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हन्नी का जाना उर्फ एक मेहनतकश नौजवान के सामने हर रास्ते का बंद हो जाना

Rana Yashwant :  आज रात नींद शायद ही आए। आत्मा को जैसे काठ मार गया है। हन्नी की खुदकुशी ने हिला कर रख दिया है। अभी उसके घर से लौटा हूं। चार साल की छोटी बेटी और बीवी को उनकी किस्मत के हवाले छोड़ गया । मेरठ के एक होटल में हन्नी की लाश मिली। परसों शाम साढे तीन बजे के आसपास उसकी पत्नी का फोन आया – बदहवास सी थी। भैया हन्नी कहीं चला गया, उसका फोन भी नहीं लग रहा । डेढ बजे घर से रेस्टोरेंट के लिए निकला लेकिन अभी तक पहुंचा नहीं । वो बहुत परेशान था भैया। वो कहां गया होगा?

Rana Yashwant :  आज रात नींद शायद ही आए। आत्मा को जैसे काठ मार गया है। हन्नी की खुदकुशी ने हिला कर रख दिया है। अभी उसके घर से लौटा हूं। चार साल की छोटी बेटी और बीवी को उनकी किस्मत के हवाले छोड़ गया । मेरठ के एक होटल में हन्नी की लाश मिली। परसों शाम साढे तीन बजे के आसपास उसकी पत्नी का फोन आया – बदहवास सी थी। भैया हन्नी कहीं चला गया, उसका फोन भी नहीं लग रहा । डेढ बजे घर से रेस्टोरेंट के लिए निकला लेकिन अभी तक पहुंचा नहीं । वो बहुत परेशान था भैया। वो कहां गया होगा?

मैंने कहा परेशान मत हो – तनाव में होगा, मोबाइल ऑफ करके किसी पार्क में सो गया होगा। हन्नी करीब चार साल तक मेरा पड़ोसी रहा। मेरे फ्लैट के ठीक सामनेवाला फ्लैट। जब भी मिला – भैया नमस्ते कहते हुए ही मिला । बिला वजह भी थोड़ी देर के लिये ठहर जाता । मैंने अगर कुछ पूछ लिया तो जवाब दे दिया वर्ना मेरे आगे निकल जाने के बाद ही अपनी राह जाता । स्वभाव से सीधा, शांत और हंसमुख। कभी मेरी आवाज सुन लेता तो यूं भी घर में आ जाता । क्यों भैया, आज इतनी देर कैसे घर में रह गए। या फिर, क्यों भैया लगता है आज ऑफ है। आपको तो कभी आराम करते देखा ही नहीं मैंने । जब देखो फोन पर लगे रहते हो या आफिस आते जाते दिखते हो। आपको फोन करने में भी डर लगता है । पता नहीं कब डांट दो।

लेकिन सच ये है कि मैंने हन्नी को जब भी देखा भागते ही देखा । रात के एक बजे या दो बजे गाड़ी भगाते, भरी दोपहर बस कुछ घंटे के लिये घर आते औऱ फिर सरपट निकलते कई बार देखा था मैंने । तब उसके पिता किराए की कारें चलाते थे औऱ उन्हीं कारों में से किसी एक पर वो हड्डियां घिसता रहता । इधर साल भर से साउथ एक्स में अपने छोटे भाई के साथ उसने एक रेस्टोरेंट खोल रखा था । लेकिन ये रेस्तरां भी उसकी किस्मत के दरवाजे नहीं खोल सका। हन्नी मेहनतकश था । अपनी मेहनत के बूते किसी ना किसी रोज़ दिन फिरने की उम्मीद में वो भागता रहा औऱ भागते भागते इतना थक गया कि उसने जिंदगी की गठरी उतार फेंकी। कल दोपहर एक बजे के करीब मेरे रिपोर्टर का फोन आया – सर जो आपके पड़ोसी थे उनकी लाश मेरठ के एक होटल में बरामद हुई है।

सदमा सा लगा। थोड़ी ही देर बाद उसकी पत्नी का फोन आया -भैया कुछ पता चला हन्नी का । मेरी हिम्मत नहीं हो सकी कुछ कहने की। मैं चुप रहा – थोड़ी देर रुको पता चल जाएगा, कहते हुए मैंने फोन काट दिया।

दफ्तर से लौटकर उसके घर गया । करीब साल भर पहले उनलोगों ने मेरे सामनेवाला फ्लैट बेचकर वैशाली में किराए पर शिफ्ट कर लिया था । आज हन्नी की पत्नी को पछाड़ खाते देख कई बार आंखें भर आईं। कभी कभार दोनों पति पत्नी बुरी तरह लड़ते और कभी यूं होता कि उनमें से कोई एक मेरा दरवाजा खटखटाता औऱ दूसरे की जोर जोर से शिकायत करने लगता। आज उसकी बीवी उन्ही झगड़ों को याद कर लोट रही थी । अपने सुसाइट नोट हन्नी ने लिखा है – मैं जिंदगी से लड़ते लड़ते हार गया हूं , मुझे माफ कर देना मैं मरने जा रहा हूं।

हन्नी अब कभी नहीं लौटेगा। लेकिन हन्नी का जाना हमारे समाज में मेहनतकश और आखिरी वक्त तक लड़ते रहने का हौसला रखनेवाले नौजवान के सामने हर रास्ते का बंद हो जाना है। जब दीवाली आएगी तो हन्नी याद आएगा- पुरानी दिल्ली से बोरी भर पटाखे लाना और बच्चों के साथ उसका देर रात तक आतिशबाजी करना याद आएगा। भरी दोपहरी में कोई नौजवान पसीने से तर-ब-तर हैरान परेशान भागता सा दिखेगा तो हन्नी याद आएगा। किसी सर्द खामोश रात में कोई गाड़ी अचानक स्टार्ट होगी और बहुत तेजी से निकल भागेगी तो हन्नी याद आएगा। आंखे भरी हैं – मेरा लिखा मुझे ही नहीं दिख रहा। भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।

लेखक राणा यशवंत इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर हैं और उनका यह लिखा फेसबुक से लिया गया है.


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