: कानाफूसी : संपादकीय विभाग के कर्मियों से हो रही है खूब बदतमीजी : घुटन में जी रहे जागरण के स्थापना काल से जुड़े पत्रकार : सूचनाएं मिलने के बाद भी चुप है कंपनी का शीर्ष प्रबंधन : अरब देशों के क्रूर तानाशाहों की करतूतें जब जब हद से गुजरने लगी तब लोगों ने मौत को हथेली पर लेकर जनविद्रोह किया। नतीजा हुआ कि तीन अरब देशों में तानाशाहों को अपने तख्त-ओ-ताज छोड़ना पड़ा। यह सब इसीलिए हुआ कि वहां के लोगों ने निर्भीक होकर क्रूर तानाशाहों से लड़ने की हिम्मत जुटाई। अरब के लोगों की इस सफलता को ‘अरबी बसंत’ का नाम दिया गया।
पिछले करीब एक वर्ष से तानाशाही के साए में जी रहे दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग के कर्मी यह सोच रहे थे कि नया साल उनके लिए भी ‘अरबी बसंत’ जैसा होगा, पर उनकी यह आस न सिर्फ अधूरी रही, बल्कि रोज-रोज और हालात बिगड़ रहे हैं। दैनिक जागरण, गोरखपुर के स्थापना काल से ही जुड़े अनेक वरिष्ठ संपादकीय कर्मी आजकल इसलिए घुटन में जी रहे हैं कि रात में ड्यूटी के दौरान वे जो भी 8-10 घंटे दफ्तर में गुजारते हैं, इस बीच उन्हें यह भय सताता रहता है कि उनके विभाग का स्वयंभू विभागाध्यक्ष कभी भी उनसे बदतमीजी कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब गोरखपुर के सीजीएम सीकेटी ने यूपी स्टेट हेड काका को कथित औकात बताई थी तबसे कुछ समय तक उनका यह ‘चेला’ और दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग का स्वयंभू विभागाध्यक्ष शांत रहा। पर, इधर कुछ दिनों से फिर उसके तेवर में गर्मी आने लगी है। लगता है कि काका ने उसे यह छूट दे दी है यहां के संपादकीय कर्मियों से अपनी बदतमीजी बदस्तूर जार रखो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। शायद यही वजह है कि उक्त कथित विभागाध्यक्ष नए-नए बहाने खोजकर यहां के वरिष्ठों, पुराने और योग्य संपादकीय कर्मियों से बदतमीजी कर रहा है। इसी हफ्ते जागरण, गोरखपुर के न्यूज रूम में तीन घटनाएं हुई, जिसकी चर्चा न सिर्फ गोरखपुर बल्कि लखनऊ, कानपुर और दिल्ली तक है।
पहला वाकया उस वक्त हुआ जब इनपुट विभाग के सेकेंड हेड ने बाहर भेजी जाने वाली खबरों से संबंधित कुछ प्लानिंग करके कथित विभागाध्यक्ष को सौंपी। प्लानिंग को देखते ही अपनी आदतों के अनुसार विभागाध्यक्ष ने उसमें मीन-मेख निकालना शुरू किया। नतीजा यह हुआ काफी दिनों से उसकी बदतमीजी झेलते हुए खून की घुंट पीने वाले सेकेंड इनपुट हेड को भी गुस्सा आ गया और उन्होंने उसे भी लताड़ते हुए चुनौती दे डाली। इतना सुनते ही वह शर्माई बिल्ली की तरह खंभा नोचने लगा। शायद यह पहली बार था, जब किसी ने ‘तानाशाह’ के सामने तेज आवाज में बोलने की हिम्मत जुटाई थी। वरना, अधिकतर लोग तो उसकी बदतमीजी को न जाने क्या मानकर ग्रहण कर लेते हैं, यह कोई नहीं समझ पाता। इस घटना के बाद संपादकीय विभाग के पीड़ित-प्रताड़ित कर्मियों में क्षणिक खुशी देखी गई।
