– सर जी, कोश्चन ‘आउट ऑफ गैस पेपर’ पूछ दिया है…
– हें s s … आउट ऑफ सिलैबस होता है, ई आउट ऑफ गैस पेपर क्या है ..अंअ…
बिहार के भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में इन दिनों चल रही स्नातक पार्ट-टू की परीक्षा के दौरान मधेपुरा के प्रतिष्ठित परीक्षा केंद्र ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय में सामान्य/सब्सिडीयरी पत्र समाजशास्त्र की परीक्षा दे रहे एक छात्र ने जब उक्त सवाल उठाया तो गाइडिंग कर रहे प्रोफेसर साब ने डांट कर बिठा दिया।
लेकिन परीक्षा शुरू होने के दस मिनट के अंदर पचासों विद्यार्थी इसी बात पर हो-हल्ला मचाने लगे। उनमें से एक छात्रा ने कहा- “देखिए न सर, रेखा, रूबी, आयुष सब्भे गैस पेपर में खोजें, केकरो में एक्को गो नहीं मिल रहा है।”
दूसरे ने कहा- “आपके सजेशन से त नहींए पूछा है, राजु भैया के भी सजेशन फ़ेल है। ई आउट ऑफ सिलैबसे हइए है ।”
फिर क्या था, मिनटों में हंगामा खड़ा हो गया। कुछ प्रोफेसरों ने मामले को सही और प्रश्न-पत्र को आउट ऑफ सिलैबस ठहराते हुए परीक्षार्थियों को समझाया-बुझाया और उनकी फरियाद लेकर विश्वविद्यालय रवाना हुए। इधर परीक्षा केंद्र पर कुछ देर बाद परीक्षार्थियों को अपने मन से किसी भी पांच प्रश्नों के उत्तर देने का निर्देश दिया गया, जो भी वे पढ़कर आए हों । परीक्षार्थियों का चेहरा फिर से खिल उठा और खिले भी क्यूँ नहीं? छात्रा की उपरोक्त बात से स्पष्ट है कि यहां गैस पेपर खोल कर लिखने वाली छूट है । अनियमितताओं और हो-हो के बीच जैसे-तैसे परीक्षा जारी रही।
गौरतलब है कि बिहार के इस विश्वविद्यालयांतर्गत कॉलेजों में उच्चतर शिक्षा बदहाल है । यहां न ही नियमित कक्षाएं होती है और न समय पर परीक्षा। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों को त्रि-वर्षीय स्नातक डिग्री मिलते-मिलते चार वर्ष लग जाते हैं। वावजूद इसके आश्चर्य की बात नहीं है कि इन कॉलेजों में नामांकन हेतु भीड़ पड़ती है। कारण छात्र-छात्राओं को प्राप्त कुछ विशिष्ट सुविधाएं । जैसे दूर शिक्षा की भांति नियमित डिग्री, मतलब नियमित क्लास की कोई बाध्यता नहीं, बस परीक्षा के दौरान उपस्थिति, नामांकन हेतु तथाकथित एजेंटों की सुविधा, परीक्षा के दौरान खुल्लम-खुल्ला छूट इत्यादि । परीक्षा दे रहे बहुसंख्यक छात्र-छात्राएं तो इस छूट को अपना अधिकार मानते हुए कहते हैं कि शिक्षक ढंग से और नियमित पढ़ाएं तो चोरी करने की ज़रूरत ही न हो। परीक्षा के दिनों में छात्र शिक्षकों से ज़्यादा राजू भैया फोटोकॉपी वाले को अपना तारणहार मानते हैं। राजू भैया, जोकि एक रिटायर्ड शिक्षाविद के पुत्र हैं, के ‘सजेशन’ की बदौलत अच्छे नंबरों से पास होने की बात कई विद्यार्थी और उनके अभिवावक भी स्वीकारते हैं। इन सुविधाओं का ही असर है कि राज्य के विभिन्न क्षेत्र के छात्रों के लिए दिल्ली, कोलकाता रहते हुए बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय ‘बाबा का दरबार’ साबित होता है जहां बिना रसगुल्ला-पेड़ा खाए-खिलाए अथवा बिना नया चप्पल व नया कपड़ा पहने सब पर ‘किरपा’ हो जाती है।
ख़ैर लगभग दो घंटे से भी अधिक परीक्षा होने के बाद परीक्षार्थियों की (गैरवाजिब)फरियाद लेकर विश्वविद्यालय गए प्रोफेसर साब परीक्षा केंद्र लौटे तो फैसला सुनते ही परीक्षार्थियों के चेहरे का रंग कुछ फीका पड़ गया। माननीय कुलपति का निर्देश आया कि परीक्षा रद्द की जाती है । केंद्र से बाहर निकलते परीक्षार्थी एक-दूसरे पर अपनी निफ़िक्री दिखा रहे थे- “नो टेंशन, उ दिन फिर चलेगा, अरे छापना ही तो है, तनी एक दिन औरु आए के परेशानिए न बढ़ा, कोय दिक्कत नै ।”
असल बात तो यह थी कि परीक्षा में पूछे गए गए प्रश्न शब्दशः गैस पेपर के प्रश्नों से पूर्णतः मेल नहीं खा रह थे और परीक्षार्थियों द्वारा बवाल भी इसी बात को लेकर था कि हमेशा की भांति प्रश्न-पत्र के प्रश्न गैस पेपर से क्यूँ नहीं हैं?
विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा परीक्षा रद्द करने का निर्देश प्रश्नों के ‘आउट ऑफ सिलैबस’ होने की स्वीकार्यता दर्शाता है। जबकि जिसको लेकर सारा बवाल था, उसपर गौर करें तो समाजशास्त्र (सोशियलोजी) के इस प्रश्नपत्र में जो प्रश्न पूछे गए थे, वे जनमत, प्रचार, नेतृत्व, सामाजिक समूह, मनोवृत्ति और व्यक्तित्व के विकास में संस्कृति की भूमिका से संबंधित थे। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उक्त मुद्दे (टॉपिक) वाक़ई पाठ्यक्रम के अंतर्गत नहीं थे? यदि नहीं, तो विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम पर सवाल खड़े होंगे और यदि ये मुद्दे पाठ्यक्रम के दायरे में आते हैं, तो फिर किस आधार पर परीक्षा को रद्द कर दिया गया ?
मधेपुरा से लौटकर निलेश कुमार की रिपोर्ट.





