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भाई यशवंत वाकई भाई हैं पत्रकारों के

यशवंत भाई से इस बार दिल्‍ली में मिलना चाहता था। दिल्‍ली तकरीबन तीन साल बाद गया था। पहले यशवंत भाई को एसएमएस किया कि आपसे मिलना है और आप 28 से 30 सितंबर के दौरान दिल्‍ली में ही हैं क्‍या। यशवंत भाई ने तत्‍काल जवाब दिया कि कमल भाई दिल्‍ली में ही हूं और आप कहां ठहरेंगे। पिछली बार जब मैं दिल्‍ली गया था तब वे भोपाल में थे। दूसरे एसएमएस में मैंने उन्‍हें बताया कि न्‍यू अशोकनगर में रूकूंगा। यशवंत भाई का एसएमएस आया कि जहां आप ठहरेंगे उसके बगल में ही मैं रहता हूं। मयूर विहार फेज दो में नीलम माता मंदिर के पास।

यशवंत भाई से इस बार दिल्‍ली में मिलना चाहता था। दिल्‍ली तकरीबन तीन साल बाद गया था। पहले यशवंत भाई को एसएमएस किया कि आपसे मिलना है और आप 28 से 30 सितंबर के दौरान दिल्‍ली में ही हैं क्‍या। यशवंत भाई ने तत्‍काल जवाब दिया कि कमल भाई दिल्‍ली में ही हूं और आप कहां ठहरेंगे। पिछली बार जब मैं दिल्‍ली गया था तब वे भोपाल में थे। दूसरे एसएमएस में मैंने उन्‍हें बताया कि न्‍यू अशोकनगर में रूकूंगा। यशवंत भाई का एसएमएस आया कि जहां आप ठहरेंगे उसके बगल में ही मैं रहता हूं। मयूर विहार फेज दो में नीलम माता मंदिर के पास।

28 सितंबर को सुबह नौ बजे का समय तय हुआ मिलने का। यशवंत भाई के घर करीब साढ़े नौ बजे पहुंचा। उनकी गली में घुसते ही घर के बाहर से आवाज देते और हाथ हिलाते दिख गए यशवंत भाई। कुशलक्षेम के बाद यशवंत भाई बोले आप पांच मिनट बैठिए, लेट उठा हूं, बस फ्रेश होकर आता हूं। जीवन और पत्रकारिता पर चर्चा हुई। चर्चा अच्‍छी चल निकली तो यशवंत भाई बोले कि आपसे जो बात हो रही है क्‍यों नहीं उसे रिकॉर्ड कर फेसबुक या भड़ास पर लगा दिया जाए, अन्‍य लोग भी लाभान्वित हो पाएंगे।

इस बीच, उनके मित्र राजीव शर्मा जी का फोन आया और वे भी घर आ गए। उनसे परिचय हुआ। मुझे लगा ही नहीं कि राजीव भाई से यह पहली मुलाकात है, कम समय में ही गहरे घुल मिल गए। इस बीच, मैंने यशवंत भाई को मेरे मित्र अनामी शरण बबल के बारे में बताया तो उन्‍होंने कहा कि यहीं बुला लेते हैं कमल भाई। यशवंत ने बताया- पहले मैं जहां रहता था, उसी के करीब बबल रहते थे। मुझे नहीं पता था कि वह आईआईएमसी में आपके पहले बैचमेट हैं। फटाक से बबल को उन्होंने फोन लगाया और घर का पता दिया। बबल से मेरी 25 साल बाद जो मुलाकात हुई उस संबंध में तो भाई यशवंत जी ने उसी दिन मय फोटो एक पोस्‍ट लगाई जो आप सभी ने पढ़ी होगी। हालांकि, उसे यहां फिर से पढ़ा जा सकता है। नीचे लिंक और शीर्षक दिया है मैंने।

