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वो गुलाबी हैंकी वाली लड़की ‘दिव्या’ जाने कहां होगी?

हमारी ज़िंदगी में जो कुछ भी घटित होता है, उनमें अधिकांश पर हमारा नियंत्रण नहीं होता. स्वेच्छा से या जबरिया हम परिस्थिति का दास बन, बस साक्षी भाव से उन लम्हों के झेलते चले जाते हैं. लेकिन यादों के गलियारे में जब कभी गुजरे ज़माने के खुशनुमा पल दस्तक देते हैं. हमारा मन बिना रुमानी हुए नहीं रह पाता. खासकर टीन एज के उन दिनों को याद कर कभी खुद की बेवकूफी पर हंसी आती है. तो काफी इसे उम्र का तकाजा मान नजर अंदाज कर देता हूं. क्योंकि ये उम्र ही ऐसी होती है.

हमारी ज़िंदगी में जो कुछ भी घटित होता है, उनमें अधिकांश पर हमारा नियंत्रण नहीं होता. स्वेच्छा से या जबरिया हम परिस्थिति का दास बन, बस साक्षी भाव से उन लम्हों के झेलते चले जाते हैं. लेकिन यादों के गलियारे में जब कभी गुजरे ज़माने के खुशनुमा पल दस्तक देते हैं. हमारा मन बिना रुमानी हुए नहीं रह पाता. खासकर टीन एज के उन दिनों को याद कर कभी खुद की बेवकूफी पर हंसी आती है. तो काफी इसे उम्र का तकाजा मान नजर अंदाज कर देता हूं. क्योंकि ये उम्र ही ऐसी होती है.

जब ख्यालों में जीना और हर पल मुगालते में रहना ही दिनचर्या सी रहती है. लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता जाता है, चीजों को देखने, उनके बारे में सोचने-समझने के प्रति हमारा नजरिया भी बदल जाता है. जीवन का एक पड़ाव पार करने के बाद ना वो बेचैनी रहती है, ना ही उतनी अकुलाहट या छटपटाहट. और… हम गजब की गंभीरता का आवरण ओढ़ उसी में खुद को छुपा लेते हैं.

खैर, अब मुद्दे पर लौटता हूं. बात तब की है जब मैं मुंशी सिंह कॉलेज, मोतिहारी में इंटर विज्ञान के प्रथम वर्ष का छात्र था. तब सरकारी कॉलेज में नाम लिखा निजी ट्यूशन करने का चलन उफान पर था. मैं भी शहर के चांदमारी मोहल्ले में संचालित तत्कालीन स्टार निजी शिक्षकों के यहां गणित व भौतिक का ट्यूशन करने लगा. इसके चलते इतनी भागदौड़ रहती कि कब सुबह से शाम हो जाती, पता ही न चलता. वर्ष 99 के दिसम्बर महीने की सर्द भरी सुबह थी वह. करीब छह बज रहे थे और चारों तरफ फैले घने कोहरे के कारण अभी भी अंधेरा था. मैं कॉलेज के पास में ही स्थित कोने वाले नुक्कड़ पर खड़ा हो चाय की चुस्की लेते हुए ठंड से लड़ने की कवायद कर रहा था. हालांकि मेरे बदन पर जैकेट, कानों में मफलर व हाथों में दास्तानें थे. लेकिन बर्फीली हवा हाड़ जमा देने वाली थी. तभी सामने से उजले स्वेटर में एक बला की गोरी-चिट्टी खूबसूरत लड़की साईकल पर सवार पिछले क्लियर में किताबें दबाए गुजरी.
मॉडल फोटो

मैंने आंव न देखा ताव, अपनी हीरो जेट साईकल तेज कर दी और उसके पीछे हो लिया. इस लिहाज से उसका पीछा करने लगा की जा कहां रही है? थोड़ी ही देर बाद मैंने देखा वह एक नामी भौतिक शिक्षक के घर के पास रूक गई. क्लास रूम में जाते हुए मैंने एक नजर उसकी तरफ डाली. उसने भी जाते-जाते सरसरी निगाहों मुझे देख लिया था. मुझे अंदेशा हुआ कि अब इससे रोज मुलाकात होगी. चुंकि मैं भी उससे सटे ही गणित का क्लास करता था. फिर तो मेरा दिल भी मारे ख़ुशी के ‘यूरेका-यूरेका’ बोल उठा. करीब 5 फीट 3 इंच का कद, मासूम चेहरा पर छोटी-छोटी आंखे और बाहर की ओर निकले गाल. यहीं रंग-रूप था उसका. मैंने मन ही मन उसका नाम ‘दिव्या भारती’ रख लिया. फिर तो रोज ही उससे मुलाकात होने लगी. दरअसल मैं पांच मिनट पहले ही उस चाय की दुकान पर पहुंच उसकी एक झलक पाने के लिए बेसब्री से इंतजार करता. भले ही हम बात न कर पाते हों, लेकिन एक-दूजे की नजरें जब टकरातीं तो बिना कुछ कहे ही हृदयरूपी कमल की पंखुडियां खिल उठतीं.

