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आजतक का स्टिंग और आईबी की रिपोर्ट अधूरा सच है, सीबीआई जांच हो

Jitendra Dixit : मुजफ्फरनगर दंगे की सीबीआई जांच होनी चाहिए। आईबी की रिपोर्ट और आजतक का स्टिंग अधूरा सच है। आजतक स्टिंग में केवल एक बात सच लगती है कि कबाल कांड के तत्काल बाद डीएम और एसएसपी की अगुवाई में जो सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ, और प्राथमिक संदेह के आधार पर जिन लोगों को पुलिस थाने लायी, उन्हें किसी बड़े मंत्री के दबाव में छोड़ा गया। जब जिले की स्थिति नाजुक हो तो डीएम और एसएसपी को एक साथ हटाना भी बड़ी गलती थी। डीएम को हटाने तथा कबाल कांड पर अफसरों के दबाव में लिखी गयी रिपोर्ट से एक बिरादरी विशेष को यह संदेश गया कि सरकार उसकी नहीं सुनेगी। इससे उसमें आक्रोश पैदा हुआ।

Jitendra Dixit : मुजफ्फरनगर दंगे की सीबीआई जांच होनी चाहिए। आईबी की रिपोर्ट और आजतक का स्टिंग अधूरा सच है। आजतक स्टिंग में केवल एक बात सच लगती है कि कबाल कांड के तत्काल बाद डीएम और एसएसपी की अगुवाई में जो सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ, और प्राथमिक संदेह के आधार पर जिन लोगों को पुलिस थाने लायी, उन्हें किसी बड़े मंत्री के दबाव में छोड़ा गया। जब जिले की स्थिति नाजुक हो तो डीएम और एसएसपी को एक साथ हटाना भी बड़ी गलती थी। डीएम को हटाने तथा कबाल कांड पर अफसरों के दबाव में लिखी गयी रिपोर्ट से एक बिरादरी विशेष को यह संदेश गया कि सरकार उसकी नहीं सुनेगी। इससे उसमें आक्रोश पैदा हुआ।

प्रशासन की दूसरी गलती खालापार में मुसलिम पंचायत व नगला मदौड़ में दो हिंदू पंचायतों को प्रतिबंधित कर ऐसे उपाय करने चाहिए थे, जिससे वहां लोग न जुटे। जब अयोध्या में ८४ कोस पर फोर्स लगाया जा सकता था, तो मुजफ्फरनगर में क्यों नहीं? नगला मदौड़ की पंचायत को जब ट्रैक्टर जा रहे थे तो लोगों के हाथ में हथियार थे। उनके तेवर आक्रामक थे। रास्ते में कुछ जगह दूसरे संप्रदाय को इंगित कर गालीगलौज भी किया गया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि तब कहां सोया था शासन का खुफिया तंत्र? जब तेवर आक्रामक थे, तो ग्रामीण क्षेत्रों की भावी स्थिति का आकलन क्यों नहीं किया गया? ग्रामीण इलाकों में तत्काल पुलिस की तैनाती क्यों नहीं हुई? पंचायत से लौट रहे लोगों को पुलिस घेरे में क्यों नहीं लाया गया?

इस ढि़लाई का नतीजा है जौली नहर पर हिंसक टकराव। इस टकराव की खबर ने आग में धी का काम किया। नतीजा शाहपुर, फुगाना, बुढ़ाना और कांधला इलाके के गांवों खासतौर पर बहावड़ी, लांक, लिसाढ़ और कुटबा में अल्पसंख्सकों पर हिंसक हमले, आगजनी और लूटपाट की वारदातें हुई। आजतक के स्टिंग में कई थानेदारों ने स्वीकारा है कि गांवों में हमले होते रहे और वह बेबश थे। उनके पास न असलहे थे, न फोर्स और न आला अफसरों से समन्वय। जाहिर है कि उपद्रवी तत्व अल्पसंख्यकों की जान-माल से खुलकर खेले।

हिंसा पीडि़त अल्पसंख्यकों को बंटवारे के समय की तरह अपने घर-गृहस्थी, मवेशी, खेत-पात छोड़ कर राहत शिविरों में आसरा लेना पड़ा। मुसलमानों के समर्थन से सत्ता हासिल करने वाली सपा अभी तक सिर्फ आश्वासन ही दे रही है। पीडि़त इस कदर दहशत में है कि अब वह अपने गांवों को लौटना नहीं चाहते। महीने भर बाद ठंड पड़ेगी। इससे पहले उनके पुनर्वास व नुकसान की भरपायी होनी चाहिए। २७ अगस्त से अब तक लगभग सौ लाशों का पोस्टमार्टम हुआ है। इनमें जितने भी सांप्रदायिक हिंसा के शिकार है, उनके आश्रितों को तत्काल मुआवजा दिया जाना चाहिए।

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

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