आज सुबह जल्दी उठ गया. दो खबरों से मन दुखी है. अखबार पढ़ा तो पता चला कि उन बेघर और सड़क पर आ चुके बुजुर्गों में से एक बुजुर्ग की मौत हो गई जो एक एनजीओ द्वारा संचालित ओल्ड एज भवन की लीज खत्म हो जाने के बाद से मारे-मारे फिर रहे हैं. दिन-रात खुले आसमान के नीचे रहने सोने से इस बुजुर्ग की सेहत बिगड़ गई और अचानक खड़े खड़े नीचे गिर कर दम तोड़ दिया… भाई राणा यशवंत के वॉल से पता चला कि उनके बगल में रहने वाला एक हंसमुख मेहनतकश नौजवान ने इसलिए आत्महत्या कर लिया क्योंकि वह जिंदगी को पटरी पर लाते-लाते और जिंदगी से लड़ते-लड़ते थक चुका था.. दिन-रात काम, मजदूरी, संघर्ष करते-करते वह उब चुका था और इन स्थितियों से छुटकारा न मिलते देख मौत को गले लगा लिया…
दूसरों के दुख से दिल से दुखी होने का दौर नहीं है.. केवल दिखावे का दुखी हो लेना चाहिए.. और, खुद के सुखों के स्थायी इंतजाम के लिए येन-केन प्रकारेण हर कोशिश करते रहना चाहिए… आजकल के सत्ता, बाजार, समाज का फार्मूला यही है… जब गंभीरता से सोचो तो लगता है कि सच में, हम मनुष्यों ने सभ्यता व मानवता की इतनी लंबी विकास यात्रा के बाद बनाया ये है कि कुछ लोगों के हाथ में ढेर सारा धन, पूंजी, संपदा, सुख, सत्ता और सौंदर्य.. बाकियों के हाथ में दुख, दरिद्रता, दीनता, अंधेरा, बेबसी, संघर्ष, भूख, अवसाद और आंसू..
शातिर मनुष्यों ने अब तक की विकास यात्रा के दौरान हर चीज को अपने पाले में कर लिया… वैज्ञानिक खोजों से समझदारों ने पैसा बनाया, धर्मों से समझदारों ने पैसा बनाया, संविधान और सत्ताओं से समझदारों ने पैसा बनाया.. नियमों-कानूनों से समझदारों ने पैसा बनाया… हम जो सीधे-साधे, बेबस और ईमानदार रहे तो हमें हर दौर में मिला हाशिया और संसाधनविहीनता…
आगे भी कोई स्थिति बदलेगी, इसकी उम्मीद नहीं है क्योंकि हर क्षेत्र के और हर किस्म के बदलाव को बहुत चालाकी से अपने पाले में कर लेने वाले चतुर सुजान और कुटिल दिमाग लोग हमेशा मौजूद रहते हैं.. तो क्या किया जाए? कीजिये हाय हाय क्यों, राइए जार-जार क्यों… कुछ नहीं, आइए हम सब मिलकर गाय-भैंस, धर्म, विचार, मोदी, भाजपा, कम्युनिस्ट, कविता, शेर, शराब, सेक्स, शुचिता, प्रकृति आदि विषयों पर बातें करें, जो मरते हैं वो मरा करें…
क्योंकि, आदिम समय से यही सच चला आ रहा है कि समझदार, तेजतर्रार, चालाक, कुटिल, हिंसक, आक्रामक, तकनीकी से लैस लोग बाकियों पर राज करते हैं… दौर बदला है तो केवल फार्मेट बदल गया… स्थितियां गुलाम काल जैसी ही हैं.. पहले की दासता, गुलामी दिखती थी, विजिबल था, अबकी गुलामी दासता दिखती नहीं, केवल महसूस की जाती है.. हम सब फंसे हुए, गुलाम बने हुए, दास बने हुए लोग हैं जो अपनी मर्जी से नहीं, किन्हीं अघोषित स्थितियों की मर्जी पर चल जी कर रहे हैं… और मजेदार की हम मिडिल क्लास वालों को यह दासता दिखती भी नहीं, जैसे दास युग के दासों को दासता स्वाभाविक व सहज लगती थी, इसमें कुछ भी उन्हें गलत नहीं लगता था.. जब उन कुछ दासों को बंधन मुक्त किया गया, जो बंधे हुए थे तो वे कहीं नहीं गए, अपने खूंटे के पास आकर बैठ गए, क्योंकि वे दिमाग की दासता से मुक्त नहीं हो सके थे..
