भाई साहब, कितने बड़े चिरकुट हैं दैनिक जागरण वाले. खबरों का रोजगार करते-करते अब इंसानियत की भी बनियागिरी करने लग गए हैं. पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार तथा अपने पत्रकारों का शोषण करने वाले इस संस्थान में प्रबंधकों की संवेदनाएं मर चुकी हैं. तभी तो दैनिक जागरण के बिलासपुर आफिस में बतौर चपरासी काम करने वाले गोपाल मोहन की 24 दिसम्बर को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है, लेकिन अगले दिन जो खबर अखबार में छपती हैं उसमें उन्हें मात्र नगर का निवासी बताया जाता है.
गोपाल मोहन के निधन पर संवेदनहीन जागरण एवं कर्ताधर्ता शोक भी नहीं जताते हैं, जबकि गोपाल पिछले दो सालों से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहा था. गोपाल की तैनाती अरुण डोगरा ने करवाई थी, लेकिन जून महीने में दैनिक जागरण ने अरुण डोगरा को भी बाहर कर दिया था. बताते हैं कि उसके बाद से गोपाल काफी दुखी रहता था. अब अरुण डोगरा द्वारा रखवाए गए अनूप शर्मा कार्य कर रहे हैं.
इसी दिन दैनिक जागरण के नए प्रभारी राजेश्वर ठाकुर के दादाजी का भी स्वर्गवास हुआ और ये समाचार राज्य पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया. उसमें जागरण के प्रबंधक निशिकांत ठाकुर ने भी शोक प्रकट किया है. यानी प्रभारी के दादा के निधन पर तो शोक व्यक्त किया जाता है लेकिन अपने कर्मचारी के लिए एक शब्द भी नहीं कहा गया. यहां तक कि उसे अपना कर्मचारी बताने में भी शर्म महसूस की गई. यहां तक कि उसके किसी परिजन तक को फोन नहीं किया गया, जिससे पता चलता है कि जागरण अपने कर्मचारियों की कितनी खैर करता है. किसी संस्थान के इस तरह के दोगले चरित्र का सामने आना जरूरी है.


एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.