यशवंत भाई ने बबल के आने तक पत्रकारिता में मेरे कैरियर पर संक्षिप्‍त इंटरव्यू करने का इरादा जताया और उसे रिकॉर्ड किया। तकरीबन 10-12 मिनट की बातचीत को कैद किया यशवंत भाई। उस बातचीत को यहां मैं डिस्‍क्‍लोज नहीं कर रहा हूं। यशवंत भाई की पोस्‍ट में आप उसे देख सकेंगे, सुन सकेंगे। इस बातचीत के बाद खाने की तैयारी हुई। यशवंत भाई ने पांच दालों को मिलाकर बगैर प्‍याज-लहसुन की दाल बनाने का जिम्‍मा राजीव भाई पर छोड़ा और खुद सब्‍जी बनाई। तबियत अच्‍छी न होने के बावजूद भाभीजी ने रोटी बना दी। यशवंत जी ने बताया कि कमल भाई मुझे लिखने पढ़ने के अलावा, गाना, खाना बनाना और दारु पीना अच्‍छा लगता है। यशवंत भाई से कभी कभार मेरी फोन और ईमेल के माध्‍यम से बात हो जाया करती थी लेकिन यह पहली आमने-सामने की मुलाकात थी। इस मुलाकात में मुझे लगा ही नहीं यह पहली मुलाकात है। यशवंत जी ने अपने बुक ''जानेमन जेल'' का जिक्र किया। इस किताब के जेल में लोकापर्ण, जेल के आनंद और कैदियों से दोस्‍ती की बातें ऐसे बताई जैसे जेल में दिवाली पर्व मनाकर लौटे हों। जेल को ढेर सारे सुखों के साथ जी लिया उन्‍होंने, जबकि दुनिया भर के लोग तो जेल नाम से ही कांप जाते हैं।

असल में यशवंत भाई अल्‍हड़, मदमस्‍त और मस्‍तमौला लगे। भड़ास को चलाते हुए अनेक कष्‍ट और मीडिया महारथियों से लोहा लेते हुए वे चहकते हुए, गुनगुनाते हुए और बेफ्रिक लगे। कष्‍टों के बीच भी जिंदगी कैसी जिये एक इंसान,  यह जरुर यशवंत भाई से सीखना चाहिए। मुझे पता है कि यशवंत भाई बीच-बीच में भड़ास को जिंदा रखने के लिए हरेक का सहयोग चाहते हैं लेकिन मैं जितने समय उनके साथ रहा, उन्‍होंने अपने कष्‍टों के बारे में जिक्र नहीं किया और ना ही भड़ास के संबंध में। अन्‍यथा कई पत्रकारों से मिलो तो वे मिलते ही जॉब बदलने से लेकर अपने मीडिया हाउस में उनके साथ हो रही दिक्‍कतों, कम सुविधाओं और बॉस के अवगुणों को लेकर इतना भाषण पेलते हैं कि लगता है इनसे पीछा छूटे तो चैन की सांस लें।

मुझे भी कई लोग यशवंत जी के बारे में अनेक बातें कहते रहे हैं लेकिन मैं उनसे कहना चाहूंगा कि वे केवल एक बार भाई यशवंत से मिलें जरूर और उनके कायल न हो जाएं तो बताएं। भाई यशवंत ने दिल्‍ली मुलाकात में दिल से जो सम्‍मान दिया, उसे मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा। आईआईएमसी में पढ़ने के बाद दिल्‍ली की यह मेरी पांचवी या छठी यात्रा रही और इस यात्रा में अनामी शरण बबल से 25 साल बाद हुई मुलाकात के अलावा भाई यशवंत सिहं और भाई बालेन्‍दु शर्मा दाधीच से हुई भेंट मेरे लिए यादगार रहेगी। इसके अलावा, आईआईएमसी के सहपाठी सुविधा कुमार, पार्थिव और विनोद से हुई 25 साल बाद की मुलाकात भी इस याद का हिस्‍सा रहेगा।   

मुलाकात के बारे में यशवंत ने जो भड़ास पर लिखा है, उसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

आईआईएमसी फर्स्ट बैच के दो छात्रों की पच्चीस साल बाद हुई यशवंत के घर पर मुलाकात
http://bhadas4media.com/article-comment/14792-2013-09-28-10-02-47.html

लेखक कमल शर्मा आईआईएमसी के पूर्व छात्र हैं। इनसे [email protected] पर सम्‍पर्क किया जा सकता है।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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