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आरटीआई के बल पर लड़ रहे हिंदी के हक की लड़ाई

मुंबई। देश में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा हिंदी सरकारी विभागों से लेकर कार्पोरेट जगत तक हर जगह उपेक्षित है। हिंदी के लिए राहत की बात यह है कि मुंबई निवासी प्रवीण जैन जैसे लोग भी है जो सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के बल पर हिंदी के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले दिनों ही जैन की वजह से पत्र सूचना कार्यालय  (पीआईबी) को अपनी वेबसाइट पर हिंदी को वरीयता देनी पड़ी। जैन के लगातार आरटीआई आवेदनों और पत्राचार की वजह से राष्ट्रपति भवन व प्रधानमंत्री कार्यालय को अपनी वेबसाइट अंग्रेजी के अलावा हिंदी में बनानी पड़ी थी।

मुंबई। देश में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा हिंदी सरकारी विभागों से लेकर कार्पोरेट जगत तक हर जगह उपेक्षित है। हिंदी के लिए राहत की बात यह है कि मुंबई निवासी प्रवीण जैन जैसे लोग भी है जो सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के बल पर हिंदी के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले दिनों ही जैन की वजह से पत्र सूचना कार्यालय  (पीआईबी) को अपनी वेबसाइट पर हिंदी को वरीयता देनी पड़ी। जैन के लगातार आरटीआई आवेदनों और पत्राचार की वजह से राष्ट्रपति भवन व प्रधानमंत्री कार्यालय को अपनी वेबसाइट अंग्रेजी के अलावा हिंदी में बनानी पड़ी थी।

जैन इन दिनों इस कोशिश में लगे हैं कि सभी छोटी-बड़ी उपभोक्ता वस्तुओं की पैकिंग पर जानकारी हिंदी अथवा स्थानीय भाषा में हो।मुंबई के पास पनवेल में रहने वाले जैन पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) हैं। हिंदी को लेकर अपने संघर्ष के बारे में वे बताते हैं- 2011 से हिंदी के लिए कुछ करने के इरादे से मैंने राजभाषा संबंधी प्रावधानों का अध्ययन किया। उसी वक्त मुझे पता चला कि राष्ट्रपति भवन की तीनों वेबसाइटें हिंदी में उपलब्ध नहीं हैं। जबकि द्विभाषी वेबसाइट बनाने का नियम 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल से ही लागू हुआ था।
 
2012 में मिली सफलता

डेढ़ वर्ष तक लगातार राजभाषा विभाग और राष्ट्रपति सचिवालय को कई पत्र लिखे। कोई उत्तर नहीं आया फिर अक्टूबर 2012 में  आरटीआई के तहत जानकारी मांगी। इसके बाद सचिवालय हरकत में आया और राष्ट्रपति भवन की पहली वेबसाइट हिंदी में तैयार हुई जिसे 31 जनवरी 2013 को लोकार्पित किया गया। इसी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय की हिंदी वेबसाइट के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। फिर 2012 में हिंदी वेबसाइट तैयार हुई। जैन ने पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की वेबसाइट पर हिंदी को उसका स्थान दिलाने के लिए 7 महीने लगातार पत्राचार किया। अब पीआईबी की वेबसाइट पर भारत की राजभाषा को उसका उचित स्थान मिल गया है।

दलाई लामा को भी किया बाध्य

जैन बताते हैं कि भारत में शरण लेने वाले बौद्ध गुरु दलाई लामा और की वेबसाइट अंग्रेजी, चीनी, तिब्बती भाषा के अलावा रूसी एवं मंगोलियाई भाषा में भी उपलब्ध थी, पर जिस देश ने उनका साथ दिया।  उन्होंने यहां अपना मठ स्थापित किया पर हिंदी की उपेक्षा की गई। इस संबंध में मैंने लगातार  ईमेल भेजे और 2013 की बुद्ध पूर्णिमा से अब तिब्बत की निर्वासित सरकार की वेबसाइट का हिंदी संस्करण भी शुरू किया गया है। जैन के संघर्ष से ही अब दूरदर्शन के चैनलों के प्रतीक-चिह्नों (लोगो) में हिंदी को शामिल किया जा रहा है, डीडी न्यूज, डीडी नेशनल, डीडी भारती, डीडी स्पोर्ट्स के चिह्नों में हिंदी दिखाई देने लगी है।

उपभोक्ता उत्पादों पर मिले हिंदी को स्थान

जैन कहते हैं कि मोबाइल कंपनियां मोबाइल कनेक्शन देने के लिए जो फॉर्म भरवाती हैं। वह पूरी तरह अंग्रेजी में होता है। 75 फीसदी मोबाइल उपभोक्ता उस फार्म पर छपी अंग्रेजी समझे बगैर हस्ताक्षर करते हैं। मोबाइल कंपनियां इस बात का नाजायज फायदा उठाते हुए अनाप-शनाप बिल भेजती है। इसके अलावा खाने पीने की चीजों के पैकेट पर उस वस्तु के बारे में पूरी जानकारी अंग्रेजी में ही लिखी होती है।  इसको लेकर जैन ने अब तक उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियों में उपभोक्ता शिकायतें की है।  आज से 10-12 वर्ष पहले तक घरेलू उपभोग की वस्तुओं के पैक आदि पर हिंदी दिखाई देती थी अब सब गायब है। यह एक षड्यंत्र है। इसके लिए उन्होंने सभी हिंदी भाषी राज्यों के मुख्य मंत्रियों को लिखा है कि वे सभी अपने-अपने राज्य में बिकने वाले माल के पैकेजों पर हिंदी में समस्त जानकारी देने के अनिवार्य नियम बनाएं।

लेखक विजय सिंह कौशिक दैनिक भास्कर (मुंबई) के प्रमुख संवाददाता हैं.

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