एक गाने में वह पंक्ति है न, ‘आंखें भी तो होती है, दिल की जुबान’ ठीक वहीँ हालत अपनी हो चली थी. किसी से बिना इजाजत लिए कोई किसी के अंतरात्मा में कैसे घुस जाता है इसका एहसास पहली बार हो रहा था. आते-जाते, सोते-जागते हर घड़ी उसका ही ख्याल. उसकी मासूमियत भरी खूबसूरती ने मानो कोई जादू कर दिया था मुझपर. और मैं लाचार भौरे की तरह उसकी तलाश में मारा-मारा फिरने लगा. चुंकि ट्यूशन के लिए शहर की विभिन्न गलियों में दिन भर आना-जाना लगा ही रहता. जब भी हम किसी चौराहे पर मिलते मैं उसकी पाक आंखों में कुछ ढूंढने लगता. शायद यह उसके मानस पटल पर अपना अस्तित्व तलाशने की इकतरफा पहल थी मेरी. पर यह नहीं समझ पा रह था कि ये आकर्षण है, अनुराग है या निश्चल प्रेम. हां, इतना जरूर था कि इस चक्कर में अपनी पढ़ाई की वाट लगने लगी. दरअसल ये उम्र ही ऐसी होती है जब बिना अंजाम की परवाह किए, हमारे सपनें लंबी उड़ान भरने लगते हैं. और मैं भी अंजानी चाहत के रंग में रंगने लगा.

करीब तीन महीने बाद उसी चायवाले के बगल में स्थित फोटोस्टेट की दुकान पर उससे करीब से रू-ब-रू हुआ. औपचारिक हाय, हेल्लो के बाद परिचय भी हुआ. बातचीत से पता चला की वह इसी जिले के एक गांव की निवासी है. उसके पिताजी रेलकर्मी हैं और मोतिहारी रेलवे स्टेशन के सरकारी क्वाटर में रहती है. वह मेडिकल की तैयारी कर रही थी. चुंकि मैंने भी बायोलॉजी को अतिरिक्त विषय के रूप में लिया था. लेकिन मेरा लक्ष्य इंजीनियर बनने का था (जैसा की इस दौर में हर लड़के की चाहत कम-से-कम आईआईटी निकालने की अवश्य होती है). वैसे भी मुख्य विषय न होने के कारण बायोलॉजी में पास होने की बाध्यता नहीं थी. इसलिए मैं गणित को लेकर ज्यादा गंभीर था. फिर भी मैंने उससे बायोलॉजी की तैयारी के लिए मदद मांगी तो उसने नोट्स देने का आश्वासन दिया. आप यह जानकर मुझपर हंसे बिना नहीं रह सकेंगे कि इस छोटी सी मुलाकात में मैंने अपना नाम तो उसे बता दिया. लेकिन उसका नाम नहीं पूछ पाया. क्योंकि कुछ झिझक भी थी और मेरा जेहन ‘दिव्या’ के अलावे दूसरा नाम स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था.

इसके बाद नोट्स आदान-प्रदान के बहाने अक्सर मिलने लगे. जब भी हम मिलते मुस्कुराकर एक-दूसरे को विश करते. कस्बाई शहर था, कहीं परिजनों या किसी जानने वाले की नजर ना पड़ जाए. इसलिए लोकलाज के भय से थोड़ी देर ही ठहर पाते, यानी ‘चलते-चलते’ वाली स्थिति थी. उस समय में ना मोबाइल की सुविधा थी, ना ही इंटरनेट सर्व सुलभ था. अभियक्ति के लिए टेलीफ़ोन का पैशन चरम पर था. दिव्या के घर में फ़ोन था पर इसे आलसीपन कहिए या कुछ और, मैं उससे नंबर नहीं ले पाया था. अक्सर सोचता कि आज उससे नंबर मांग ही लूंगा, लेकिन जो सोचे उसे हकीकत में तब्दील कर डाले. उस तरह का हिम्मती लड़का था नहीं मैं. हां, इतना जरूर था कि मिलते-जुलते हमारे बीच के जज्बातों की दूरियां कम होने लगीं. इसी उधेड़बन में दिसम्बर आ गया और दो महीने बाद ही अंतिम वर्ष की परीक्षा थी. हम लोग परीक्षा की तैयारी में व्यस्त हो गए. संयोग से दोनों का परीक्षा केन्द्र एलएनडी कॉलेज में था. वह मुझसे दो डेस्क पीछे थी.

