कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। ठीक उसी तरह से लखनऊ में लोकमत का भी हाल हुआ है। लखनऊ में संस्करण शुरु करते हुए अपने पहले सम्बोधन में ही लोकमत के चेयरमैन हर्षवर्धन सिंह ने कहा था कि लोकमत में कभी अश्लील विज्ञापन नहीं छापे जाएंगे और समाचार हमेशा स्तरीय होंगे। साथ में उन्होंने यह भी कहा था कि हमे नहीं पता कि हमारा यह समाचार पत्र कितने दिनों चलेगा, हो सकता है कि यह साल भर भी न चले और हो सकता है कि चलता ही रहे।
पर उन्हों ने इस बात पर ज्यादा जोद दिया कि साल भर में हमारी क्या स्थिति होगी उसके बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता हैं कि कितने दिनों तक हम मैदान में रहेंगे। आज उनकी बातें सही साबित होने जा रही हैं और जल्द ही लोकमत का लखनऊ से प्रकाशन बन्द हो सकता है। कम से कम स्थितियां तो साफ-साफ इसी तरफ इशारा कर रही हैं। स्थितियों को देखते हुए अब चेयरमैन ने बकाया न देने का मन बना लिया है। हमे उम्मीद है कि उन्हें ये सारी बाते याद होंगी। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह हैं कि उन्हों ने अपने पत्रकारों से कहा था कि वो उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराएंगे लेकिन अफसोस से कहना पड़ रहा है कि उन्हों ने अपने पत्रकारों को किसी भी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई है। इतना ही नहीं अब तो वो अपने पत्रकारों को गाली भी बकने लगे हैं।
मालूम हो कि अभी कुछ दिन पहले तक पैसे की तंगी झेल रहे हर्षवर्धन सिंह आफिस आने से कतराते थे, लेकिन जैसे ही पैसे उनके पास आए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से गाली-ग्लौज पर उतारु हो गए। अब तो उन्हों ने हद ही कर दी है। उन्हों ने और तथाकथित सम्पादक बने उत्कर्ष सिन्हा साथ मिलकर पत्रकारों का पैसा हड़प करने का अनोखा खेल-खेल रहे हैं। दोनों मिलकर पत्रकारों का पैसा मारने के लिए हिसाब न बनने का बहाना बनाकर एक दूसरे के पास दौड़ा रहे हैं। कर्मचारी कभी सम्पादक के पास तो कभी चेयरमैन के पास दौड़ने का काम कर रहा है। इसी बीच खबर यह भी है कि चेयरमैन ने अपने सम्बंधी पत्रकार को पैसा भुगतान कर दिया है, लेकिन कुछ ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्हों ने काम किया और चार से पांच माह का भुगतान न होने की वजह से लोकमत छोड़ दिया है। अब वो पैसे के लिए लोकमत आफिस के चक्कर लगा रहे हैं।
तो महानुभाव इन पत्रकारों के पैसे का भुगतान कर दें नहीं तो आने वाले समय में आपको पत्रकार ढूंढे नहीं मिलेगें और करीब-करीब ऐसी स्थिति आ भी गई है। सूचना यह भी हैं कि कई ऐसे पत्रकार और हैं, जो लोकमत छोड़ने का मन बना चुके हैं इन्तजार है तो बस अच्छी जगह का। चेयरमैन महोदय आपको सुझाव है कि अपनी आदतों को सुधारिए और पत्रकारों के बकाए पैसे का भुगतान कर दीजिए ताकि आपकी छवि बाजार में पैसा मारु की न होने पाए।
एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.





