में वह हुए होते और यही इंकार औरंगज़ेब से किया होता , जो अकबर से किया, अकबर ने तो उन्हें जाने दिया, लेकिन औरंगज़ेब होता तो? वहां उपस्थित लोग एक सुर से बोले, 'सर कलम कर देता तुलसी दास का!'
सच यही है। एक निर्मम सच यह भी है और कि हमारा दुर्भाग्य भी कि हम सब लोग आज औरंगज़ेब के समय में ही जी रहे हैं। तो सर कलम होने से बचाना भी एक बेबसी है। बेकल उत्साही का एक शेर है :

बेच दे जो तू अपनी जुबां, अपनी अना, अपना ज़मीर
फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे।

सो, सोने के निवाले हाथ में लिए लोगों की संख्या बेहिसाब बढ़ गई है, यह हम सभी हाथ बांधे, सांस खींचे देखने को अभिशप्त हैं। तो मित्रो, ऐसे निर्मम समय में ब्लाग एक ऐसी खुली खिड़की है, एक ऐसी धरती है, एक ऐसा आकाश है जो आप को बिना ज़मीर बेंचे, अपनी अना और जुबां बेंचे अपनी बात कहने का गुरुर देता है। सोने के निवाले जाएं भाड़ में ! किसी का दरबार जाए भाड़ में। जो दरबारी जीवन जीने और इस की कीमत बेज़मीर हो कर चुकाते हैं, अपनी अना, अपनी जुबां क्षण-क्षण सुविधाओं की भेंट चढ़ाने में अपनी शान समझते हैं, उन्हें यह उन की शान मुबारक ! कई लोग अपने-अपने ब्लाग पर भी यह सब कर ही रहे हैं तो अपनी बला से। यह उन का अपना आकाश है, उन का अपना चुनाव है। यहां तो कलम और आज़ादी सलामत है तो हम सलामत हैं, हमारी दुनिया सलामत है। हमारी अना, हमारी जुबां, हमारा ज़मीर सलामत है।

शुक्रिया ज्ञानेंद्र त्रिपाठी जो तुम्हारी बदौलत हम इस ब्लाग के आकाश से परिचित हो पाए। डाक्टर ओम प्रकाश सिंह जी आप का भी बहुत शुक्रिया। लखनऊ में डाक्टर मुकेश मिश्र, कभी भड़ास में रहे अनिल सिंह और पटना की अनीता गौतम के ज़िक्र के बिना भी यह उड़ान कथा अधूरी होगी। और जानेमन यशवंत सिंह लव यू !

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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