वही हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। बहुचर्चित चारा घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव कानूनी शिकंजे में फंस गए हैं। इस बार ऐसा फंसे हैं कि उनके राजनीतिक कैरियर पर सवालिया निशान लग गया है। वे आगामी लोकसभा चुनाव में अपने को ‘किंगमेकर’ की भूमिका में देखने का मंसूबा बांध रहे थे। लेकिन, अदालत के फरमान पर वे जेल भेज दिए गए हैं। 3 अक्टूबर को अदालत सजा का ऐलान कर देगी। ऐसे में, आनन-फानन उनकी लोकसभा की सदस्यता भी चली जाएगी।
लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार ने इस आशय के संकेत भी दे दिए हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि घोटाले के मामले में रांची की सीबीआई अदालत ने लालू के खिलाफ जो आरोप सही पाए हैं, उनके हिसाब से उन्हें 3 से 7 साल तक की सजा सुनाई जा सकती है। कहीं लालू के समर्थक रांची में अदालत परिसर में कोई बड़ा बवाल न करें, इसी से ऐतिहात के तौर पर कोर्ट ने उन्हें सोमवार को ही जेल भिजवा दिया है। चारा घोटाले में लालू यादव के साथ 45 अन्य लोगों को भी दोषी करार किया गया है। इस प्रकरण से बिहार की राजनीति में चुनावी गठजोड़ के नए खेल शुरू हो जाएंगे। संकेत मिलने लगे हैं कि नई स्थितियों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और कांग्रेस नेतृत्व के बीच ‘चुनावी समझदारी’ बन जाने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
यूं तो लालू यादव और उनकी पार्टी लंबे समय से कांग्रेस की सहयोगी भूमिका में रही है। यूपीए सरकार की पहली पारी में लालू यादव की राजनीतिक स्थिति काफी मजबूत थी। ऐसे में, वे रेलवे जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय अपनी झोली में डाल लेने में सफल रहे थे। लेकिन, 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को काफी झटका लगा था। हालांकि, वे खुद चुनाव जीत गए थे। लेकिन, तमाम कोशिशों के बावजूद भी इस बार कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें सरकार में हिस्सेदारी नहीं दी। यह अलग बात है कि कांग्रेस की राजनीति से आहत होने के बाद भी लालू ने विरोध की डगर नहीं पकड़ी। उनका दल यूपीए सरकार का बाहर से समर्थन कर रहा है।
बिहार की राजनीति में लंबे समय तक लालू यादव की काफी हनक रही है। एक दौर में लालू के संग लग कर कांग्रेस नेतृत्व यहां चुनावी वैतरणी पार करना चाहता था। लेकिन, उसे इस गठजोड़ का कभी ज्यादा लाभ नहीं हुआ। अपना राजनीतिक वर्चस्व बढ़ाने के लिए लालू और राम विलास पासवान ने हाथ भी मिलाया, साथ मिलकर चुनाव भी लड़ा। फिर भी, ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई। लेकिन, राजद और लोक जनशक्ति पार्टी की मिलीजुली ताकत अब सत्तारूढ़ जदयू को मजबूत चुनौती देने की स्थिति में आती जा रही थी। ऐसे दौर में लालू यादव चारा घोटाले में अंदर चले गए हैं। लालू की अनुपस्थिति में पार्टी की चुनावी रणनीति काफी लुंजपुंज पड़ सकती है। लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख राम विलास पासवान ने कहा है कि लालू के फंस जाने से राजद को थोड़ी दिक्कतें तो आएंगी, लेकिन वे इस तरह के विश्लेषण को सही नहीं मानते कि इस प्रकरण से लालू का राजनीतिक कैरियर एकदम चौपट हो जाएगा। पासवान कहते हैं कि इंतजार कीजिए राजद एक बार फिर अपनी मजबूत पकड़ बनाकर दिखा देगा। वैसे भी राजनीति में इस तरह के उतार-चढ़ाव आते-जाते रहते हैं।
सत्तारूढ़ जदयू और राजद के बीच खास राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता दशकों से चली आ रही है। यह अलग बात है कि जनता दल के दौर में लालू और नीतीश एक ही साथ काम कर रहे थे। बिहार की राजनीति में दोनों नेताओं का उदय जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के दौर में हुआ था। लेकिन, प्रदेश की राजनीति में लालू का कद नीतीश के मुकाबले बड़ा हो गया था। ऐसे में, वे 1990 में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए थे। सत्ता की दूसरी पारी के दौरान ही वे चारा घोटाले की लपेट में आ गए थे। लिहाजा, उन्हें जुलाई 1997 में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। उन्होंने सीबीआई अदालत के सामने समर्पण किया था। सत्ता की विरासत लालू ने अपनी निरक्षर पत्नी राबड़ी देवी को ही सौंपी थी। राबड़ी ने भी लंबे समय तक बिहार सरकार की बागडोर संभाली। करीब 15 साल तक लालू-राबड़ी का राज बिहार में रहा।
लालू-राबड़ी के राज को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई बार ‘जंगलराज’ करार कर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि इस कार्यकाल में बिहार का बेड़ा सबसे ज्यादा गर्क हुआ है। बिहार की राजनीति में भाजपा और जदयू के गठबंधन ने राजद को बड़ी चुनौती दी। इस तरह से राजद की गाड़ी राज्य में सत्ता की पटरी से उतरी थी। नीतीश कुमार ने भाजपा की मदद से सत्ता संभाली थी। जल्दी ही उनकी सरकार लोकप्रिय हुई। इसी के चलते बिहार में नीतीश कुमार ने सत्ता की दूसरी पारी भी बड़े आराम से शुरू कर दी। 17 साल से भाजपा और जदयू का राजनीतिक गठबंधन चला आ रहा था। लेकिन, नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित मुद्दे पर जदयू ने भाजपा से रिश्ता तोड़ लिया। क्योंकि, इस पार्टी के दिग्गज नेता एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सेक्यूलर राजनीति को दांव पर लगाने को तैयार नहीं थे। वे लगातार विरोध कर रहे थे कि दंगाई छवि वाले नरेंद्र मोदी को भाजपा, प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाए। लेकिन, जब भाजपा में मोदी के लिए दबाव बढ़ा, तो जदयू ने अल्टीमेटम की राजनीति शुरू की। अंतत: इसी मुद्दे पर जदयू नेतत्व एनडीए से अलग हो गया।
