Ramji Rai : स्वतन्त्रता आंदोलन के दो व्यक्तित्व और दो मुहावरे 28 सितम्बर भगत सिंह की जयंती थी और आज 2 अक्तूबर महातमा गांधी की। स्वतन्त्रता आंदोलन के दो बड़े नाम या कहिए दो धाराएँ। दोनों के विचार और संघर्ष के रास्ते जुदा-जुदा थे। लेकिन शहादत दोनों ने दी। एक फांसी पर चढ़ाया गया बरतनिया हुकूमत द्वारा और एक को गोली मारी गई अपने देश के सांप्रदायिक उन्मादियों द्वारा।
इन दोनों की लोकप्रियता भी आज तक कम न हुई। सरकार ने एक को सम्मान दिया और दूसरे की उपेक्षा की। लेकिन जनता ने इन दोनों को सम्मान दिया और इनको लेकर दो मुहावरे लोक मे आज भी उसी तरह मौजूद हैं जैसे ये दोनों मौजूद हैं।
एक ने कहा “इंकलाब जिंदाबाद” और यह मुक्कमल परिवर्तन का, क्रांति का पर्याय बन गया। लोंगों ने उसे नाम दिया – शहीद-ए-आज़म भगत सिंह।
दूसरे ने कहा – सत्य और अहिंसा और आज़ादी दिलाई। लोंगों ने उसे सम्मान दिया और कहा – मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। जनता का भी अपना इतिहासबोध होता है और वह आमतौर पर इन रूपों में ही अभिव्यक्त होता है। तो क्या ये मुहावरे स्वतन्त्रता आंदोलन मे मौजूद मुख्यतः दो धाराओं और दोनों नामों पर जनता के इतिहास-बोध को व्यक्त नहीं करते? इसे किस रूप मे देखा और व्याख्यायित किया जाना चाहिए?
रामजी राय के फेसबुक वॉल से.





