मुजफ्फनगर। मुजफ्फरनगर में विगत ७ सितंबर से मुस्लमानों पर जो जुल्म और उनका कत्लेआम किया गया, उसकी जितनी भी निंदा की जाये उतनी कम है। साम्प्रदायिकता की इस भयंकर लड़ाई में मुजफ्फरनगर में सियासत का एक नंगा खेल खेला गया जिसको एक न्यूज चैनल ने दो स्टिंग आपरेशन कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि इसके पीछे काबीना मंत्री आजम खां का भी हाथ है। इस न्यूज चैनल के स्टिंग में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन इस चैनल को केवल मुसलमानों के खिलाफ खबरें प्रसारित करने के लिये किसी राजनेतिक दल से पैकेज तो नहीं मिल गया, यह सवाल आजकल अनेक मुस्लिमों की जुबां पर है।
इस चैनल की सत्यता पर मुजफ्फनगर व शामली क्षेत्र के खरड निवासी इसराईल, शमशाद, मुर्तजा, गुलशेर, इरफान, ताहिर, इस्माईल बसी निवासी अब्दुर्रहमान, महबूब, नसीम, इकबाल, सनव्वर दिलशाद जौला गाव के मंजूर, अखलाक, मौ0 नौशाद, मुंशी लियाकत, नवाब आदि दंगा पीड़ित मुस्लमानों ने कहा है कि यह न्यूज चैनल वह कडुवा सच दिखाना नहीं चाहता है जो उनके साथ गुजरी है। वो केवल एक समुदाय को ही निशाना बना रहा है। यह चैनल केवल उन अधिकारियों का बयान दिखा रहा है जो अधिकारी इस पूरे प्रकरण में दोषी हैं। जिन अधिकारियों ने दंगा
इयों की पीठ पर हाथ रखकर मुसलमानों पर गोलियां चलवाईं, उन्हीं अधिकारियों का स्टिंग आपरेशन कर उन्हें ईमानदार साबित कर रहे हैं। उस चैनल को मुसलमानों की बर्बादी से कुछ लेना देना नहीं है। लगभग एक लाख मुसलमान बेघर हो गये और अपने देश तो दूर बल्कि जनपद में रिफ्यूजी बनकर रहे हैं। चैनल प्रयास करता तो मुस्लमानों के अपने ही जनपद में रिफ्यूजी बनाने वाले समाज के दुश्मनों का पर्दाफाश कर सकता था। लेकिन इस चैनल के प्रतिनिधियों ने कैम्पों मे खून के आंसू रो रहे दंगा पीड़ितों का हाल पूछना भी गंवारा न समझा।
मुजफ्फरनगर शामली सहारनपुर व देवबंद में जो जुल्मो सितम मुस्लिम कौम के साथ हुए हैं, उसकी सच्चाई अभी तक उस चैनल ने नहीं दिखाई। इससे साफ होता है कि उक्त चैनल मुसलमानों का दुश्मन है। अवाम ए हिन्द की टीम ने कुछ पीड़ित लोगों से भेट की तो उन्होंने बताया कि यह एक चैनल का ही मामला नहीं है बल्कि दैनिक जागरण, अमर उजाला भी इस साजिश में शामिल हैं। दंगा पीड़ित मुस्लिमों ने प्रदेश के समस्त मुसलमानों से अपील करते हुए कहा कि मुस्लमान इन चैनलों को देखना बंद कर दें और इन अखबारों को खरीदना बंद कर दें तो इन लोगों को सबक मिल सकता है।
इन दोनों समाचार पत्रों ने भी सच्चाई से मुंह मोड़ते हुए केवल जौला कांड को हाइलाइट किया। लिसाढ में मुसलमानों को किस प्रकार जिन्दा जला दिया गया, कितनी मुस्लिम युवतियां व युवक आज भी गायब हैं, मुस्लिम युवतियों को दरिंदों ने किस तरह नोचा, बच्चों तक को नफरत का शिकार बनाया गया, यह सब शायद दोनों समाचार पत्रों को दिखायी नहीं देता। दिखायी भी कैसे देता, जब इनके प्रतिनिधियों की आंखो पर तास्सुब का चश्मा लगा हुआ था।
तस्लीम कुरैशी की रिपोर्ट. संपर्क: 9897404006, 9411078982





