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मध्य प्रदेश

कौन यशवंत, भड़ास वाला?

यशवंत होने का मतलब क्या है, यह जानने के लिए आपको यशवंत से मिलना पड़ेगा। भड़ास फॉर मीडिया पढ़कर आप यशवंत के क्रियाकलाप को तो जान सकते हैं, यशवंत को नहीं। छोटे से बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक कोई भी हो, अगर एक बार जिंदादिल इंसान यशवंत से मुलाकात कर ले तो जीवन भर याद रखेगा। नाम, पैसा और शोहरत तो कई पत्रकारों ने कमाए हैं।

यशवंत होने का मतलब क्या है, यह जानने के लिए आपको यशवंत से मिलना पड़ेगा। भड़ास फॉर मीडिया पढ़कर आप यशवंत के क्रियाकलाप को तो जान सकते हैं, यशवंत को नहीं। छोटे से बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक कोई भी हो, अगर एक बार जिंदादिल इंसान यशवंत से मुलाकात कर ले तो जीवन भर याद रखेगा। नाम, पैसा और शोहरत तो कई पत्रकारों ने कमाए हैं।

पत्रकारिता की कमाई में कईयों ने कुर्सी भी कमाए हैं। लोकसभा, राज्यसभा और यहा तक की मंत्रिमंडल में जगह भी पाई है। नहीं कमा पाये तो जन। जी हां, जन। वे पत्रकार जिन्होंने राजनीति की या कर रहे हैं (माफ कीजिएगा, मैं उनकी आलोचना नहीं कर रहा हूँ) लेकिन नाम जरूर गिनवा रहा हूँ। चाहे एमजे अकबर हों, राजीव शुक्ल, अरुण शौरी, चन्दन मित्रा… इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो ये दावा कर सके कि वे अपने दम पर चुनाव जीत सकते हैं या उनके पास बिना पैसे खर्च किए कार्यकर्ता मिल जाएंगे। अब इनकी लोकप्रियता का सही आकलन आप कर सकते हैं।

इतने बड़े नामों के साथ मैं यशवंत की तुलना नहीं कर रहा हूँ, तुलना होने लगी है। गाँव गिराव से लेकर महानगर के पत्रकारों के बीच में चर्चा आए दिन होते रहती है। मध्य प्रदेश विज्ञान एव प्रौद्योगिकी परिषद तथा स्पंदन संस्था का संयुक्त आयोजन 'मीडिया चौपाल 2013 ' भोपाल में भाग लेने आए यशवंत से जब मैं मिला (इससे पहले फोन पर ही बात हुई थी) तो लगा, क्या ये वही शख्स है जिन्होंने पूर्व में कभी अंगूरी ब्रांड की देसी शराब, उत्तराखंड में पर्यटन के दौरान भिक्षाटन, यू पी के पुलिस अधिकारी ब्रिजलाल और पत्रकार विनोद कापड़ी के बारे में अपनी विशेष शैली में लिख चुके हैं। जो जानेमन जेल जैसी वृत्तांत भी लिख चुके हैं। और टीवी 18 के कर्मचारियों की छंटनी के खिलाफ आंदोलन भी कर चुके हैं। वो भी उनके दरवाजे पर जाकर।

यशवंत एक उदाहरण हैं उन पत्रकारों के लिए जिन्होंने नौकरी की परेशानियों के कारण फील्ड चेंज कर लिया या करने की सोच रहे हैं। उन्हे यशवंत से एक बार जरूर मिलना चाहिए, जिससे वो ये जान सकें की धनार्जन और पत्रकारिता में कोई तालमेल नहीं है। बिना पत्रकारिता के भी धन कमाया जा सकता है और बिना धन के भी पत्रकारिता की जा सकती है। बस यशवंत जैसी लगन हो। अंत में यही कहूँगा कि सहज सुलभ और हंसमुख यशवंत आज सिर्फ अमर उजाला या दैनिक जागरण के स्टाफ के तौर पर नहीं बल्कि एक मीडिया क्रांतिदूत के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं और लोकप्रियता ऐसी की भारत में किसी भी पत्रकार सें पूछ भर लो, जवाब देगा- कौन यशवंत, भड़ास वाला?  

राजेश रंजन

भोपाल

[email protected]

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