अभी इस प्रकरण की चर्चा चल ही रही थी कि उक्त ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ अगले ही दिन एक और संपादकीयकर्मी (देश के शीर्ष स्तंभकारों में शुमार) से उलझ गया। उक्त कर्मी कुछ महीना पहले ही वेस्ट यूपी के किसी यूनिट से स्थानांतरित होकर गोरखपुर आया था। सूत्रों का कहना है कि यह नया संपादकीयकर्मी ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ की नजर में कुछ दिनों से इसीलिए खटक रहा था कि उसकी सीकेटी से निकटता क्यों है। फलस्वरूप, उसने उक्त चर्चित पत्रकार से भी बदतमीजी कर डाली। इन दोनों मामलों को लेकर जागरण, गोरखपुर के संपादकीयकर्मी उच्च प्रबंधन से मिलकर अपनी समस्या बताने की योजना बना ही रहे थे कि ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ 29 दिसंबर की शाम किसी को खबर को छापने के सवाल पर विज्ञापन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से उलझ से गया। कहा जा रहा है कि विज्ञापन विभाग के कर्मचारी भी उस ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ के खिलाफ रणनीति बनाने में जुट गए है। साथ ही यहां के जागरणकर्मी बड़ी बेसब्री से अब उस निरीह दुर्भाग्यशाली संपादकीय कर्मी को ढूंढ रहे हैं, जिसे ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ अपना अगला निशाना बनाने वाला है।
सूत्रों का कहना है कि दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग के भयाक्रांत कर्मियों की दुर्दशा के बारे में सीजीएम सीकेटी द्वारा शीर्ष प्रबंधन को अवगत करा दिया गया है, किन्तु उस पर कोई सुनवाई न होना, यह सिद्ध करता है कि शायद जागरण प्रबंधन ही यहां की लुटिया डुबोना चाहता है। कहा जा रहा है कि ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ की कार्यशैली से खून की आंसू रो रहे संपादकीयकर्मी किसी नए ठौर की तलाश में हैं। यदि सूत्रों पर भरोसा करें तो मौका मिलते ही संपादकीय विभाग के 90 फीसदी से अधिक पत्रकार एकसाथ अचानक वहां शिफ्ट हो सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ और उसके संरक्षक काका की ही होगी।
उधर, ‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’ के एक करीबी पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि काका की ओर से सर (‘बदतमीज विभागाध्यक्ष’) को पूरी छूट है। काका ने कह रखा है कि चाहे कुछ भी हो जाए चुनाव में जमकर ‘खेलो’। जो भी होगा, वह चुनाव बाद ही होगा। चुनाव से पहले तुम्हें नहीं हटने दूंगा। यही वजह है कि सर का हौसला बुलंद है।
बताया गया कि सर जबसे गोरखपुर आए हैं, तबसे एक और खास रणनीति पर काम कर रहे है। इसके तहत वह अपने से ज्ञानी किसी को इसलिए नहीं मानते कि यदि किसी दूसरे प्रतिभावान व्यक्ति की चर्चा प्रबंधन तक होगी तो उनकी कुर्सी तुरंत खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए वे खुद को इन्साइक्लोपीडिया मानते हुए गलत बातों को भी मनवाने की जिद पर अड़े रहते हैं। फिलहाल, दैनिक जागरण, गोरखपुर के संपादकीय विभाग के कर्मियों को इस शुभकामना के साथ नए वर्ष की बधाई कि आप लोगों की दशा जल्द सुधरे। वैसे मौजूदा हालात को देख यह नहीं कहा जा सकता कि वहां ‘अरबी बसंत’ की कल्पना की जा सकती है।
गोरखपुर से एक पत्रकार की रिपोर्ट पर आधारित. जरूरी नहीं कि उपरोक्त बातें सच ही हों. इसलिए प्रकाशित किया गया है ताकि अंदरखाने की उछलकूद किसी भी तरीके से और किसी भी रूप में बाहर आ सके. अगर आप उपरोक्त बातों से इत्तफाक नहीं रखते तो अपनी असली बात लिख भेजिए, आपके नाम व पहचान का खुलासा न करने की गारंटी भड़ास4मीडिया की है. भड़ास तक अपनी बात [email protected] के जरिए पहुंचा सकते हैं.