इस प्रकरण के बाद नीतीश ने अपने बलबूते पर बिहार में अपनी सरकार बरकरार रखी। अब, राजद के साथ भाजपा से भी उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ चली है। भाजपा से अलग होने के बाद अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिए जदयू की दावेदारी भी और बढ़ गई है। इसी होड़ में पासवान और लालू भी रहे हैं। ये दोनों नेता नीतीश कुमार को छद्म सेक्यूलरवादी नेता करार करते हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत यह है कि राज्य में राजद की अपेक्षा जदयू की राजनीतिक जमीन ज्यादा मजबूत है। ऐसे में, कांग्रेस नेतृत्व ने कई महीने पहले से नीतीश से रिश्ते ठीक करने शुरू किए थे। यह अलग बात है कि नीतीश से कांग्रेस की बढ़ती नजदीकी लालू और पासवान को कभी रास नहीं आई। इस विरोध के बावजूद केंद्र की मनमोहन सरकार नीतीश की सरकार को बढ़-चढ़ कर आर्थिक सहयोग करती आई है। यहां तक कि केंद्र सरकार ने बिहार को 12 हजार करोड़ रुपए का एक विशेष आर्थिक पैकेज भी दे दिया था।
जिस दौर में यह पैकेज दिया गया था, उसी दौर में इस आशय की राजनीतिक हलचल तेज हुई थी कि आगामी लोकसभा चुनाव में जदयू और कांग्रेस के बीच कोई ‘चुनावी समझदारी’ बन सकती है। हालांकि, इस मुद्दे पर दोनों दलों ने अपने पत्ते कभी नहीं खोले। यह जरूर रहा है कि सांप्रदायिकता और मोदी के मुद्दे पर जदयू का नेतृत्व, कांग्रेस से भी ज्यादा तीखे हमले भाजपा पर करता आया है। चारा घोटाले के मामले में काफी पहले से तय माना जा रहा था कि लालू एक बार फिर जेल जाएंगे। वही हुआ भी। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की पहल पर जदयू से नजदीकियां बढ़ाने की गुंजाइश की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। यूं तो जदयू के प्रमुख शरद यादव की इसमें ज्यादा रुचि नहीं बताई जा रही। लेकिन, जदयू की राजनीति में शरद के मुकाबले नीतीश कुमार की ज्यादा अहमियत है। प्रदेश सत्ता की बागडोर भी वही संभाल रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि 10 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसमें व्यवस्था की गई है कि किसी जनप्रतिनिधि को आपराधिक मामले में दो साल या उससे ज्यादा की सजा सुनाई जाएगी, तो तत्काल प्रभाव से उसकी कुर्सी चली जाएगी। इस आदेश को पलटने के लिए केंद्र सरकार 24 सितंबर को एक अध्यादेश लेकर आई थी। इसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन की व्यवस्था की गई है। यह अध्यादेश राष्ट्रपति भवन में लंबित है। लेकिन, इसको लेकर कांग्रेस के अंदर-बाहर राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। राहुल गांधी ने इस अध्यादेश को बकवास करार कर दिया है। इसके बाद अब संभावना यही है कि सरकार राष्ट्रपति भवन से यह अध्यादेश वापस मंगा ले। ऐसे में, सर्वोच्च न्यायालय के फरमान का शिकार लालू यादव होने जा रहे हैं। आज कांग्रेस सांसद रसीद मसूद को भी दिल्ली की एक अदालत सजा सुनाने जा रही है। उन्हें फर्जीवाड़े के एक मामले में दोषी करार किया गया है। संभावना यही है कि उन्हें दो साल से ज्यादा की सजा होगी। ऐसे में, सर्वोच्च न्यायालय के फरमान का पहला शिकार वही बन सकते हैं। यदि अदालत तय कार्यक्रम के अनुसार सजा सुना देती है, तो उनकी संसद सदस्यता चली जाएगी। हालांकि, पहले यही माना जा रहा था कि लालू ही इसके पहले शिकार होंगे। लेकिन, शायद यह ‘रिकॉर्ड’ भी लालू के नाम नहीं हो सकेगा। क्योंकि, इसमें भी रसीद मसूद ‘बाजी’ मार सकते हैं।
लालू यादव की अनुपस्थिति में पार्टी की कमान उनके बेटे तेजस्वी के हाथ में आने की चर्चा है। तेजस्वी राजद की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने कहा है कि उनके नेता को एक राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया है। ऐसे में, हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। मुश्किल यह है कि नए अदालती फरमान के अनुसार, दो साल से ज्यादा की सजा पाने वाला, चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य होगा। ऐसे में, लालू के सामने बड़ा संकट यह खड़ा होने जा रहा है कि वे 2014 का लोकसभा का चुनाव लड़ पाएंगे या नहीं! कांग्रेस भी अब चारा घोटाले के दोषी से जल्द से जल्द दूरी बनाना चाहेगी। वैसे भी, राहुल गांधी चुनावी वजहों से शुचिता की राजनीति पर जोर दे रहे हैं। यह अलग बात है कि दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी लालू के प्रति हमदर्दी का स्वांग जरूर कर रहे हैं।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





