‘रांची एक्सप्रेस’ को मैं कभी नहीं भूल सकता। यहां की नौकरी छोड़े 29 साल हो चुके हैं, परन्तु वहां से पाठकों को निष्पक्ष सूचना देने की जो शपथ ली उससे अब तक नहीं डिगा। मध्य सितंबर में जब अपनी पत्नी की दिवंगत भाभी के श्राध्द में रांची गया तो ‘रांची एक्सप्रेस’ के संस्थापक संपादक बलबीर दत्तजी, जो पत्रकारिता में मेरे प्रथम गुरु हैं, से मिलने के लिए मन मचल उठा। समय लेकर शाम को पहुंच गया उनके दफ्तर।
बलबीर जी को पांच साल पहले मेरी बेटी की शादी के मौके पर जैसा देखा था वैसा ही दिखे। उनके टेबल पर छपने वाले सभी पन्नों की प्रिंट कॉपी। संपादक की इजाजत के बाद ही पेज अब भी पास होता है। मुझे लगता है कि किसी भी प्रतिष्ठित और पुराने अखबार में शायद ही संपादक इतनी गहराई से सारे पन्नों की पड़ताल करते होंगे।
मैं फ्लैशबैक में चला गया। मैं 1981 से 1984 के बीच रांची में लॉ का छात्र था। छोटानागपुर लॉ कॉलेज से कुछ ही फासले पर तब रांची का इकलौता अखबार था- ‘रांची एक्सप्रेस’। झारखंड के इस लोकप्रिय अखबार के ‘लोकवाणी’ स्तम्भ में मेरे कई पत्र संपादक के नाम छप चुके थे। पत्रकार बनने की लालसा लेकर मैं एक दिन अपर बाजार में बड़ा लाल स्ट्रीट स्थित ‘रांची एक्सप्रेस’ के दफ्तर में बलबीर जी से मिला। मुलाकात के लिए अनावश्यक परेशानी नहीं झेलनी पड़ी। साथ में मैं ‘रांची एक्सप्रेस’, दैनिक ‘प्रदीप’ और ‘सारण संदेश’ में अपने छपे समाचार और संपादक के नाम छपे पत्रों की कतरनें, एक कॉपी में चिपकाकर ले गया था। संपादकजी ने कहा-कल से आ जाओ। अखबार में मेरी यह पहली नौकरी थी। खुशी का ठिकाना नहीं था।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि तब अधिकतर पत्रकारों की शादी बमुश्किल होती थी। तब मेरे पिताजी (गुमला में सेकेंड एसडीओ थे) के कहने पर मेरे ससुर और मंझले साले ‘रांची एक्सप्रेस’ में मुझसे मिलने आए। उन्हें मेरी अखबारी नौकरी या परिवार की आर्थिक स्थिति या मेरी सूरत में से क्या पसंद आया, मैं नहीं जानता मगर सन 1983 में मेरी शादी संध्या से हो गई। मुझे याद है तब रांची में मुझसे सीनियर कई पत्रकारों की शादी नहीं हुई थी। आज भी मुझे आश्चर्य होता है कि इतने कठिन पेशे की नौकरी अख्तियार करने के बाद भी मेरी शादी आसानी से कैसे हो गई। बहरहाल, ‘रांची एक्सप्रेस’ और बाद में ‘प्रभात खबर’ में कई उल्लेखनीय रिपोर्टिंग की वजह से झारखंड में मेरी जो पहचान बनी वह अब भी कायम है।
अनुशासन का पाठ ‘रांची एक्सप्रेस’ में ही सीखा। बलबीर जी नियमतः रोज सुबह 11 बजे संपादकीय बैठक लेते थे, उसमें जो लेट पहुंचता उसका नाम उनके चैम्बर में लगे नोटिस बोर्ड पर चढ़ जाता था। संयोगवश मेरा नाम एक-दो बार से अधिक नहीं चढ़ा। हमलोगों को संस्थापक संचालक सीताराम मारू, उनके पुत्रों विजयजी, पवनजी और अजयजी से काम करने की जो आजादी मिली शायद वह व्यवस्था आज भी कायम है। इतिहास साक्षी है कि ‘रांची एक्सप्रेस’ ने झारखंड के लोगों में न केवल अखबार पढ़ने की आदत डाली बल्कि, देश-दुनिया के बारे में जागरूकता बढ़ाई। इसने अनेक लोगों को जहां पत्रकारिता सिखायी वहीं दूसरी ओर तमाम गतिविधियों को अपने पन्नों में समेटकर बताया कि झारखंड के लोगों को भी को आगे बढ़ने का उतना ही अधिकार है जितना शेष दुनिया के लोगों को। इस अखबार ने महत्वाकांक्षी लोगों के सपनों और अरमानों में पंख लगाये।
मैं 1996 में रांची होते हुए नागपुर से दिल्ली आ गया। कुछ समय के लिए मैंने वाराणसी और लखनऊ में भी पत्रकारिता की मगर, मैं ‘रांची एक्सप्रेस’ और बलबीर जी से सीखे मूल्यों और उसूलों को आज भी याद रखता हूं, शायद इसी वजह से किसी ने मुझ पर अब तक अंगुली नहीं उठाई। काश, ऐसा ही संपादक गुरू हर नौजवान को मिले जो पत्रकार बनने का सपना दिल में संजोए हुए है। लेकिन वह यह कभी न भूले कि पत्रकारिता की डगर में उन्हें सम्मान और शोहरत तो मिलेगी मगर नौकरी हमेशा दांव पर रहेगी।
लेखक राय तपन भारती वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक हैं. ये कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं.