अब समझ में आता है कि कोई विचार प्रमुख नहीं है, कोई धर्म प्रमुख नहीं है, कोई नैतिकता बड़ी नहीं है… सबसे बड़ा विचार, वाद, धर्म, नैतिकता सिर्फ और सिर्फ ज्यादा से ज्यादा संसाधन जुटाना है… ज्यादा से ज्यादा मुद्रा बटोरना है.. ज्यादा से ज्यादा सत्ता शक्ति संचित करना है… क्योंकि यह मुद्रा, संसाधन, सत्ता शक्ति ही अंततः आपको ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा मुक्त, ज्यादा उदात्त बनाता है.. अपवाद हर जगह होते हैं और अपवादों को देखकर उसे मेनस्ट्रीम के रूप में प्रचारित करना और मेनस्ट्रीम मान लेना भी मिडिल क्लास की बुरी आदत है.. संभवतः इसी कारण वह दासता के लिए मजबूर रहता है… क्योंकि, वह चीजों को बड़े फलक में कनसीव नहीं करता. वह छोटे-छोटे खांचों, खाने में पेंडुलम की तरह बेचैन घूमा-भटका-उठता-गिरता रहता है…
प्रकृति और ब्रह्मांड की तो छोड़िए, सिर्फ आदमी आदमी की बात करें तो सत्ताएं, संविधान, विचारधाराएं, वाद, नियम-कानून से कभी मनुष्यों के बहुमत का भला नहीं हो सकता… इनसे सिर्फ एक अल्पमत का भला होता है.. और राजनीतिक, वैचारिक संघर्ष भी इसीलिए दिखता है हर दौर में क्योंकि समझदारों, कुटिलों का एक नया समूह खुद को ज्यादा मजबूत ताकतवर बनाने के लिए सत्ता की वर्दी ओढ़ना चाहता है… अंबानियों टाटाओं बिड़लाओं के नाम सिर्फ प्रतीक मात्र हैं… हर सत्ताधारी, हर पैसाधारी अंततः अंबानी, टाटा, बिड़ला के ट्रेंड पर ही चलता है और वही बनना चाहता है… दिल्ली की हर गली में, हर तीसरे मकान में आपको करोड़पति मिल जाएगा.. अरबपतियों और खरबपतियों की संख्या कितनी है, इसकी कोई गिनती नहीं… लेकिन इसी दिल्ली में एक बुजुर्ग को छत नहीं मिलती और इसी दिल्ली में एक युवा को उसके संघर्ष को मंजिल नहीं मिलती… हम सबों के लिए मुक्ति मौत ही है.. वरना ज़िंदगी तो हर पल आशंकाओं, असुरक्षाओं, अपमानों, दासता में जीने का नाम है…
आखिर में अपनी बात इस एक कविता के साथ खत्म करना चाहता हूं जो मैंने आज सुबह ही लिखा, इन्हीं स्थितियों-मनःस्थितियों में…
एक नौजवान था
शहर में ही पला-बढ़ा
व्यवसायी बन गया
करोड़ों कमाने लगा
हार्ट अटैक आने से
एक रोज वह मर गया
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एक नौजवान था
गांव से पढ़ने निकला
अफसर बन गया
खूब कमाया
बुढापे में अमेरिका गया
और एक दिन मर गया
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एक नौजवान था
गांव से निकला
पढ़ा लिखा और
आंदोनकारी बना
फिर पत्रकार बना
सत्ता से गलबहियां
करके धनी बना
एक दिन दारू पीकर
चुपचाप चल बसा
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एक नौजवान था
शहर में जन्मा
शहर में बढ़ा
वह नेता बन गया
पार्षद, फिर मंत्री बना
एक रोज एड्स से
अचानक मर गया
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एक नौजवान था
गांव से शहर आया
शहर में भात खाया
कई बार लात खाया
एक रोज ज्ञान पाया
उसने घर नहीं बसाया
न ही कहीं ठीहा गड़ाया
वह चलता-घूमता रहा
रोज नई जगह सोता रहा
एक रोज पहाड़ पर गया
वहीं बर्फ में जम गया
गर्मियों में वह फिर
उठेगा और चलेगा
घूमेगा, लगातार
इधर-उधर
दिखेगा आपको भी…
वह कभी नहीं मरेगा…
लेखक यशवंत सिंह भड़ास के एडिटर हैं. संपर्क: [email protected]
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