केन्द्र पर परीक्षा की सुरक्षा व्यस्था इतनी कड़ी थी कि जरा सा हिले-डुले नहीं और निष्काषित हो गए. फिर भी मैं परीक्षक की नजर बचाके उसे वैकल्पिक प्रश्नों का हल बता ही देता. अंतिम दिन हिंदी की परीक्षा थी और ‘दिव्या’ की पकड़ इस नीरस विषय पर ना के बराबर थी. जबकि शुरू से ही मेरी इस भाषा में दिलचस्पी थी जिसके कारण मुझे इसमें अच्छे नंबर आते थे. आखिरी परीक्षा होने के चलते इस दिन परीक्षार्थियों को कहीं भी बैठने की छूट थी. उसने मुझसे आग्रह किया कि मैं उसके बगल में बैठ जाऊं तो उसे सहयोग लेने में आसानी होगी. मेरी तो जैसे मनचाही मुराद पूरी हो गई हो. यह बात और थी कि उसके करीब आने के लिए और भी मजनूं छाप लड़के बेताब थे. लेकिन उसका साथ तो मेरी किस्मत बदा था. अपने पेपर लिखने के साथ उसकी भी मदद करते हुए तीन घंटे की परीक्षा मैंने डेढ़ घंटे में ही पूरी कर ली. फिलहाल हमारे पास बात करने के लिए डेढ़ घंटे शेष बचे थे.

कक्षा के अन्य छात्र जहां कापियां भरने में लगे थे, इसके इतर हम दोनों भविष्य को लेकर खुसर-फुसर करने लगे. अरसे से दिल में छुपी कई तरह की भावनाएं खुलकर सामने आई. इसके साथ ही आगे दोस्ती जारी रखने का कमिटमेंट भी हुआ. बातों-बातों में पता चला, इंटर के बाद उसका इरादा पटना जाकर मेडिकल तैयारी करने का है. मैंने भी पटना चलने कि हामी भर दी. आगे बातचीत जारी रखने के लिए उसने अपना फ़ोन नंबर लिखकर दिया. मैंने उसी वक्त याद के तौर पर अपना पार्कर पेन गिफ्ट कर दिया. उसके पास एक छोटा सा तौलियानुमा गुलाबी रूमाल यानी हैंकी थी. जिससे डेनिम सेंट की भीनी-भीनी खुश्बू आ रही थी. बदले में उसने भी मुझे दे दिया. तभी समय पूरा होने की घंटी बजी और उसका भाई उसे लेने क्लास रूम के दरवाजा तक गया. उसने धीमे से मुस्कुराते हुए ‘बाय’ कहा और बाहर निकल गई. मुझे क्या पता था यह उसकी अंतिम अलविदा थी.

हुआ यूं कि कुछ रोज बाद ही जब मैंने उसकी खैरियत लेने के लिए फ़ोन लगाया तो उधर से नंबर डेड होने की आवाज आ रही थी. दूसरा, मैंने रेलवे कॉलोनी में उसका घर देखा नहीं था. उसका पता जानने के लिए अंदाजन ही उसके कॉलोनी के कई चक्कर लगाए. करीबी दोस्तों से भी पड़ताल करवाई. लेकिन उसका मिलना तो दूर रहा उसकी परछाई भी न मिल सकी. इस घटना के बाद कई दिनों तक डिप्रेसन में रहा मैं. हालत यह थी कि रातों की नींद गायब सी हो गई, ना भूख-प्यास लगती, ना ही कुछ करने में मन लगता. हर घड़ी उसका खिलखिलाता चेहरा आंखों के सामने घूमते रहता. लेकिन वक्त के थपेडों ने ने धीरे-धीरे ही सही इस घाव को भर दिया. आज इस घटना को बीते 13 वर्ष हो गए. पर अभी भी यह सोच नौस्टेलेजिक हो जाता हूं. कि आज की तरह उस समय भी मोबाइल और सोशल साइट्स होते तो हमारी चाहत किस मुकाम तक पहुंची होती?

पूर्वी चंपारण के पत्रकार व लेखक श्रीकांत सौरभ 'मेघवाणी ब्लॉग' के मॉडरेटर है. यह आलेख वहीं से साभार है. उनसे मोबाइल नंबर 9473361087 पर संपर्क किया जा सकता है.

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