Yashwant Singh : भड़ास के पास आए इस पत्र को जब पढ़ रहा था तो पहले तो सरसरी तौर पर लगा कि ये मीडिया का मसला नहीं है, इसलिए डिलीट मार दूं… पर जाने क्यों, कुछ अटक सा गया, कुछ टच सा कर गया… दुबारा पढ़ने लगा… और तब, इस पत्र की मासूमियत, सहजता, इस पत्र में दर्ज दुख को पेश करने का लहजा धीरे-धीरे दिल में उतरने लगा, अपने-से बांधने-सा लगा.. जोड़ने सा लगा… मैं उस पत्र और पात्र में खुद के अक्स को देखने लगा… पाने लगा… अपने गांव और गांव वाले याद आने लगे… कुछ कुछ प्रेमचंद, रेणु के पात्र और संवाद याद आने लगे.. 'राग-दरबारी' के दृश्य घूमने लगे..
साथ ही, यह भी सोचने लगा कि गांव के लोग भी भड़ास से उम्मीदें पालने लगे? कहीं दूसरों के उम्मीदों, आकांक्षाओं के बोझ की बलि न चढ़ जाऊं… मन उदास सा होने लगा… पर.. जो मूल बात है, वो ये कि इस पत्र को, इसके मर्म को कोई समझ ले तो समझ लेगा कि करप्शन किस लेवल पर है और यह करप्शन किस तरह मनुष्यता, संवेदना, सहजता को किल कर रहा है.. यह करप्शन हर किसी को कमीना बनाने पर तुला हुआ है…
कमीना करप्शन…
लखनऊ के साथियों से चाहूंगा कि कु. मनु देवी की इस समस्या को सीधे अखिलेश यादव की प्रेस कांफ्रेंस में उठाएं ताकि हाशिए के आखिरी आदमी को यह भरोसा हो सके कि इस लोकतंत्र में गल्ती से कभी कभी उसकी भी बात शीर्ष लेवल पर पहुंच जाती है, सुन ली जाती है… कु. मनु देवी के इस पत्र को पढ़कर बिलकुल सही कमेंट किया है संजय कुमार सिंह जी ने…
''इस भ्रष्टाचार को दूर करना ज्यादा जरूरी है। इसमें किसी सबूत की जरूरत नहीं है, किसी शिकायता की भी नहीं और गवाहों की भी नहीं। यह शिकायत अपने आप में स्पष्ट और साबित है। पर यकीन है कुछ नहीं होगा और संभव है कि लेखापाल शिकायतकर्ता को ही परेशान करे। विज्ञान, तकनीक और संचारक्रांति के इस युग में क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती है कि इस तरह के भ्रष्टाचार करने वाले की हिम्मत ही न हो ऐसा सोचने के लिए। अगर आठ सौ रुपए में किसी की आमदनी एक साल में 18,000 रुपए से 96,000 रुपए होने का सरकारी दस्तावेज बन सकता है तो इस देश में सरकारी दस्तावेजों की कोई साख रहेगी क्या। शर्मनाक।''
पत्र ये है..
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अतः श्रीमान भड़ास जी से निवेदन है कि इस लेखपाल को सस्पेंड करवा दें
http://bhadas4media.com/state/up/14632-2013-09-21-10-27-19.html
भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.





